Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                 24 मार्च 17
दुनियाभर में हिटलर और जनरल डायर को क्रूरता का पर्याय माना जाता है। जब भी कोई शासक अत्याचार करता है तो इन दोनों से उसकी तुलना करने में पलभर की देरी नहीं की जाती है। राज्य सरकार और उसके नौकरशाह कितने क्रूर हैं, इस विषय पर विस्तार से बहस हो सकती है परंतु कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल ने प्रदेश की नौकरशाही की तुलना हिलटर और जनरल डायर से करके यह बताने की कोशिश की है कि राज्य सरकार का सामान्य प्रशासन विभाग असामान्य प्रशासन की तरह काम कर रहा है। भूपेश बघेल चूंकि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं, लिहाजा उन्होंने प्रोटोकॉल के तहत अपने निशाने पर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को रखा है क्योंकि उनके सपनों में मुख्यमंत्री की कुर्सी घूम रही है। उन्हें लगता है कि हाल ही में हुए पांच राज्यों के चुनाव की तरह अगर राज्य सरकार के खिलाफ जनादेश मिला तो उनका सपना पूरा हो सकता है लेकिन ऐसा सोचने से पहले उन्हें उत्तरप्रदेश के केशव मौर्या या पंजाब के नवजोत सिंह सिध्दू के बारे में भी सोच लेना चाहिए।
बहरहाल अफसरों को हिटलर या डायर कहने वाले भूपेश बघेल को यह जरूर विचार करना चाहिए था कि इन अफसरों को हिटलर या डायर बनने का प्रशिक्षण किसने दिया है। बस्तर आईजीपी रहे एसआरपी कल्लूरी के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले भूपेश बघेल ने अफसरों को इसलिए सॉफ्ट टॉरगेट बनाया है क्योंकि उन्हें कल्लूरी को बस्तर से हटाने में सफलता मिल चुकी है। कल्लूरी को बस्तर से हटाने का कारण भले कुछ और हो परंतु कांग्रेस इसका श्रेय अपने अध्यक्ष को ही देती है।
बात हो रही है अफसरों के हिटलर व डायर बनने की। तो भूपेश बघेल को अतीत के पन्नों को पलटने की जरूरत है। राज्य निर्माण के दौरान वे सरकार का हिस्सा थे। उन्हें याद करना चाहिए कि हिटलरशाही व डायर जैसी प्रवृति अफसरों की उस समय थी, जब किसी पान-चाय दुकान को हटाने के लिए आईएएस व आईपीएस अफसर पहुंचा करते थे। मकान-दुकान खाली कराने का जिम्मा भी इन्हीं अफसरों के पास था। इस बात को राजधानी का बत्रा, खनूजा व जग्गी परिवार कभी नहीं भूल सकता।
एक उदाहरण के साथ चोखेलाल यह बताने की कोशिश कर रहा है कि राज्य निर्माण के पहले तीन साल अफसरों का किस तरह का आतंक रहा है। इसका असली दर्द को भाजपा के दिग्गज नेता बता सकते हैं, जब एक आईपीएस अफसर ने उन पर ऐसी लाठियां बरसाईं थीं कि वे आज तक सही चाल नहीं चल पा रहे हैं। ऐसा करने वाले अफसर उन समय कांग्रेस सरकार और उस समय के मंत्री भूपेश बघेल के आंखों के तारे थे, पर आज जब अफसर वहीं काम कर रहे हैं तो वे भूपेश बघेल की आंखों की किरकिरी बन गए हैं और वे भूपेश बघेल को हिटलर व डायर दिख रहे हैं। अफसरों को हिटलर और डायर तो कांग्रेस की सरकार ने बनाया है। उन्हें विषाक्त तो कांग्रेस के मंत्रियों ने किया है और अब वे डंक मार रहे हैं तो बुरा नहीं लगना चाहिए क्योंकि अगर पेड़ बबूल का बोया है तो कांटें मिलना तय है।
इसी तरह भूपेश बघेल ने प्रदेश के बारह प्रतिशत अफसरों को भ्रष्ट बताया है। हो सकता है यह बात सही है परंतु इनमें अधिकांश अफसर वे हैं, जो कांग्रेस की पसंद के थे और राज्य निर्माण के बाद कांग्रेस के मंत्री-विधायकों ने ही उन्हें छत्तीसगढ़ आने के लिए प्रेरित किया था। कहने का अर्थ यह है कि जिन अफसरों को छत्तीसगढ़ लाकर कांग्रेस की तत्कालीन सरकार ने प्रशिक्षित किया और फायदा उठाया, अब अगर वे उनकी परिपाटी की अनुपालन कर रहे हैं तो कांग्रेस को नाराज नहीं होना चाहिए। भूपेश बघेल को तो बिलकुल भी नहीं क्योंकि वे उस सरकार के हर फैसले में बराबर के भागीदार रहे हैं।

    चोखेलाल
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