Chhattisgarh Jagdalpur

जब विधायक बाफना के भांजे ने सोनू भदौरिया के पैरों से लिपटकर जान की भीख मांगी

  • खुटपदर की कहानी, चश्मदीद की जुबानी
  •  बाफना समर्थकों के हवाई फायर के जवाब में चली गोली से बसंत सिंह घायल
  •  लड़ाई की शुरुआत विधायक के भांजे मनीष पारख व शैलेंद्र भदौरिया ने की
  •  दोनों पक्षों से महीना लेने के कारण नगरनार पुलिस ने साधी थी चुप्पी 

  रायपुर। बस्तर के नगरनार के खुटपदर में 11 मई को हुई हिंसक वारदात के बाद पूरे बस्तर की राजनीति गरमाई हुई है। राज्य सरकार के दबाव पर जगदलपुर जिला प्रशासन ने बस्तर परिवहन संघ को भंग कर दिया है, जिसके कारण बस्तर के हजारों परिवारों के सामने खाने के लाले पड़ गए हैं। छत्तीसगढ़ चैम्बर ऑफ कॉमर्स जैसी संस्थाएं भी पहल कर रही हैं परंतु कोई ठोस हल सामने नहीं आ रहा है। अब सबकी नजरें सांसद दिनेश कश्यप हैं, जिन्होंने इस मामले पर आठ जून को मुख्यमंत्री से विस्तार से चर्चा करके राहत दिलाने का आश्वासन दिया है।

खुटपदर की घटना के बाद जगदलपुर प्रशासन ने एकतरफा कार्रवाई की है। विधायक संतोष बाफना के राजनीतिक व व्यवसायिक विरोधियों पर चुन-चुनकर कार्रवाई की गई है। प्रशासन की इस कार्रवाई से सरकार की किरकिरी हो रही है परंतु खुटपदर की घटना का सच क्या है…इसका एक तटस्थ चश्मदीद है, जिसने घटना के बारे में विस्तार से जानकारी दी। इसको सुनने के बाद राज्य सरकार और जगदलपुर प्रशासन कठघरे में खड़ा हो गया है और विधायक तथा राज्य सरकार के उन नुमाइंदों की वह शपथ झूठी साबित हो गई है जो उन्होंने निर्वाचन के बाद ली थी। शपथ में उन्होंने ईश्वर को साक्षी मानकर कहा था कि राग-द्वेष के बिना वे काम करेंगे पर खुटपदर के मामले में वे इस शपथ को भूल गए।

यह बताया चश्मदीद ने:
वैसे तो नगरनार में दस मई से ही थोड़ा-बहुत तनाव देखा जा रहा था लेकिन 11 मई को सुबह नगरनार परिवहन संघ और बस्तर टिप्पर संघ के कुछ पदाधिकारियों के बीच व्यवसाय को लेकर अधिक तनातनी हो गई। विधायक संतोष बाफना के भांजे मनीष पारख व शैलेंद्र भदौरिया की देखरेख में चलने वाले नगरनार परिवहन संघ का कहना था कि टिप्पर संघ को नगरनार में व्यवसाय नहीं करना चाहिए क्योंकि यह उनका क्षेत्र है जबकि टिप्पर संघ के पदाधिकारियों का कहना था कि उनका कार्यक्षेत्र पूरा बस्तर है इसलिए वे कहीं भी व्यवसाय कर सकते हैं। इसी बहस के दौरान नगरनार परिवहन संघ के कुछ लोगों ने मारपीट की, जिसमें टिप्पर संघ के हरपिंदर सिंह को चोट लगी। घटना की जानकारी मिलने पर दोनों पक्षों को नगरनार थाने बुलाया गया और प्रभारी उत्तम वर्मा की मौजूदगी में समझौता कराया गया। नगरनार थाने को दोनों की संघों की तरफ से हर महीने मोटी रकम मिलती है, इसलिए थानेदार की कोशिश थी कि वहां दोनों की संघ काम करते रहें ताकि उन्हें महीना मिलता रहे।
समझौता होने के बाद दोनों पक्ष अलग-अलग वाहनों से थाने से निकले। करीब चार वाहनों में टिप्पर संघ के पदाधिकारी सोनू भदौरिया व राजीव शर्मा समेत कई लोग थे, तथा एक वाहन पर नगरनार परिवहन संघ के पदाधिकारी मनीष पारख, शैलेंद्र भदौरिया व बसंत सिंह व अन्य थे। थोड़ी दूर जाने के बाद नगरनार परिवहन संघ के पदाधिकारियों को एहसास हुआ कि आगे चलकर मारपीट हो सकती है लिहाजा उन्होंने फोन करके नगरनार परिवहन संघ के लोगों को खुटपदर के पास बुला लिया। वहां पहुंचने वाले नगरनार परिवहन संघ के अधिकतर लोग हथियार बंद थे। खुटपदर में दोनों पक्ष फिर आमने सामने हो गए और उन सबके बीच व्यवसाय को लेकर फिर बहस शुरू हो गई। इस बीच नगरनार परिवहन संघ के एक सदस्य ने हरपिंदर सिंह के सिर पर तलवार से हमला कर दिया। जवाब में टिप्पर संघ के भुरू ने पहले मनीष पारख और फिर शैलेंद्र भदौरिया को पीटना शुरू कर दिया। भुरू ने दोनों को पटक-पटककर मारा। इस दौरान सोनू भदौरिया दोनों पक्षों को शांत कराते दिखे। उन्होंने भुरू को भी मारपीट करने से रोका। यह देखकर मनीष पारख उनके पैरों पर गिर गया और जान बचाने की गुहार लगाने लगा। इस बीच अपने लोगों को पिटता देखकर नगरनार परिवहन संघ की तरफ से दो हवाई फायरिंग की गई, जिससे अफरा-तफरी मची और जवाब में टिप्पर संघ की तरफ से भी एक गोली जलाई गई, जो बसंत सिंह को लगी। इस दौरान झगड़े की खबर नगरनार थाना व जगदलपुर नियंत्रण कक्ष पहुंची और वहां पुलिस पहुंचने लगी। यह देखकर जिसको जहां अवसर मिला, भागने लगा। पुलिस ने मौके से किसी तो नहीं पकड़ा। घायल बसंत सिंह को वहां से ले जाया गया।

सुलगते सवाल
@अगर चश्मदीद की बातों को सच मान लिया जाए तो एक बात बिलकुल स्पष्ट होती है कि मौके पर कांग्रेस के प्रदेश महासचिव मलकीत सिंह गेंदू व बस्तर परिवहन संघ के शक्ति सिंह चौहान नहीं थे। फिर पुलिस ने किस आधार पर इन दोनों के खिलाफ संगीन मामला पंजीबध्द किया।
@ घटना के तीन सप्ताह बाद तक पुलिस यह क्यों पता नहीं लगा पाई कि गोली किसने चलाई व झगड़े की शुरुआत कहां से हुई?
@ इस गंभीर मामले में नगरनार थाना के प्रभारी उत्तम वर्मा पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
@बस्तर परिवहन संघ द्वारा उपलब्ध कराई गई कार्यालय की सीडी की फोरेंसिंक जांच क्यों नहीं कराई गई?
@ रिपोर्टकर्ता शैलेंद्र भदौरिया ने ऐसा क्या प्रमाण प्रस्तुत किया, जिसकी पड़ताल किए बिना पुलिस ने उसकी बातों को सच मानकर परिवहन संघ के पदाधिकारियों व कांग्रेस नेताओं के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया?
@खासकर जगदलपुर पुलिस अधीक्षक पर ऐसा क्या दबाव था जिससे उन्होंने आरोपियों पर ईनाम घोषित करने से लेकर जिलाबदर, बैंक खाते व सम्पत्ति सील करने जैसी त्वरित कार्रवाई की?
@ जगदलपुर प्रशासनिक अफसरों की ऐसी क्या मजबूरी थी कि उन्होंने कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के अलावा बस्तर परिवहन संघ जैसे संगठनों की बातों की अनसुनी कर दी?
संदेह के दायरे में एसपी की कार्यशैली
इस पूरे घटनाक्रम में जगदलपुर के पुलिस अधीक्षक शेख आरिफ खान की भूमिका संदेह के दायरे में है। अपने बेहद खराब व्यवहार के कारण महज एक महीने में ही उनके अधीनस्थ उनसे परेशान हो गए हैं। खासकर महिला अधिकारी व कर्मचारी उनके रवैये से त्रस्त हो चुकेे हैं क्योंकि वे इन सबका सार्वजनिक रूप से अपमान करने से नहीं चूकते हैं। खासकर महिला अधिकारियों को वे किसी बी मामले में चौधरी न बनने की सलाह देते हैं। खुटपदर की घटना के बाद एसपी ने कार्रवाई में जिस तरह से तेजी दिखाई, वैसी तेजी अगर नक्सल उन्मूलन के लिए दिखाते तो बस्तर एक नई राह पर चलता हुआ दिख जाता। बालोद एसपी रहते हुए इन पर कई तरह के आरोप लगे, इसलिए सरकार ने दण्डस्वरूप उन्हें बस्तर भेज दिया परंतु वहां जाकर भी उन्होंने अपनी कार्यशैली में सुधार नहीं किया। दबाव नहीं झेल पाना उनकी बहुत सी कमजोरियों में एक है और यही वजह है कि भाजपा के एक बेहद कमजोर विधायक का दबाव वे झेल नहीं पाए और बड़ी कार्रवाई कर दी, जिसे अदालत में साबित कर पाना बस्तर पुलिस के लिए बेहद मुश्किल भरा होगा।

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