Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                 25 मार्च 17

भारतीय जनता पार्टी की आंतरिक राजनीति में खरा-खरा बोलने के लिए मशहूर दिग्गज आदिवसी नेता नंदकुमार साय ने एक बार फिर सच बोलकर प्रदेश की भाजपा सरकार और उसके मुखिया को आइना दिखाया है। नंदकुमार साय ने साफ कहा है कि सत्ता में बैठे कुछ नेता (उनका इशारा मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की ओर है) नहीं चाहते हैं कि बस्तर नक्सल मुक्त हो। केंद्र सरकार से अनुसूचित जनजाति के उन्नयन के लिए मिलने वाली अरबों रुपए की राशि का आकर्षण उन्हें ऐसा करने से रोकता है। संकेतों में नंदकुमार साय ने यह कह दिया है कि आदिवासियों की सुरक्षा के लिए मिलने वाली केंद्रीय सहायता से प्रदेश सरकार के नेता गुलछर्रे उड़ाते हैं। नंदकुमार साय यहीं नहीं रुके। उन्होंने अपनी ही पार्टी की राज्य सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि बस्तर की नक्सल समस्या छह महीने में खत्म हो सकती है और यहां तो तेरह साल गुजर गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सरगुजा को नक्सल मुक्त करने के लिए राज्य सरकार भले ही अपनी पीठ थपथपाए पर सच्चाई तो यह है कि इसमें उसकी कोई भूमिका नहीं रही है।
एक लम्बे समय तक प्रदेश भाजपा के नेताओं से अपमानित होकर निर्वासित जीवन जी रहे नंदकुमार साय को पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने पहचाना और उन्हें केंद्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का अध्यक्ष बनाकर कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया। इसे नंदकुमार साय का बड़प्पन ही कहें कि जिन नेताओं को उन्होंने राजनीति का ककहरा पढ़ाया, वहीं उनकी कब्र खोदने से पीछे नहीं रहे पर इन विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने संतुलन बनाए रखा तथा पार्टी लाइन पर चलते रहे।
संवैधानिक पद पर बैठने के बाद नंदकुमार साय वही कर रहे हैं, जो उन्हें करना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि बस्तर में नक्सल समस्या सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही है। इस समस्या को लेकर सैकड़ों बार बैठकें हो चुकी हैं परंतु हल अब तक नहीं निकला है। बस्तर की धरा लहूलुहान है। नंदकुमार साय सच कहते हैं कि इस समस्या के समाधान के लिए राज्य सरकार में इच्छा शक्ति का अभाव है। वह नहीं चाहती है कि बस्तर नक्सल मुक्त हो। दिखावे के लिए वहां काम किए जा रहे हैं। जिन लोगों ने बस्तर को करीब से देखा और समझा है, वे दावे के साथ कह सकते हैं कि बीते तेरह सालों में राज्य सरकार ने बस्तर में कुछ भवनों को बनाने के अलावा कुछ नहीं किया है। शायद यही वजह है कि आज भी वहां के निवासी अपने परिजनों के शव को साइकिल के कैरियर में बांधकर ले जाते हैं और जब-जब इस तरह की तस्वीरें मीडिया में आती हैं, राज्य सरकार के विकास के दावे बे-नकाब हो जाते हैं।
बस्तर की नक्सली समस्या के माध्यम से नंदकुमार साय ने प्रदेश की भाजपा सरकार का असली चेहरा पेश करने की कोशिश की है। यह पार्टी की आंतरिक गुटबाजी की एक तस्वीर है जो विधानसभा चुनाव के करीब आते-आते साफ हो जाएगी। नंदकुमार साय को आदिवासियों का हमदर्द माना जाता है। कुछ साल पहले उन्होंने आदिवासी मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग करते हुए प्रदेशभर के आदिवासी नेताओं को एकत्र करके आदिवासी एक्सप्रेस भी चलाई थी। उनका कहना है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी ने आदिवासियों के लिए छत्तीसगढ़ राज्य बनाया था ताकि उनका समग्र विकास हो सके फिर इस राज्य का मुख्यमंत्री गैर आदिवासी कैसे हो सकता है।
प्रदेश सरकार व संगठन में बैठे अधिकतर नेताओं को नंदकुमार साय, रमेश बैस व देवलाल दुग्गा जैसे नेता रास नहीं आते क्योंकि वे सरकार की जनविरोधी नीतियों का समर्थन नहीं करते। संगठन के अधिकतर नेता राज्य सरकार से किसी न किसी रूप में उपकृत हैं। किसी को लालबत्ती मिल गई है तो किसी के बेटे-बहू, साला-भतीजे को सरकारी नौकरी में फिट कर दिया गया है। सरकार के एहसान तले दबे संगठन के छोटे-बड़े नेताओं में इतना नैतिक बल नहीं है कि वे सरकार की किसी नीति का विरोध कर सकें। शायद यही वजह है कि प्रदेशभर में भारी विरोध होने के बावजूद मुख्यमंत्री सीना ठोंककर कह रहे हैं कि एक अप्रैल से शराब बेचने के फैसले को सरकार किसी कीमत पर नहीं बदलेगी। यह भरोसा शायद इसलिए है क्योंकि संगठन के दिल्ली में बैठे पार्टी के नेता भी प्रदेश सरकार से उपकृत हैं।

                                        चोखेलाल
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