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अविश्वसनीय पर सत्य.. पत्थर से अपने घर में ही बना लेते हैं लोहा

अरबों की लागत से सोेवियत संघ के सहयोग से बना भिलाई स्टील प्लांट में जो लोहा तैयार होता है उसी क्वालिटी का  लोहा यहां के आदिवासी एक छोटा सा संयंत्र बनाकर उससे अपने दैनिक उपयोग के औजार घर में ही तैयार कर लेते हैं। छत्तीसगढ के कवर्धा और मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले के अगरिया जाति के लोग आज भी जंगल से लौह अयस्क के पत्थर खोज कर लाते हैं और उस पत्थर से लोहा तैयार करते हैं।

इस लोहे में कभी जंग नहीं लगती अगरिया समुदाय के निर्मित इस लोहे का उपयोग आजादी से पूर्व से किया जा रहा है। देश में जितने भी पुराने अशोक स्तंभ या लौह स्तंभ हैं वे सभी इसी विधी द्वारा तैयार किये गये हैं। जिनमें आज हजारों वर्ष बाद भी जंग तक नहीं लगा। लौह अयस्क के पत्थरों को पिघलने के लिये एक हजार डिग्री तापक्रम की आवश्यकता पड़ती है। वे चार पांच घंटों के कठिन परिश्रम से एक हजार डिग्री तापक्र्रम लाकर लौह अयस्क को लोहे में बदल देते हैं।

यहां लोहे को भी मानते हैं भगवान अगरिया जाति के जानकार डाॅ विजय चैरसिया बताते हैं कि लौह अयस्क से लोहा तैयार करने की प्रक्र्रिया काफी रोचक है। भोर होते ही अगरिया परिवार के स्त्री पुरुष हाथ में टोकनी और कुदाली रखकर जंगल में लोह अयस्क के पत्थर लेने जाते हैं। लौह अयस्क की खदान में जाकर एक स्थान पर लोहासुर और तमेसुर देवता की पूजा करते हैं। वहां पर एक मुर्गी की बली चढ़ाकर शराब से तर्पण करते हैं। फिर लौह अयस्क के पत्थरों को एकत्र कर उन्हें घर लेकर आ जाते हैं।

ऐसे बनाते हैं लोहा घर पर आकर उन पत्थरों के छोटे – छोटे टुकड़े करते हैं। घर के आंगन में लोहा बनाने वाली भट्टी लगी रहती है। जो तंदूर के समान रहती है। भट्टी के ऊपर कोयला और लौह अयस्क के टुकड़े रखने की जगह रहती है। भट्टी में सबसे नीचे कोदों के अधजले भूसे की परत बिछा दी जाती है। भट्टी के नीचे दो छेद रहते है। एक छेद में कठौती (धौंकनी) में दो नली लगाकर उस छेद में लगाते हैं जिससे हवा प्रवेष करायी जाती है तथा दूसरे छेद में षंकुनुमा मिट्टी की चिमनी जिसे ढ़ोंणी कहते हैं उसे लगाकर मिट्टी से बंद कर देते हैं।

सुअर की चढाते हैं बलि इसके पश्चात् परिवार के सभी सदस्य भट्टी की पूजा करते हैं। यहां पर सुअर के बच्चे की बली चढ़ाई जाती है। महुआ की शराब से अग्नि का तर्पण किया जाता है। पूजा समाप्त होने के बाद भट्टी में अगंार ड़ाल दी जाती है। पूरी भट्टी में कोयला भरा रहता है। कठौती के ऊपर चढ़ कर एक महिला दोनों पैरों से धौकनी चलाती है। जिससे भट्टी का तापक्रम बढ़ने लगता है । धौंकने की प्रक्रिया सात आठ घंटों तक चलती रहती है। जिसके कारण भट्टी के कोयले का तापक्रम एक हजार ड़िग्री तक पहुंच जाता है। इसके बाद लौह अयस्क के छोटे-छोटे टुकड़े कोयले के साथ ऊपर से भट्टी में ड़ालते हैं। लौह अयस्क से लोहा बनने की प्रक्रिया चालू हो जाती है।

अगरिया जनजाति का परिचय छत्तीसगढ और मध्यप्रदेश के घने जंगलों में निवास करने वाली अगरिया जनजाति में प्रचलित है। बैगा जनजाति के ग्रामों में ही अगरिया जनजाति के लोग निवास करते हैं। ये लोग दैनिक उपयोग तथा खेत में कार्य करने वाले उपकरणें का निर्माण स्वतः करते हैं।

यह मिथक है प्रचलित उस समय पृथ्वी का निर्माण नही हुआ था। संपूर्ण विष्व जलमग्न था चारों ओर जल ही जल था। तब एक दिन ब्रम्हा जी ने अपनी छाती के मैल से एक कौआ बनाया. उस कौवे ने पाताल लोक जाकर धरती की मिट्टी लायी. तब ब्रम्हा जी ने उस मिट्टी को समुद्र के जल में बिखेर दी। इस प्रकार पृथ्वी का निर्माण हुआ। इसके बाद जब ब्रम्हा जी ने पृथ्वी पर चलकर देखा तो पृथ्वी यहां वहां हिल रही थी।तब ब्रम्हा जी ने अपनी छाती से पुनः मैल निकाला और उस मैल से अगरिया और बैगा बनाया । अगरिया ने लोहे के चार खीले बनाये और बैगा ने वे खीले  पृथ्वी के चारों खूंटों में ठोंक दिये । उस दिन से पृथ्वी एक जगह पर स्थिर हो गयी। इस प्रकार अगरिया इस पृथ्वी के प्रथम मानव कहलाये ।

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