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जानिए…. छत्तीसगढ में कहां खाते हैं चूहे की सब्जी और चीटी की चटनी

रायपुर। सुनकर भले ही आपको आश्चर्य हो मगर यह सत्य है कि छत्तीसगढ और मध्यप्रदेश की कुछ आदिवासी जनजातियां आज भी चूहे की सब्जी और चीटी की चटनी खाती हैं. मांसाहार के रुप में हमेशा मुर्गे, बकरे व अन्य जंगली जानवरों और पक्षियों का उपयोग करते हुए लोगों को देखा होगा। लेकिन चूहे की सब्जी न आपने कभी बनती देखी होगी न ही किसी को खाते हुए देखा होगा.

चाव से खाते हैं चूहा यहां

आदिवासी जनजातियों के जानकार डाॅ विजय चैरसिया के अनुसार छत्तीसगढ के  कवर्धा के दुर्गम जंगलों में रहने वाले आदिवासी और म.प्र. के बैगा आदिवासी चूहे की सब्जी बडे ही चाव से खाते है. उनके लिए यह किसी विशेष पकवान से कम नही है.  जंगल में पाया जाने वाला चूहा और साल वृक्षों पर पायी जाने वाली खतरनाक वानर चीटी जिसे लाल चीटी या चापड़ा चीटी भी कहते हैं, जो साल वृक्ष के पत्तों का घौंसला बनाकर पेडों में निवास करती है. उसे यहां के आदिवासी बैगा जनजाति के लोग स्वादिष्ट आहार के रुप में उपयोग करते हैं.

खतरनाक भी होती है चीटी

खतरनाक होती है यह चीटी बताया जाता है की घने साल के वृक्षेां में पायी जाने वाली यह चीटी इतनी खतरनाक होती है कि यदि उस वृक्ष पर बंदर चढ़ जाता है. वे लाखों की संख्या में बंदर पर आक्रमण कर उसके मांस को चट कर जाती है. तो मात्र दस मिनट में उस पेड़ पर उसका कंकाल ही नजर आता है.

लालचीटी से उपचार भी करते हैं

बैगा जनजाति का जीवन, रहन – सहन, खाना – पीना, बोल – चाल, आधुनिक मानव से बिलकुल ही भिन्न है. ये लेाग बतलाते हैं कि लाल चीटी में कई औषधीय गुण पाये जाते है. सके कारण भी वे उसका उपयोग आवश्यक रुप से करते हैं। यदि किसी व्यक्ति को अत्यंत तेज बुखार है। तो लाल चीटी का घौंसला उस पीड़ित व्यक्ति के षरीर पर से उतार दिया जाता है। कुछ चीटियां उस व्यक्ति के षरीर पर चलने लगती हैं। जिससे बुखार से पीड़ित व्यक्ति कुछ समय बाद स्वस्थ्य हो जाता है।

बैगाओं के लिए पकवान है चूहा

छत्तीसगढ और मध्यप्रदेश के बैगा आदिवासियों के लिये चूहे के मांस की सब्जी और लाल चीटी की चटनी के साथ मक्का का पेज ( दलिया के समान तरल पदार्थ ) इतना स्वाष्टि लगता है कि वे कितने भी जरुरी कार्य में लगे हों । यदि उनको चूहा या लाल चीटी का घौंसला दिखाई दे दे तो वे सभी काम छोड़कर उसे पकड़ने के लिये दौड़ लगा देते हैं। चूहा तो सिर्फ बैगा जनजाति के लोग ही खाते है। वे चूहे को पकड़कर सबसे पहले उसके दांत तोड़ देते हैं फिर उसे कंड़ों की आग में भूंज कर बड़े प्रेम से खाते है।

चीटी की चटनी हो रही प्रसिद्ध

लाल चीटी की चटनी का यह व्यंजन इतना लजीज और जायकेदार होता है कि बैगाओं और बस्तर के आदिवासियों की देखा देखी कई राज्यों्र से आकर रह रहे बासिंदे भी इससे अछूते नहीं रह गये है। इन आदिवासियं की अगर मानें तो लाल चीटी औषधिय गुणों के साथ – साथ स्वादिष्ट और रुचिकर आहार में से एक है । जो इनके दैनिक जीवन में काफी उपयोगी है। लोगों का यह स्वादिष्ट आहार हाट बजारों में आसानी से सस्ते दर पर सुलभ हो जाता है।

आजीविका का साधन भी है चीटी की चटनी

यही नहीं लाल चीटीयों का व्यापार कई गरीब परिवारों के जीवन यापन का एक मात्र साधन भी है। यहां के आदिवासी लाल चीटी के छत्तें को तोड़कर बांस की टोकनी में एकत्र कर बाजार लाकर बेचते हैं। पेड़ों पर से लाल चीटी के छत्तें को उतारना भी एक कला है । जो हर किसी के बस की बात नहीं है। यह काम ऐसा है जैसे मधु मक्खी के छत्ते में हाथ ड़ालना। परंतु जीभ के स्वाद के लिये वे इस जोखिम से पीछे नहींहटते।

गरीबी के कारण नहीं मिलता पोषण आहार

इन बैगाओं के परिवार सदैव आभाव में जीते हैं । जंगली जानवरों के षिकार पर पाबंदी लगने के कारण पर्याप्त मात्रा में मांस नहीं मिलता मात्र कोदों , कुटकी , मक्का और धान उनके षरीर को पर्याप्त पोषण नही देते। इनके भोजन में कार्बोहाइड्रेट की कमी है । उन्हें अभी भी कई विटामिन्स , प्रोटीन और खनिज युक्त भोजन की आवष्यकता हैं । फिर भी वे उसी व्यवस्था में जी रहे हैं।

 

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