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अंजाम-ए-प्रदेश कांग्रेस क्या होगा पुनियाजी, हर शाख पर…

रायपुर। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अगले विधानसभा की तैयारी में लग जाने का दावा कर रही है, इस बीच यह सवाल उठता है कि आखिर राजधानी सहित अन्य बड़े शहरों में महापौर चुनाव जीत जाने वाली कांग्रेस को उन जगहों पर विधानसभा चुनाव में क्यों मुंह की खानी पड़ती है। इस सवाल के जवाब में प्रदेश कांग्रेस के सभी नेता खामोश हो जाते हैं। वहीं प्रदेश कांग्रेस में जान फूंकने छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस प्रभारी व राज्यसभा सदस्य पीएल पुनिया आज 4 दिवसीय प्रदेश प्रवास पर गुरुवार को रायपुर पहुंचें रहे हैं। अपने प्रवास के दौरान वे संगठन-मोर्चा प्रभारियों की बैठक लेने के अलावा विधायक, पूर्व विधायक और कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं से चर्चा भी करेंगे।

वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में दो बड़े शहरों के कांग्रेसी महापौर को पार्टी ने टिकट दी लेकिन दोनों स्वयं विधानसभा चुनाव में पराजित हो गए। राजधानी रायपुर में चार विधानसभा सीट हैं। इस तरह से देखें तो यहां  का महापौर चार विधायक के बराबर है। लेकिन इसके बाद भी जब तत्कालीन महापौर किरणमयी नायक को दक्षिण विधानसभा सीट से कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया तो न केवल वे बल्कि सभी सीटें कांग्रेस हार गई। बिलासपुर में भी वाणी राव महापौर रहीं लेकिन विधानसभा में उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा। महापौर जैसा पद हासिल करने वाली कांग्रेस उन्हीं इलाकों में विधानसभा सीट क्यों खो देती है अथवा क्यों उसके महापौर होने के बाद भी महापौर या कोई अन्य प्रत्याशी विधानसभा चुनाव में जनता का वह समर्थन हासिल क्यों नहीं कर पाता। जानकारों की मानें तो कांग्रेस को इस पर मंथन करने की भी जरुरत है।

कांग्रेस में ही व्यक्तिपरक राजनीति ज्यादा

हालांकि जानकार इसके पीछे कांग्रेस को ही दोषी ठहराते हैं। पहला कारण यह कि प्रत्याशी का चयन गलत होता है। जिला समितियों से दावेदारों के नाम मांगे जाते थे। फिर प्रदेश कांग्रेस की चुनाव समिति इन नामों का अपने स्तर पर विश्लेषण कर तीन नामों को तय कर उनकी खूबियां कमियां बताते हुए ये नाम केंद्रीय चुनाव समिति को भेज देती थी और अंतिम चयन वहीं से होता था।  दूसरा यह कि अधिकांश कार्यकर्ताओं का जुड़ाव दलगत या सिद्धांतपरक न होकर व्यक्तिपरक हो चुका है। उनके अपने नेता के अलावा किसी अन्य को टिकट मिली तो फिर साथ देना तो दूर उसे हरवाने के लिए ही काम किया जाता है। बतौर उदाहरण पिछले चुनाव में पराजित एक कांग्रेस नेता अगर अपने क्षेत्र में पहुंचता है तब जितने अन्य नेता और कार्यकर्ता दिखते हैं वे संगठन के किसी आंदोलन-प्रदर्शन के समय नहीं दिखते।  छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की दुर्गति होने के पीछे सबसे बड़ा कारण यही है। इसके अलावा अन्य मोर्चा-प्रकोष्ठों का सुप्त होना भी एक बड़ा कारण है।  इन मसलों पर न तो पिछले प्रदेश अध्यक्षों ने ध्यान दिया न ही वर्तमान अध्यक्ष ने।

गुटबाजी अब भी कायम

इन सबसे उपर है गुटबाजी। छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस का पिछला इतिहास देखें तो गठन के बाद से ही यह सबसे प्रमुख समस्या है जो अब तक तक कायम है। जैसे ही प्रदेश अध्यक्ष बदले, उपर से नीचे तक पदाधिकारी बदल दिए जाते हैं और अपने आदमी बिठा लिए जाते हैं, वर्तमान कार्यकाल भी इससे अछूता नहीं रहा।

स्पष्ट रणनीति का अभाव

जानकार यह भी कहते हैं कि प्रदेश की रमन सरकार ने एक तरह से बहुतेरे मुद्दे प्रदेश कांग्रेस को हाथ में रखकर परोसे लेकिन स्पष्ट रणनीति अथवा रणनीतिकारों के अभाव में प्रदेश कांग्रेस उन मुद्दों को भुनी नहीं पाई। ज्यादा पीछे न जाकर केंद्र सरकार की नोटबंदी से लेकर किसान आत्महत्या, नक्सल समस्या, भ्रष्टाचार, विधानसभा का समय से पूर्व सत्रावसान, फसल खराब होना, अकाल, पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की जाति का मामला, मंत्री बृजमोहन का ग्राम जलकी में जमीन मामला, भाजपा नेता की गौशाला में 300 से ज्यादा गायों की मौत, धान  बोनस का न दिया जाना और अब दिया जाना तो सिर्फ दो साल का दिया जाना जैसे अभी तक देखें तो कांग्रेस को छत्तीसगढ़ में इतने मुद्दे मिले कि अगर सही तरीके से रणनीति बनाई जाती तो अब तक सरकार परेशान हो चुकी होती, लेकिन रमन सरकार उतने ही आराम से है जितने आराम से वर्ष 2004 में अपनी सत्ता के पहले वर्ष में थी। उलटे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ही परेशान हैं कि उनके और उनके परिवार के जमीन से जुड़े मामले खोद-खोदकर निकाले और जांचे जा रहे हैं। कहा तो यह भी जाता है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी को कांग्रेस छोड़ने के लिए मजबूर करने के बाद को ही विजयोल्लास मान कर चल रहे हैं।

एक होने का महज दिखावा

हालांकि प्रदेश कांग्रेस प्रभारी के रुप में कार्यभार संभाले हुए पीएल पुनिया से यही उम्मीद की जा रही है कि वे प्रदेश कांग्रेस में एक नई जान फूंक देंगे लेकिन टीम लीडर अकेले क्या कर लेगा जब पूरी टीम ही बिखरी हुई हो और एक होने का सिर्फ दिखावा करे। कांग्रेस नेताओं के एक होने का दावा उस समय दिखेगा जब अगले विधानसभा चुनाव के लिए टिकट की घोषणा हो जाए, तब असली चेहरा सामने आएगा। पूर्व में हुए चुनावों के दौरान का इतिहास तो यही कहता आया है।

पिक्चर अभी बाकी है

बहरहाल अब देखना यह है कि पुनिया प्रदेश कांग्रेस संगठन और नेताओं को कितना टाइट करते हैं और उसका नतीजा क्या आता है। क्योंकि उनके पूर्ववर्ती प्रदेश प्रभारी पर तो यह आरोप खुलकर लगे थे कि वह एक गुट विशेष को बिलकुल पसंद नहीं करते न ही वह गुट उन्हें पसंद करता। हालांकि उस गुट के प्रमुख नेता ने अपनी अब एक अलग पार्टी बना ली है लेकिन उनके कई समर्थक अब भी कांग्रेस में ही बने हुए हैं। वहीं यह भी देखना है कि कांग्रेस अपने महापौर वाले इलाकों में अगले चुनाव में कितनी सीटें हासिल करती हैं क्योकि अब भी कई बड़े शहरों रायपुर, भिलाई, जगदलपुर, कोरबा में कांग्रेस के महापौर  हैं जहां जनता का समर्थन हासिल कर कांग्रेसी नेता मेयर बने हैं लेकिन यहीं विधानसभा सीटों पर क्या होगा। यह भविष्य के गर्भ में है।

One thought on “अंजाम-ए-प्रदेश कांग्रेस क्या होगा पुनियाजी, हर शाख पर…

  1. कांग्रेस की हर शाख पर कालिदास बैठे है। यही वजह है कि हाथ कमजोर होता जा रहा है। उसके संगठन की सर्जरी जरूरी है।

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