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एडीजी की याचिका पर ‘कैट ने डीजीपी को थमाया नोटिस

जबलपुर/रायपुर। एडीजी पवन देव को आरोपपत्र जारी करने के आदेश पर स्थगन जारी करने के बाद केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) ने अब छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक अमरनाथ उपाध्याय समेत इस मामले की जांच करने वाली समिति (पुलिस मुख्यालय में बनाई गई विशाखा समिति) को नोटिस थमा दिया है। डीजीपी तथा समिति से जवाब मांगते हुए कैट ने कहा है कि प्राकृतिक न्याय के सिध्दांत से परे हटकर जांच कैसे की जा रही है। कैट में याचिका दायर करके एडीजी पवन देव ने यह तर्क दिया कि जांच में उन्हें प्रतिपरीक्षण का अवसर नहीं दिया गया। इसके अलावा नियम विरुद्ध तरीके से साक्षियों की गवाही फोन पर लेने, वाट्सएप पर लिए गए बयान, नियमों की अनदेखी कर नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों के खिलाफ जाकर कार्रवाई करने सहित साक्ष्यों की कूटरचना कर जांच रपट तैयार की गई है। कैट जबलपुर ने प्रथम दृष्टि में आईपीएस देव के तर्कों पर सहमति जताते हुए सरकार द्वारा जारी किए गए आरोपपत्र पर आगामी कार्रवाई के लिए रोक लगा दी है। इसी तरह विशाखा समिति के जांच प्रतिवेदन पर एडीजी पवन देव के अधिवक्ता मनोज शर्मा द्वारा दिए गए उक्त तर्कों से सहमत होते हुए याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार्य कर ली है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ शासन सहित डीजीपी व उनके द्वारा गठित विशाखा समिति के सभी सदस्यों को नोटिस जारी कर जवाब प्रस्तुत करने को आदेशित किया है।

‘कैट पहुंचे एडीजी, दिया तर्क

आरोपपत्र मिलने के बाद आईपीएस देव ने कैट का दरवाजा खटखटाया। दो सप्ताह पहले ही आरोपपत्र पर एडीजी पवन देव को कैट से स्थगनादेश मिला है। इसके तुरंत बाद पूरी जांच रपट को ही एडीजी देव ने कैट के समझ चुनौती दी। इस चुनौती को स्वीकारते हुए कैट ने नोटिस जारी की है। पवन देव द्वारा ने अपनी याचिका में समिति पर साक्ष्यों को बदलने के आरोप लगाए गए हैं। उन्होंने हैरानी डताई है कि कि समिति में आईएएस रेणु पिल्ले जैसी ईमानदार, कत्र्तव्यनिष्ठ व विद्वान अधिकारी के होते हुए भी साक्ष्यों में कूटरचना हो गई। उन्होंने आशंका जताई है कि एक साजिश के तहत यह कूटरचना की गई। अपनी याचिका में उन्होंने स्पष्ट किया है कि समस्त तथ्यों को अपने अभ्यावेदन के माध्यम से वे शासन के ध्यान में ला चुके हैं। फिर ऐसी क्या परिस्थिति थी जिससे किसी तरह का साक्ष्य न होने के बावजूद नियम विरुद्ध तरीके से आरोपपत्र जारी किया गया।

यह है मामला

एक महिला आरक्षक द्वारा आईपीएस देव पर आरोप लगाए गए थे। आरोप की जांच का जिम्मा डीजीपी ने विशाखा समिति का गठन कर उसे सौंपा था। विशाखा समिति में आईएएस रेणु पिल्ले,आईपीएस बीपीएस पोर्षाय व सोनल मिश्रा के अलावा एक अशासकीय सदस्य के रूप में मनीषा शर्मा शामिल थी। इसी समिति ने जांच कर जो रपट सौंपी है अब वह विवादित हो रही है। आईपीएस पवन देव शुरुआत से ही शिकायत को आशीष वासनिक की बर्खास्तगी से जुडा़ षड्यंत्र का हिस्सा बताते रहे हैं लेकिन समिति ने इस पर कभी ध्यान ही नहीं दिया। समिति की जांच रपट भी धूल खाते पडी़ रही। कार्रवाई नहीं होने की बात करते हुए महिला आरक्षक ने बिलासपुर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी। हालांकि हाईकोर्ट ने इसे जनहित याचिका मानने से इनकार करते हुए छत्तीसगढ़ शासन को महिलाओं के लैंगिक उत्पीडऩ अधिनियम के प्रावधानों के तहत 45 दिन के भीतर प्रकरण के निराकरण के निर्देश दिए थे। हाईकोर्ट द्वारा दी गई अवधि की समाप्ति के ठीक पहले सरकार ने एडीजी देव को आरोप पत्र थमा दिया गया।

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