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मुखिया के मुखारी

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति रायपुर, 01 दिसम्बर 2017

प्रदेश के करीब पौने दो लाख से अधिक शिक्षाकर्मियों ने राज्य सरकार का दिन का चैन व रातों की नींद हराम कर रखी है। शिक्षाकर्मियों की मांगों को राज्य सरकार न उगल सकती है और न ही निगल सकने की स्थिति में है। बेहद धर्मसंकट की स्थिति है। खासकर सत्तारूढ़ दल के विधायक और मंत्रियों के अलावा पार्टी के अन्य नेताओं ने क्षेत्र का दौरा करना बंद कर दिया है क्योंकि जहां भी जाते हैं, उनका सामना शिक्षाकर्मियों या उनके परिजनों से हो जाता है और उन्हें खरी-खोटी सुननी पड़ती है।
संविलियन की मांग को लेकर प्रदेश के शिक्षाकर्मियों ने समय रहते आंदोलन करने की चेतावनी दे दी थी लेकिन राज्य सरकार खासकर पंचायत व ग्रामीण विकास विभाग ने उन्हें हलके में लिया। इतना ही नहीं विभागीय अफसरों ने भांति-भांति के बयान देकर और दिलवाकर शिक्षाकर्मियों को भरपूर उकसाया। कहा जाता है कि इसके लिए विभाग के एक आला अफसर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई क्योंकि अब वे इस विभाग के साथ ही सेवा से भी निवृत हो चुके हैं।
चोखेलाल को बताया गया कि एक नियोजित रणनीति से शिक्षाकर्मियों के मसले पर मुख्यमंत्री के भी फंसा दिया गया। आमतौर पर किसी भी आंदोलन की समाप्ति से पहले प्रतिनिधिमंडल को मुख्यमंत्री से मिलवाया जाता है ताकि वे सरकार के प्रति केवल आभार जता सकें, लेकिन शिक्षाकर्मियों के मुद्दे पर उन्हें मुख्यमंत्री के सामने बिठा दिया गया और मुख्यमंत्री को ब्रीफ कर दिया गया कि शिक्षाकर्मियों की मांगें मानना संभव नहीं है परिणामस्वरूप मुख्यमंत्री की टेबल पर वार्ता विफल हो गई। इससे पहले शायद ही कोई उदाहरण मिले, जिसमें मुख्यमंत्री के सामने पहुंचकर वार्ता टूट जाए।
बहरहाल इस वार्ता के टूट जाने से सबसे अधिक दिक्कत में भाजपा के जनप्रतिनिधि हैं क्योंकि उनके क्षेत्र के मतदाताओं के अलावा परिवार के सदस्य भी शिक्षाकर्मी हैंं। क्षेत्र में जली-कटी सुनने के बाद घर लौटते हैं तो वहां भी ताने सुनने को मिलते हैं। यही वजह है कि दो रोज पहले हुई कैबिनेट की बैठक में मंत्रियों ने अपनी पीड़ा से नौकरशाही को अवगत कराते हुए लगभग चिरौरी करने के अंदाज में उनसे कहा कि कुछ भी कीजिए, इस समस्या का हल निकालिए क्योंकि सत्तारूढ़ दल के सभी जनप्रतिनिधियों को अच्छी तरह पता है कि शिक्षाकर्मियों के नाराज होने का साफ मतलब है, सरकार में लौटने की राह कठिन होना। प्रदेश में शिक्षाकर्मियों का बड़ा वोट बैंक है, जिसको ध्यान में रखकर ही कांग्रेस और छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस ने उन पर डोरे डालना शुरू कर दिया है। छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस सुप्रीमो ने साफ कह दिया है कि उनकी सरकार बनी तो मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के तुरंत बाद वे पहला आदेश शिक्षाकर्मियों के संविलियन का करेंगे।
प्रदेश के ढाई लाख से अधिक शिक्षाकर्मी और उनका परिवार राज्य सरकार की बातों से आहत है। सरकार यह कह रही है कि तीस हजार मानदेय पाने वाले शिक्षाकर्मियों को बर्खास्त करके छह-छह हजार रुपए के मानदेय में नए शिक्षाकर्मियों की भर्ती कर दी जाए। इससे खर्च तो नहीं बढ़ेगा पर शिक्षाकर्मियों की संख्या जरूर बढ़ जाएगी। इस तरह की राय देने वाले नौकरशाहों को राज्य सरकार का हितैषी तो नहीं कहा जा सकता। इसका मतलब साफ है कि ऐसे नौकरशाह अब इस सरकार की विदाई चाहते हैं। क्योंकि सत्रह साल के छत्तीसगढ़ में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और नौकरशाहों ने जब चाह, जितना चाहा, अपना वेतन बढ़ा लिया लेकिन जब अन्य शासकीय सेवकों की बारी आई तो खजाना खाली दिखा दिया गया। सरकार के इस रवैये से जहां शिक्षाकर्मी अपमानित महसूस कर रहे हैं वहीं स्कूली बच्चों को मिडडे मील बनाने वाले रसोइयों की आफत भी बढ़ गई है क्योंकि वे भी आंदोलनरत है। इसके बाद अगर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने भी आंदोलन कर दिया तो भारतीय जनता पार्टी को सत्ता वापसी की कोशिशें बंद कर देनी चाहिए क्योंकि इन सभी का गांव-गांव में नेटवर्क है और उनमें सरकार बनाने व बिगाडऩे की पूरी क्षमता है।
बहरहाल राज्य सरकार के कुछ नुमाइंदे साम,दाम,दंड और भेद की रणनीति अपनाकर शिक्षाकर्मियों व रसोइयों के आंदोलन को तोडऩे की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। इन दोनों वर्गों के लिए भी यह अस्तित्व की लड़ाई है क्योंकि अगर अब नहीं हुआ तो यह तय है कि शिक्षाकर्मियों के संविलियन कभी नहीं होगा क्योंकि राजनीतिक दल कोई भी हो, वह तभी तक इन वर्गों के साथ है, जब तक सत्ता की चाभी उनके हाथों में नहीं आ जाती। एक बार कुर्सी मिली तो फिर कौन शिक्षाकर्मी, किस तरह के रसोइए और कौन आंगनबाड़ी कार्यकर्ता।

चोखेलाल
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