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छत्तीसगढ़ का प्रयाग : ‘राजिम’

छत्तीसगढ़ का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है ‘राजिम’। रायपुर ज़िले में महानदी के तट पर स्थित ‘राजिम’ वैसे तो अपने शानदार मंदिरों के लिए जाना जाता है लेकिन राजिम को ‘छत्तीसगढ़ का प्रयाग’ भी कहा जाता है और ख़ासतौर पर ‘राजिम कुंभ’ का मेला देशभर में विख्यात है जो हिन्दुओं की आस्था का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है।

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एक स्थानीय दंतकथा के अनुसार इस जगह का नाम ‘राजिव’ या ‘राजिम’ नामक एक तैलिक स्त्री के नाम पर पड़ा। ऐसा कहा जाता है कि ‘राजिम’ या ‘राजिव’ का प्राचीन नाम ‘पद्मक्षेत्र’ है और पद्मपुराण, पातालखण्ड में श्री रामचन्द्र का इस स्थान (देवपुर) से संबंध बताया गया है। मंदिर के पास ‘सोमा’, ‘नाला’ और कलचुरी वंश के स्तम्भ भी पाए गए हैं। इस स्थान पर ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्त्व के मंदिरों में प्राचीन भारतीय संस्कृति और शिल्पकला का अनोखा समन्वय नजर आता है।

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राजिम का सर्वप्रमुख मंदिर है ‘राजीवलोचन मंदिर’ जिसमें बारह स्तम्भ हैं। इन स्तम्भों पर अष्ट भुजा वाली दुर्गा, गंगा-यमुना और विष्णु के विभिन्न अवतारों जैसे- राम, वराह और नरसिंह आदि के चित्र बने हुए हैं।

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यहां से प्राप्त दो अभिलेखों से ज्ञात होता है कि इस मंदिर के निर्माता राजा ‘जगतपाल’ थे, जिन्होंने इसे शायद 8वीं या 9वीं शती में बनवाया। इनमें से एक अभिलेख राजा ‘वसंतराज’ से संबंधित है, वहीं लक्ष्मण देवालय के एक दूसरे अभिलेख से पता चलता है कि इस मंदिर को 8वीं शती ई. में मगध नरेश ‘सूर्यवर्मा’ की पुत्री और ‘शिवगुप्त’ की माता ‘वासटा’ ने बनवाया था। राजीवलोचन मंदिर के पास ‘बोधि वृक्ष’ के नीचे तपस्या करते बुद्ध की प्रतिमा भी है।

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इसी मंदिर के एक स्तंभ पर चालुक्य नरेशों के समय में निर्मित नरवराह की ‘चतुर्भुज मूर्ति’ उल्लेखनीय मानी जाती है जिसमें वराह के वामहस्त पर भू-देवी अवस्थित हैं। ऐसा कहा जाता है कि ये मध्य प्रदेश से प्राप्त सबसे प्राचीनतम मूर्ति है। ऐसी मान्यता है कि राजिम से पांडुवंशीय कौशल नरेश ‘तीवरदेव’ का ताम्रदानपट्ट प्राप्त हुआ था, जिसमें तीवरदेव व्दारा ‘पैठामभुक्ति’ में स्थित पिंपरिपद्रक नामक गांव के निवासी एक ब्राह्मण को दिए गए दान का वर्णन है। ये दानपट्ट तीवरदेव के 7वें वर्ष श्रीपुर (सिरपुर) से प्रचलित किया गया था।

राजिम में ‘महानदी’ और ‘पैरी’ नामक नदियों का ‘संगम’ है। इस संगम स्थल पर ‘कुलेश्वर महादेव मंदिर’ स्थित है। माना जाता है कि इसकी स्थापना नौवीं शताब्दी में की गई।

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ये मंदिर महानदी के बीच में एक द्वीप पर बना हुआ है। इसका निर्माण बड़ी सादगी से किया गया है लेकिन इसके बावजूद ये इतना सुदृढ़ है कि सैंकड़ों वर्षों से नदी के निरंतर प्रवाह को सहते हुए आज भी अडिग खड़ा हुआ है। 14वीं शताब्दी में स्थापित ‘जगन्नाथ मंदिर’, ‘भक्तमाता राजिम मंदिर’ और ‘सोमेश्वर महादेव मंदिर’ भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र है।

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पौराणिक महत्व के साथ-साथ राजिम का ऐतिहासिक माघ पूर्णिमा का मेला भी पूरे भारत में प्रसिद्ध है जो श्रद्धालुओं के बीच आस्था और विश्वास का प्रमुख केन्द्र माना जाता है।

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