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मुखिया के मुखारी

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                     रायपुर, 16 नवम्बर  2017
 
 
प्रदेश के व्यापारियों के सबसे बड़े संगठन छत्तीसगढ़ चैम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इण्डस्ट्रीज के लिए अगले महीने चुनाव होने वाले हैं। नोटबंद और जीएसटी से परेशान व्यापारियों के लिए भाजपा को संदेश देने के लिए यह बेहतर अवसर हो सकता था लेकिन वे धर्मसंकट में फंस चुके हैं क्योंकि चैम्बर चुनाव के लिए अभी जो धुंधली तस्वीर दिखाई दे रही है, उसको देखकर लगता है कि चैम्बर चुनाव के माध्यम से राजधानी के दोनों मंत्री शक्ति प्रदर्शन करने मैदान पर उतरने की तैयारी कर रहे हैं। 
छत्तीसगढ़ चैम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इण्डस्ट्रीज के अब तक के चुनावों पर अगर नजर डाली जाए तो एक मंत्री के परिवार अथवा उसके समाज का ही वर्चस्व रहा है लेकिन यह पहली बार हो रहा है कि राजधानी के एक दूसरे मंत्री ने व्यापारियों की राजनीति में रुचि दिखानी शुरू कर दी है। अब वे अपने समाज को साथ लेकर चैम्बर की चुनावी राजनीति में कूदने की तैयारी कर रहे हैं। दरअसल अश्लील सीडी काण्ड के बाद इस मंत्री की छवि पर बेहद विपरीत असर पड़ा रहा। उसके राजनीतिक रसूख पर भी फर्क पड़ा है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले वे चैम्बर चुनाव के माध्यम से स्वमूल्यांकन करना चाह रहे हैं। हो सकता है कि सत्ता में बैठे कुछ बड़े राजनीतिज्ञों व नौकरशाहों का सहयोग भी उन्हें मिल जाए क्योंकि चैम्बर पर कब्जा करके वे उस मंत्री का अस्तित्व खत्म करना चाह रहे हैं, जिसके कारण प्रदेश सरकार का नेतृत्व लगातार असहज रहता है। 
इन दोनों मंत्रियों की प्रतिस्पर्धा में भाजपा के ही एक विधायक व उनका समाज फंस गया है। भाजपा के यह विधायक चैम्बर की राजनीति करते हुए ही विधायक बने और चैम्बर से उनका लगाव किसी से छिपा नहीं है। चैम्बर में उनके समाज के निर्णायक सदस्य हैं लेकिन इस विधायक के सामने यह यक्ष प्रश्न है कि वह किस मंत्री के साथ जाए। हालंकि पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी लागू करने से व्यापार समुदाय भाजपा से बेहद नाराज है लेकिन चैम्बर चुनाव में उसके पास विकल्प नहीं है और न ही आम चुनावों की तरह चैम्बर चुनाव में नोटा का विकल्प है। इस विधायक और उसके समाज को दोनों में से एक मंत्री को चुनना जरूरी होता दिख रहा है। जैसे संकेत मिल रहे हैं तो इस विधायक और उसके समाज का झुकाव उस मंत्री की तरफ है, जिसका परिवार बरसों से चैम्बर में काबिज रहा है। दूसरे मंत्री की तरफ जाने की सोचने से पहले इस विधायक के समाज के अधिकतर लोगों को उसका अपमानजनक व्यवहार और हाल ही में हुआ सीडी काण्ड याद आ जाता है। 
कुल मिलाकर विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा चैम्बर चुनाव के माध्यम से सेमी-फाइनल मैच खेलने की तैयारी कर रही है क्योंकि यहां भी मुकाबला भाजपा वर्सेस भाजपा है और अगले साल होने वाले चुनाव में भी यही तस्वीर दिखेगी। भाजपा की लड़ाई भाजपा से ही होना तय है क्योंकि जिनको टिकट के वंचित किया जाएगा वे इसी तर्ज पर चलेंगे….हम नहीं तो तुम भी नहीं। विशुध्द व्यापारियों के इस संगठन को जिस तरह सा जातिवाद के रंग में रंगा जा रहा है, उसके दूरगामी परिणाम तो निश्चित रूप से अच्छे नहीं होंगे। दोनों मंत्री चुमान के दौरान अपनी शक्तियों का भरपूर उपयोग करेंगे, जिसके माध्यम से सत्तारूढ़ दल की तस्वीर सामने आएगी और उस वक्त साबित होगा कि गुटबाजी और विरोध कांग्रेस से अधिक भाजपा में है। 
बहरहाल चैम्बर चुनाव के माध्यम से दोनों मंत्री राजधानी में अस्तित्व की लड़ाई लडऩे की तैयारी कर रहे हैं। दूसरे मंत्री को एक बार फिर भीखमचंदों और मांगीलालों (मीडिया वालों को वे इसी नाम से सम्बोधित करते हैं) के दरवाजे जाना पड़ेगा। सहयोग मांगना पड़ेगा। चूंकि उन्हें मुख्यमंत्री का दत्तक पुत्र माना जाता है, लिहाजा यह उम्मीद भी की जा रही है कि मुख्यमंत्री की सहमति से व्यापारियों को लुभाने के लिए वे कई तरह के वादे भी कर सकते हैं। मुश्किल में तो व्यापारी जगत रहेगा क्योंकि उसके पास कोई विकल्प नहीं है। वह अपना गुस्सा नहीं निकाल पाएगा। इसके लिए उसे अगले साल के अंत तक इंतजार करना पड़ेगा। तब तक उसे चैम्बर को राज्य सरकार का जेबी संगठन बनाने में सहभागिता निभानी ही पड़ेगी। 
 
चोखेलाल
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