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डोंगरगढ़ में विराजित ‘मां बम्लेश्वरी देवी’ हैं राजा विक्रमादित्य की ‘कुल देवी’

छत्तीसगढ़ में डोंगरगढ़ मां बम्लेश्वरी देवी के भव्य और दिव्य मंदिर के लिए देश भर में काफी मशहूर है। राज्य की सबसे ऊंची चोटी पर विराजमान डोंगरगढ़ वैसे तो एक धार्मिक स्थल के रूप में पर्यटकों के बीच आस्था और आकर्षण का केंद्र है ही, लेकिन अपनी नैसर्गिक और मनोरम सुंदरता के लिए भी सुविख्यात है।

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मां बम्लेश्वरी देवी का मंदिर जिस पहाड़ी की चोटी पर स्थित है, उसकी ऊंचाई लगभग 1600 फीट है। पहाड़ों से घिरे होने के कारण ही इसे पहले ‘डोंगरी’ और अब ‘डोंगरगढ़’ के नाम से जाना जाता है। चारों ओर हरियाली से घिरा पहाड़ और निकट ही सुंदर तालाब डोंगरगढ़ की खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं।

 

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ऐसा कहा जाता है कि मां बम्लेश्वरी देवी शक्तिपीठ का इतिहास लगभग 2200 वर्ष पुराना है और डोंगरगढ़ से प्राप्त भग्नावेशों में प्राचीन कामावती (कामाख्या) नगरी होने के प्रमाण भी मिले हैं। इसलिए इसे ‘पुरातन कामाख्या नगरी’ भी कहा जाता है। हालांकि मां बम्लेश्वरी मंदिर के इतिहास को लेकर कोई स्पष्ट तथ्य मौजूद नहीं है, लेकिन मंदिर के इतिहास को लेकर जो पुस्तकें और दस्तावेज सामने आए हैं, उसके मुताबिक डोंगरगढ़ का इतिहास मध्यप्रदेश के उज्जैन से जुड़ा हुआ है। मां बम्लेश्वरी को मध्यप्रदेश के उज्जैयिनी के महाप्रतापी राजा विक्रमादित्य की ‘कुल देवी’ भी कहा जाता है।

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कुछ इतिहासकारों और विव्दानों ने इस क्षेत्र को कल्चुरी काल का बताया है लेकिन अन्य उपलब्ध सामग्री जैसे दो बार मिल चुकी जैन मूर्तियां और उससे हटकर कुछ मूर्तियों के गहने, उनके वस्त्र, आभूषण, मोटे होठों तथा मस्तक के लंबे बालों का सूक्ष्म अवलोकन करने के बाद ये कहा गया, कि इस जगह के अवशेषों पर गोंड कला का प्रमाण परिलक्षित होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि एक अनुमान के मुताबिक 16 वीं शताब्दी तक डूंगराख्या नगर गोंड राजाओं के अधिपत्‍य में रहा। आज भी पहाड़ी पर उस काल में निर्मित किले और इमारतों के अवशेष मौजूद हैं। इसी वजह से इस स्थान का नाम ‘डोंगरगढ़’ रखा गया, क्योंकि ‘डोंगरगढ़’ का अर्थ होता है गोंगर, पहाड़, गढ़, किला।

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ऊंची चोटी पर विराजित बगलामुखी मां बम्लेश्वरी देवी का ये मंदिर छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देश भर में श्रद्धालुओं के बीच आस्था का बड़ा केंद्र माना जाता है। हर दिन देश के कोने-कोने से श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए यहां आते हैं। वैसे तो मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग एक हजार से ज्यादा सीढ़ियां हैं लेकिन जो लोग चढ़ने में असमर्थ हैं उनके लिए पहाड़ी के नीचे भी छोटे मंदिर के रुप में मां का स्थान बना हुआ है जिसे ‘छोटी बम्लेश्वरी मां’ के रूप में पूजा जाता है।

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हालांकि अब पहाड़ी पर मौजूद बम्लेश्वरी माता के मंदिर तक जाने के लिए रोपवे की सुविधा शुरु की जा चुकी है। प्रतिदिन सोमवार से शनिवार तक सुबह आठ बजे से दोपहर दो बजे तक और फिर अपरान्ह तीन बजे से शाम पौने सात बजे तक रोपवे चालू रहता है जबकि रविवार को ये सुविधा सुबह सात बजे से रात सात बजे तक रहती है जबकि नवरात्रि जैसे विशेष मौके पर चौबीस घंटे रोपवे की सुविधा चालू रहती है क्योंकि नवरात्रि में मंदिर के पट चौबीस घंटे खुले रहते हैं। नवरात्रि के दौरान यहां ज्योति कलश जलाने की परंपरा है और इस दौरान यहां की रौनक ख़ास तौर पर दर्शनीय होती है।

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यहां मां बम्लेश्वरी के दो प्रमुख मंदिरों के अलावा बजरंगबली मंदिर, नाग वासुकि मंदिर, शीतला मंदिर, दादी मां मंदिर भी हैं। मां बम्लेश्वरी मंदिर के नीचे छीरपानी जलाशय भी है जहां यात्रियों के लिए बोटिंग की व्यवस्था भी है।

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डोंगरगढ़ पहुंचने के लिए सबसे आसान रास्ता है राजनांदगांव, जहां से डोंगरगढ़ लगभग 35 किलोमीटर दूर है लेकिन पर्यटक चाहें, तो रायपुर और दुर्ग से भी यहां पहुंच सकते हैं क्योंकि ये रायपुर से लगभग 107 किलोमीटर और दुर्ग से करीब 67 किलोमीटर दूर स्थित है। करीब 110 किलोमीटर की दूरी पर स्थित रायपुर हवाई अड्डा यहां का निकटतम हवाई अड्डा है जबकि डोंगरगढ़ रेलवे स्टेशन यहां पहुंचने के लिए सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन है।

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