Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                     रायपुर, 17 अगस्त 2017

प्रदेश की कला व संस्कृति को लेकर जिस तरह का खिलवाड़ किया जा रहा है और छत्तीसगढ़ की ढाई करोड़ की आबादी  का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाले राजनीतिक दलों के नेता जिस तरह आंख मूंदें बैठे हैं, उसको लेकर अब प्रदेश में अंदर ही अंदर आग सुलगने लगी है। कुछ गैर छत्तीसगढिय़ा मंत्रियों वे अधिकतर गैर छत्तीसगढ़ी नौकरशाह प्रदेश की कला और संस्कृति को पूरी तरह विकृत करने में लगे हुए हैं। गैर छत्तीसगढ़ी कला और संस्कृति को छत्तीसगढ़ में थोपने का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उसके खिलाफ आवाज उठने लगी है और अगले साल होने वाले विधानसभा के चुनाव में यह एक बड़ा मुद्दा बन सकता है।
चोखेलाल लगातार इस बात की तरफ इशारा करता रहा है कि गैर छत्तीसगढिय़ा जनप्रतिनिधि व नौकरशाह प्रदेश की मूल पहचान को नष्ट करने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों ने आंखें बंद कर रखी हैं अथवा उनमें अपनी कला-संस्कृति को बचाने का साहस नहीं रह गया है। गैर छत्तीसगढ़ी अफसरों की पत्नियों ने उन तमाम मंचों पर कब्जा कर रखा है, जो छत्तीसगढ़ के कलाकारों को मिलना चाहिए। छत्तीसगढ़ी कलाकारों को तो कार्यक्रमों में फिलर के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और मेहनताना सिर्फ इतना मिलता है कि वे अपने गांव तक पहुंच सके। इसके विपरीत अफसरों की कथाकथित कलाकार पत्नियों को भुगतान लाखों में किया जाता है और ऐसा करने में संस्कृति विभाग के अफसर खुद को धन्य समझते हैं। कहने को तो इस समय संस्कृति विभाग के सर्वोच्च पद पर मूल छत्तीसगढिय़ा अफसर बैठा हुआ है परंतु उसके कार्यकाल में भी छत्तीसगढ़ी कलाकार मान-सम्मान और सम्मानजनक मानदेय की बांट जोह रहे हैं क्योंकि उसे पता है कि अफसर पत्नियों को खुश करके ही कैरियर को बनाए रखा जा सकता है।
बहरहाल चोखेलाल की तीखी टिप्पणियों पर व्यापक प्रतिक्रियाएं होने लगी है और लगातार सुझाव आने लगे हैं। आज यहां छत्तीसगढ़ की कला-संस्कृति को लेकर एक आरटीआई एक्टिविस्ट कुणाल शुक्ला की टिप्पणी प्रस्तुत की जा रही है। यह टिप्पणी केवल कुणाल शुक्ला की नहीं है बल्कि हर उस छत्तीसगढिय़ा की है, जिसे अपने प्रदेश के प्यार है। वह अपनी कला और संस्कृति को लुटता हुआ नहीं देख सकता परंतु उसमें सरकार से टकराने का साहस नहीं है। कुणाल शुक्ला की इस भावना को आम छत्तीसगढिय़ों की भावना समझना होगा और राज्य सरकार के उन मंत्रियों व नौकरशाहों को सतर्क होना होगा जो यह खतरनाक खेल खेलने में लगे हुए हैं।
    यह है कुणाल शुक्ला की टिप्पणी: छत्तीसगढ़ की कला- संस्कृति को अब इस तरह नष्ट करने की साजिश की जा रही है, कैसे? जानिए ऐसे…छत्तीसगढ़ सभी सरकारी स्कूलों में अब ओडिसी नृत्य अनिवार्य कर दिया गया है जो कि पड़ोसी राज्य ओडिसा का सांस्कृतिक नृत्य है। इसके लिए राज्य सरकार ने सीडी और किताबें तैयार कर बंटवाना भी शुरू कर दिया है। यह कृत्य दो ओडियन अधिकारियों ने किया जिसमें से एक सीनियर आईएएस की पत्नी इस नृत्य की नृत्यांगना भी है। ओडिसी नृत्य के लिए छत्तीसगढ़ के नृत्य पंथी, कर्मा, बैगा, सरहुल, सुआ, और गौर को हाशिए पर डाल दिया गया। खैर ओडिसी नृत्य को लागू किये जाने का जो तर्क दिया जा रहा है वह यह है कि यह नृत्य एक अच्छा व्यायाम है और इससे छत्तीसगढ़ की संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा। वैसे इन सबको मालूम होना चाहिए कि छत्तीसगढ़ के पंथी नृत्य को विश्व का फास्टेस्ट बर्निंग कैलोरी नृत्य माना गया है और कथक नृत्य के रायगढ़ घराने को कैसे भूला जा सकता है। चक्रधर समारोह का विश्व पटल पर एक अलग ही स्थान है। इन ओडियन आईएएस अधिकारियों द्वारा साल भर पूर्व छत्तीसगढ़ के स्कूलों में ओडिय़ा भाषा को भी पढ़ाए जाने की व्यवस्था की जा चुकी है। (चारागाह है हम भोलेभाले छत्तीसगढिय़ों का छत्तीसगढ़…चर लो)

                                            चोखेलाल
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