Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                 28 मार्च 17

पहले सोशल इंजीनियरिंग और फिर शराबबंदी करके जमकर वाहवाही लूटने वाली बिहारी मुख्यमंत्री नीतिश बाबू ने छत्तीसगढ़ में किए जा रहे शराबबंदी के आंदोलन को भले ही एक दिशा दी हो परंतु साथ-साथ वे एक राजनीतिक इबारत भी लिखकर चले गए। उनकी मौजूदगी में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल के साथ रायपुर सांसद रमेश बैस का मच सांझा करना एक नई कहानी गढ़ रहा है। विधानसभा के पिछले चुनाव से कुछ पहले एक ऐसी ही तस्वीर देखी गई थी और चुनाव आते-आते भाजपा की एक दिग्गज नेत्री करुणा शुक्ला कांग्रेस की हो ली थीं।
प्रदेश भाजपा की आंतरिक राजनीति में रमेश बैस की क्या स्थिति है, यह बताने की जरूरत नहीं है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और संगठन के बड़े-बड़े नेता मजबूत दीवार बनकर उन्हें रोकने के लिए खड़े हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे ही केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार का संकेत देते हैं, रमेश बैस की उम्मीदें जाग जाती हैंं लेकिन अब तक उन्हें मौका नहीं दिया गया है। लोकसभा में सात बार से रायपुर का प्रतिनिधित्व करने वाले रमेश बैस की बे-बाकी उनके रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा बनकर सामने आती रही है।
ताजा मामला शराबबंदी का है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह एक अप्रैल से शराब बेचने पर अड़े हुए हैं, जिसका रायपुर से लेकर दिल्ली तक भाजपा का कोई नेता खुलकर विरोध नहीं कर रहा है लेकिन रमेश बैस इस मुद्दे पर खुद को रोक नहीं पा रहे हैं। सरकार के शराब बेचने के फैसले का वे शुरू से विरोध करते आ रहे हैं परंतु रविवार को तो वे इस मामले में खुलकर सामने आ गए। हालांकि वे अपने बचाव के लिए कुर्मी समाज को ढाल बना सकते हैं। यह कह सकते हैं कि वे तो समाज के कार्यक्रम में शामिल हुए थे लेकिन यह जगजाहिर है कि नीतिश कुमार का यह कार्यक्रम राज्य सरकार के शराब बेचने के फैसले के खिलाफ था, जिसमें रमेश बैस ने खुलकर हिस्सा लेकर यह संदेश दिया कि वे अपनी ही राज्य सरकार के फैसले के साथ नहीं हैं।
भाजपा की राजनीति के जानकार मानते हैं कि यह अंतिम बार था, जब रमेश बैस को लोकसभा का टिकट दिया गया था। दो साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा उन्हें अवसर नहीं देगी। इसके लिए नए चेहरे की तलाश शुरू कर दी गई है। जानकार तो यह भी कहते हैं कि भाजपा लोकसभा के अगले चुनाव में बृजमोहन अग्रवाल को मैदान पर उतार सकती है। यानी राज्य नेतृत्व को यदा-कदा मिलने वाली चुनौती भी खत्म करने की तैयारी की जा रही है। बहरहाल भूपेश बघेल के साथ मंच सांझा करने के बाद कांग्रेस और भाजपा में रमेश बैस को लेकर तरह-तरह की बातें शुरू हो गई हैं। यह कहा जा रहा है कि भाजपा में कुर्मी नेताओं की कमी नहीं है लेकिन इस कार्यक्रम से पार्टी के अधिकतर कुर्मी नेताओं ने दूरी बनाए रखी लेकिन रमेश बैस ऐसा नहीं कर पाए। वे बगावत के मूड में आ गए हैं या फिर शीर्ष नेतृत्व का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश में हैं। उनकी गतिविधियों पर पार्टी नेतृत्व की नजर है। उनका यह कदम प्रदेश भाजपा के नेतृत्व को रास आया हो, इसकी संभावना कम ही है। नीतिश कुमार की मौजूदगी में भूपेश बघेल के साथ मंच सांझा करने का फायदा उन्हें हो न हो लेकिन नुकसान की संभावना अधिक दिख रही है। अगर ऐसा हुआ तो पूरे प्रदेश को रमेश बैस के अगले कदम की प्रतीक्षा रहेगी।

                                    चोखेलाल
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