Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                                रायपुर, 06 जुलाई 17

कल्पना कीजिए, प्रदेश या देश के किसी गांव या शहर के किसी नौजवान को अगर पता चले कि उसके पास जो डिग्रियां हैं, वे फर्जी हैं या उनकी कोई मान्यता नहीं है तो उसके दिल में क्या गुजरेगी और अगर उसे यह पता लग जाए कि उसके अभिभावकों ने लाखों रुपए में इन डिग्रियों को खरीदा है तो यकीन मानिए उस नौजवान का शिक्षा से मोह भंग हो जाएगा। उस समय उसे अपना पूरा जीवन अंधकारमय लगने लगेगा और संभव है कि वह कोई ऐसा कदम उठा ले, जिसे अप्रिय कहा जाता है।
बात भले कल्पना करने से शुरू की गई हो परंतु यह सच्चाई है। छत्तीसगढ़ की कोख में एक ऐसा विश्वविद्यालय पनप रहा है, जहां से निकलने वाली डिग्रियां अवैध हैं। देश-प्रदेश के हजारों नौजवान इस विश्वविद्यालय की कई तरह की डिग्रियां लेकर घूम रहे हैं। अनेक नौजवान इन डिग्रियों के आधार पर नौकरी भी कर रहे हैं परंतु उनकी नौकरी तब तक सलामत है, जब तक उनके खिलाफ कोई शिकायत नहीं होती है। इसे दुर्भाग्य के अलावा क्या कहा जाएगा कि इन फर्जी डिग्रियों के जनक को कांग्रेस में शामिल करने के बाद पार्टी के बड़े नेता बेहद शर्मनाक अंदाज में कह रहे हैं कि फलां के आने से खासकर बिलासपुर में कांग्रेस मजबूत होगी।
कांग्रेस के इन नेताओं को मालूम है कि उनकी पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी को हिंदुस्तानी साबित करने में बड़े-बड़े नेताओं की कमर से पसीना निकल चुका है। कांग्रेस के फर्जीवाड़े का ज्वलंत उदाहरण अजीत जोगी हैं, जिन्होंने खुद को आदिवासी बताया और कांग्रेस में शामिल हुए। जांच-पड़ताल किए बिना कांग्रेस नेताओं ने उसे अपने सिर पर बिठाया और एक समय उन्हें छत्तीसगढ़ में आदिवासियों का चेहरा बताते हुए यह कहने से भी गुरेज नहीं किया कि जिन आदिवासियों के लिए छत्तीसगढ़ का निर्माण किया गया है, कांग्रेस ने प्रदेश का नेतृत्व उसी समुदाय को सौंपा है। मगर कांग्रेस की कलई उस समय खुल गई जब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनाई गई राज्य सरकार की हाईपॉवर कमेटी ने साफ कर दिया कि अजीत जोगी अनुसूचित जनजाति समुदाय के नहीं हैं।
यह बात अलग है कि हाईपॉवर कमेटी ने जब यह फैसला सुनाया तब तब अजीत जोगी कांग्रेस ने नाता तोड़कर अपना नया राजनीतिक दल बना चुके थे। इसलिए कांग्रेस को सीधा नुकसान तो नहीं हुआ लेकिन कांग्रेस के फैसले संदेह का दायरे में जरूर आ गए। अजीत जोगी के मामले से कांग्रेस को निकले अभी देर भी नहीं हुई थी कि प्रदेश कांग्रेस ने एक ऐसे व्यक्ति को पार्टी में  शामिल कर लिया, जिसकी पहचान फर्जी डिग्री बेचने वाले के रूप में है। जिसके माथे पर हजारों नौजवानों के भविष्य को खराब करने का कलंक है। जिसके दामन पर देश-प्रदेश के हजारों उन गरीब अभिभावकों का खून चूसने का आरोप है, जिन्होंने अपने बच्चों के भविष्य को सुखद बनाने का सपना देखा था।
भाजपा सरकार के कुछ मंत्रियों व कई नौकरशाहों की सरपरस्ती में भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े की कहानी लिखने वाला एक शख्स अब भाजपा के लिए ही भस्मासुर बनने की तैयारी कर रहा है। समाजविरोधी तत्वों के लिए कांग्रेस से बेहतर कोई धरा नहीं है क्योंकि कांग्रेस के प्रभारी महासचिव ने शायद चोटी बांध ली है कि उनके नेतृत्व में प्रदेश में होने वाले हर स्तर के चुनाव में कांग्रेस को पराजय ही दिलाएंगे। इसकी भूमिका उन्होंने बरसों पहले तय कर ली है। यही वजह है कि कांग्रेस छोडऩे-शामिल होने से लेकर चुनाव में बी-फार्म तक की बोली लगती है। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को सिर्फ पैसे से मतलब है, फिर उनका प्रत्याशी जीते या हारे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है।
बिलासपुर में एक निजी विश्वविद्यालय के कुलसचिव को कांग्रेस में प्रवेश दिलाकर प्रदेश नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि आप किसी भी प्रकार के अपराध में संलग्न हों, फर्जीवाड़ा करते हों, धोखाधड़ी करना आपका पेशा हो पर अगर आप पैसों की दृष्टि से सम्पन्न हैं तो आइए, कांग्रेस को ऐसे ही लोगों की जरूरत है। इसके बाद तो  कांग्रेस के लिए बस रेड लाइट एरिया ही बचता है क्योंकि वहां पैसा कमाने वालों की खासी संख्या होती है और उनका जनाधार भी होता है। वहां बसने वाले इस कुलसचिव के मुकाबले कांग्रेस के लिए अधिक फायदेमंद हो सकते हैं क्योंकि उन्होंने अपना जिस्म बेचकर पैसा कमाया है। इस कुलसचिव ने तो आत्मा और ईमान बेचकर पैसा कमाया है। खैर इस फैसले के बाद प्रदेश में कांग्रेस के बचे-खुचे ग्राफ में अधिक गिरावट आई है। इसके बाद कांग्रेस नेतृत्व को छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने का सपना देखने का कोई अधिकार नहीं बचता है।
                                                चोखेलाल
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