Chhattisgarh

हजारों जुड़ूम समर्थकों को जानमाल की चिंता

रायपुर। नक्सलवाद के खिलाफ संगठित सलवा जुडूम का श्रेय अविभाजित बीजापुर जिले के अंबेली और करकेली के ग्रामीणों को जाता है। इन्हीं निहत्थे ग्रामीणों ने ही सबसे पहले अत्याधुनिक हथियारों से लैस खूंखार माओवादियों के सामने सीना ताना था। पर अफसोस कि अब खानाबदोशों सा जीवन बिताने को मजबूर हैं।
बीजापुर जिले में कुल 8 राहत शिविरों में 22 हजार से अधिक सलवा जुड़ूम समर्थक रहते थे। नक्सलियों की खिलाफत का खामियाजा इन्हें अपना गांव छोड़कर चुकाना पड़ा था। ग्रामीण इस भरोसे के साथ लड़ाई लड़ रहे थे कि माओवादी खत्म हो जाएंगे और एक बार फिर वे अपनी जमीन पर खेती कर सकेंगे। पर अफसोस कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, बल्कि जो कुछ था वो भी खत्म हो गया।
दरअसल, सात साल पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एकाएक आंदोलन समाप्त हो गया। इसके बाद अभियान के समर्थकों का नरसंहार शुरू हुआ। अब तक सैकड़ों सलवा जुड़ूम समर्थकों को नक्सली मौत के घाट उतार चुके हैं। पर अफसोस इस बात का है कि शेष बचे लोगों की सुरक्षा की भी कोई गारंटी नहीं है। अलग-अलग गांवों में लोग अस्थायी शिविरों में रह रहे हैं, जिन्हें पुलिस ने एक जगह रहने की इजाजत तो दी है, लेकिन इनकी सुध लेने वाला अब कोई नहीं है।
पीडि़तों के मुताबिक गांव छूट चुका है और अब वे अस्थायी शिविरों में रह रहे हैं। ऐसे में उनके समक्ष रोजी-रोटी का संकट गहरा गया है। भीतरी इलाकों में आसानी से इन्हें काम भी नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में कमाने-खाने के साथ ही इनके समक्ष जान का खतरा भी बना हुआ है। बमुश्किल दो जून की रोटी इन्हें नसीब हो पा रही है।
सलवा जुड़ूम अभियान के अगुवा महेंद्र कर्मा ने इस बात की आशंका जताई थी कि आंदोलन बैकफुट पर जा रहा है। शासन से सहयोग नहीं मिल पाने के चलते ऐसा हो रहा है। उन्होंने यह भी आशंका जताई थी कि इलाके में लगातार बढ़ती नक्सली घटनाओं के बीच बिना जनसहयोग और शासन की मदद के आंदोलन विफलता की ओर चला जाएगा। वहीं एसपी एलके धुरुवे ने बताया कि कुटरू और बेदरे थाना परिसर में दो अस्थायी शिविर है, जहां सलवा जुड़ूम समर्थक रह रहे हैं। इनकी सुरक्षा स्थानीय थाने की पुलिस करती है।
सलवा जुड़ूम अभियान से जुड़े प्रमुख सदस्य और कांग्रेस नेता अजय सिंह ने कहा कि अपनी जान जोखिम में डालकर जिन निहत्थे ग्रामीणों ने माओवादियों के खिलाफ हुंकार भरी थी, आज उनकी जान के लाले पड़े हैं। सरकार को चाहिए कि इनके पुनर्वास और बेहतर जीवन की व्यवस्था करे, तकि कम से कम पीड़ित लोग खुली हवा में सांस ले सकें।

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