Chhattisgarh Korba

निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम नहीं

कोरबा। निजी स्कूलों की मनमानी इस कदर बढ़ गई है कि शिक्षा आज व्यवसाय का रूप ले चुकी है। मध्यम एवं निम्न वर्ग के लोगों के लिए बच्चों को निजी स्कूल में पढ़ा पाना मुश्किल हो रहा है। अधिकांश निजी स्कूल रसूखदारों के है। जिन्हें शासन प्रशासन की परवाह नहीं है। शिक्षा विभाग भी मूक दर्शक मात्र बना हुआ है। स्कूलों में बेतहाशा फीस बढ़ाई जा रही है। वहीं चिन्हाङ्क्षकत दुकानों से कापी पुस्तक व ड्रेस खरीदने का दबाव अभिभावकों पर बनाया जा रहा है। शिक्षा विभाग की लापरवाही के कारण बिना मान्यता वाले कई स्कूल भी कुकुरमुत्ते की तरह पनप चुके है। जिनकी जांच नहीं की जाती।
वर्तमान समय में शिक्षा पर खर्च बढ़ता जा रहा है। स्कूल फीस में बेतहाशा वृद्धि की जा रही है। फीस वृद्धि का कोई पैमाना नहीं रह गया है। स्कूल प्रबंधन अपने हिसाब से फीस में बढ़ोत्तरी कर रहे है। एडमिशन फीस में कई कई प्रतिशत की वृद्धि की जा रही है। इसके अलावा मंथली , जनरल एवं अन्य सुविधाओं के नाम पर मोटी फीस वसूली जा रही है। इस फीस के बाद अभिभावकों को कापी पुस्तक व ड्रेस खरीदी के नाम पर लूट का शिकार होना पड़ता है। संबंधित स्कूल प्रबंधनों ने कापी पुस्तक एवं ड्रेस के लिए दुकान निर्धारित कर दी है। इन्हीं दुकानों से ऊंची किमतों पर पुस्तक कापी व ड्रेस खरीदना पड़ता है। स्कूल प्रबंधनों की लूट इस कदर बढ़ गई है कि कक्षा नर्सरी की पढ़ाई में ही अभिभावकों की मोटी रकम खर्च हो जाती है। कक्षा बढऩे के साथ फीस में भी बेतहाशा वृद्धि हर साल होती है। अभिभावक इसकी सामूहिक शिकायत नहीं करते जिसके कारण यह लूट का धंधा बदस्तूर चल रहा है। शासन ने स्कूलों के शुल्क को लेकर निर्धारित मापदंड तय किए है। जिसके मुताबिक स्कूल प्रबंधन को निर्धारित फीस वसूलना होता है परंतु इसकी मॉनिटरिंग नहीं होने के कारण निजी स्कूल प्रबंधन फीस बढ़ोत्तरी में मनमानी करते है। हजारों रूपए एडमिशन फीस के नाम पर वसूलने वाले स्कूल प्रबंधन महवारी फीस के नाम पर भी हजारों रूपए वसूल रहे है।
नियमत: 10 फिसदी से अधिक शुल्क में बढ़ोत्तरी नहीं की जानी है और वह भी अभिभावकों के साथ बैठक करते तय किया जाना है लेकिन ऐसा नहीं किया जाता है। कुछ स्कूल प्रबंधन जहां ड्रेस व कापी किताब खुद बेचने का धंधा करते थे। वहीं अब स्कूल प्रबंधनों की सैंटिंग निर्धारित दुकानों से है। शहर के किसी एक दुकान में ही कोर्स की किताबें और संबंधित स्कूल की ड्रेस मिलती है। इकलौते स्कूल में ड्रेस कापी किताब मिलने के कारण मनमर्जी की जाती है। अनाप शनाप रेट में अभिभावकों को सामान बेचकर उन्हें चूना लगाया जाता है। जिस पर भी शिक्षा विभाग कार्रवाई करने में नाकाम रहा है।
शिक्षा विभाग के अधिकारी लंबे समय से जिले में जमे हुए है। जिसके कारण निजी स्कूल प्रबंधनों को शिक्षा विभाग का कोई डर नहीं रह गया है। शिक्षा विभाग के सख्ती के आभाव में निजी स्कूल प्रबंधनों की मनमानी काफी बढ़ गई है। इस पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी विभाग की है। परंतु शिक्षा विभाग के अधिकारी ढुलमुल रवैय्या ही अपनाते रहे है। जिला कलेक्टर द्वारा लगातार निर्देश जारी किए गए और निर्देशों में स्पष्ट रूप से सभी नियमों का उल्लेख है। जिला शिक्षा अधिकारी अपने एसी रूम से निकलकर भौतिक सत्यापन करना तो दूर स्कूलों में झाकंना भी उचित नहीं समझते है।
मान्यता देने में भी लापरवाही
स्कूल के भौतिक संसाधनों के आधार पर मान्यता प्रदान कर दी जाती है। परंतु स्कूल में शिक्षकों की कमी व उनकी योग्यता बड़ा सवाल बनी रहती है। इसकी जांच करना भी शिक्षा विभाग मुनासिब नहीं समझता। ग्रामीण क्षेत्र के कई स्कूल तो बिना मान्यता के ही संचालित हो रहे है। ऐसी शिकायत भी विभाग को मिलती है। मोटी फीस वसूलने वाले स्कूल प्रबंधन पर्याप्त संख्या में योग्य शिक्षकों की नियुक्ति करने में भी नाकाम साबित हो रहे है। शासकीय स्कूलों की तरह ही निजी स्कूलों में भी विषय वार विशेषज्ञ अध्यापकों की कमी बनी हुई है। वहीं ऐसे शिक्षकों को भी स्कूल में रखा गया है जिनके पास पर्याप्त योग्यता नहीं है। बताया तो यहां तक जाता है कि हायर सेकेण्डरी स्कूलों में व्याख्याता ही नहीं है। जबकि नियमत: विषय विशेषज्ञ के रूप में व्याख्याता की नियुक्ति स्कूलों में किया जाना अनिवार्य है। प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव भी आसानी से देखा जा सकता है।

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