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मुखिया के मुखारी

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                     रायपुर, 25 अक्टूबर  2017
 
 
जिन लोगों ने सिप्पी बंधुओं की फिल्म शोले देखी होगी, उन्हें यह डॉयलॉग अच्छी तरह से याद होगा कि….ये हरीराम नाई है न..जेलर साहब का बहुत मुंह लगा है मुआं। यहां यह स्थिति राजधानी के क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय की है, जहां पदस्थ एक ड्राइवर को विभागीय मंत्री की नाक का बाल माना जाता है। इस विभाग और इसकी कायप्रणाली को करीब से जानने वालों का मानना है कि विभागीय मंत्री की इस ड्राइवर पर इतनी आस्था है कि वे उसकी कही गई बात को किसी कानून से कम नहीं समझते हैं। ड्राइवर की पसंद के अफसरों की रायपुर क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय में पदस्थापना होती है और बदले में यह ड्राइवर धमकाकर, जमकर वसूली करता है। वसूली की रकम कहां जाती है, किसको दी जाती है, यह बताने की जरूरत नहीं है। 
परिवहन विभाग में जिस तरह का भ्रष्टाचार है, उसका कोई भी दूसरा विभाग मुकाबला नहीं कर सकता है। यही वजह है कि इस विभाग में प्रतिनियुक्ति पर जाने वाले अफसरों की कतार लगी रहती है। इस विभाग में पदस्थ होने वाले अफसरों को सत्ता का करीबी माना जाता है। विभाग के भ्रष्टाचार को देखते हुए ही ऐसे व्यक्ति को मंत्री बनाया गया है, जो इस विधा में माहिर हो।  क्योंकि पार्टी और सरकार के होने वाले आयोजनों में तरह-तरह के खर्च और वाहनों की व्यवस्था इसी विभाग से की जाती है। स्वाभाविक है, ऐसे आयोजनों में सफेद धन का उपयोग तो नहीं होता है। 
मुख्यमंत्री कहते-कहते थक गए कि एक साल के लिए कमीशनखोरी बंद कर दो। वे बार-बार कहते हैं कि भ्रष्टाचार में जीरो टॉलरेंस होना चाहिए परंतु इसे दुर्भाग्य के अलावा क्या कहा जाएगा कि मंत्री और बड़े नौकरशाहों को छोडि़ए, परिवहन विभाग का ड्राइवर भी मुख्यमंत्री की इस अपील को खारिज कर रहा है और धड़ल्ले से काली कमाई में लगा है। उसकी काली कमाई का प्रमाण आम्रपाली सोसाइटी में भव्य इमारत है, शंकरनगर में सरकार को मुंह चिढ़ाती हवेली है और सरकार को भ्रष्टाचार मुक्त करने की बात करने बात करने वालों के गालों पर तमाचा जड़ता हुआ पचपेड़ी नाका में एक ब्बॉयज हॉस्टल है। 
एक ड्राइवर को इतनी काली कमाई करने का हौसला कहां से मिला, यह बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि जिस मंत्री की सरपरस्ती में वह इन गलत कामों को अंजाम देता है, उसके हिस्सेदार निश्चित रूप से मंत्री और विभाग के अनेक उच्चाधिकारी होंगे अन्यथा एक ड्राइवर में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह खुले आम वसूली करे और अफसर उसे बचाते रहें। एक रुपए कमाकर देने वाला ड्राइवर उसमें बीस पैसे खुद के लिए भी तो बचाएगा। सबकुछ जानते हुए भी विभागीय अफसरों का मुंह बंद है। कलम खामोश है और प्रदेश के ट्रासंपोर्टर लुट रहे हैं। उनकी कहीं भी सुनवाई नहीं है। प्रदेश में परिवहन व्यवस्था के लचर होने का एक सबसे बड़ा कारण भी यही है कि इस विभाग में सिर्फ और सिर्फ पैसे का बोलबाला है। 
प्रदेश के ट्रासपोर्टर और बस ऑपरेटर लुट रहे हैं। प्रदेशवासी बेहतर परिवहन व्यवस्था के लिए तरस रहे हैं। मनमाना किराया वसूल किया जा रहा है लेकिन प्रदेश की मीडिया खामोश है। उसे तो नेताओं के बयान छापने से फुर्सत नहीं है और वह मजबूर भी है क्योंकि परिवहन विभाग की बदौलत ही कई मीडिया कर्मियों के घर का चूल्हा जलता है और उन्हें उपकृत करने वालों में इसी प्रकार के ड्राइवर होते हैं, जो मंत्री या परिवहन अफसर के प्रतिनिधि बनकर मीडिया कर्मियों को उपकृत करते रहते हैं। चंद सिक्कों के बदले में प्रदेश की मीडिया उन लाखों लोगों को लुटने के लिए छोड़ रही है, जो रोज बसों से आना-जाना करते हैं और बस ऑपरेटरों के हाथों लूटे जाते हैं।  यात्रियों से मनमाना किराया वसूल करने के साथ ही बस ऑपरेटर यात्रियों से जिस तरह की बदसलूकी करते हैं, उसके पीछे भी इस तरह के दलाल किस्म के ड्राइवरों का हाथ होता है क्योंकि उनके माध्यम से ही ये बस ऑपरेटर सत्ता के चहेते बनते हैं। 
 
चोखेलाल
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