Uncategorized

मुखिया के मुखारी

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                 रायपुर, 20 दिसम्बर 2017
 
 
 
भारतीय जनता पार्टी भले ही गुजरात में सरकार बनाने में कामयाब रही है और देशभर में इस जीत का जश्न मना रही हो लेकिन  वहां कांग्रेस ने जिस तरह से सत्तारूढ़ दल को कड़ी टक्कर दी है, उसको देखकर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सोच में पड़ गया है। भाजपा ने गुजरात में पूरी ताकत झोंक दी थी। प्रधानमंत्री से लेकर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लगातार गुजरात में रहे और एक राज्य के चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा बनाकर लड़ते रहे। परिणाम भाजपा की अपेक्षा के अनुरूप नहीं निकला लेकिन इस चुनाव ने कांग्रेस नेताओं का मनोबल बढ़ा दिया है। 
दिखावे के लिए भाजपा की जीत का जश्न छत्तीसगढ़ में भी मनाया गया लेकिन अनौपचारिक चर्चा में पार्टी के बड़े नेता अब यह कहने लगे हैं कि पूरी ताकत लगाने के बाद कांग्रेस ने प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के गृहराज्य में नेक टू नेक मुकाबला किया तो अगले साल छत्तीसगढ़ की स्थिति सोचनीय है। यहां पर तो पार्टी गुजरात की तरह न ताकत झोकेगी और न ही प्रतिष्ठा ही दांव पर लगाएगी। यहां पर तो अपनी इमेज और काम के बल पर चुनाव लडऩा पड़ेगा, जिसके सहारे नैया पार लगना थोड़ा मुश्किल ही दिख रहा है। 
गुजरात चुनाव के परिणामों को देखकर यहां के मंत्री सिहरे हुए हैं क्योंकि गुजरात में रूपाणी सरकार के नौ मंत्रियों को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। कुछ महीनों बाद यहां के मंत्रियों को भी चुनाव मैदान पर उतरना है लेकिन गुजरात के नतीजे उन्हें अभी से डराने लगे हैं। रातों में उन्हें भयानक सपने दिखाई देने लगे हैं। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने गुजरात में कई मंत्रियों को मैदान पर उतारने का जोखिम लिया था लेकिन परिणामों को देखकर अब अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में सर्वाधिक संकट मंत्रियों पर ही दिखाई दे रहा है क्योंकि जनमानस की मंत्रियों से जिस तरह की नाराजगी है, उसका खामियाजा आखिरकार पार्टी को भुगतना पड़ रहा है। इसलिए राजनीति के जानकारों को कहना है कि अगले सालांत में होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव में भाजपा उन्हीं मंत्रियों पर दांव खेलेगी जिनकी जीत असंदिग्ध हो और इस प्रकार के मंत्रियों की संख्या दो-तीन से अधिक नहीं है। 
बहरहाल जीत की खुमारी से उभरने के बाद प्रदेश भाजपा चुनावी तैयारियां शुरू कर रही है क्योंकि उसके पास एक बड़ा लक्ष्य  (90 में से 65 सीटों पर जीत का) है। यह लक्ष्य पार्टी को राष्ट्रीय अध्यक्ष देकर गए हैं। वैसे अब तक प्रदेश भाजपा ने जिस तरह की तैयारी की है, उसको देखकर लगता है कि अगर वह 2013 के अंक को ही पकड़ ले तो बड़ी बात होगी क्योंकि प्रदेश सरकार से जिस तरह से नाराजगी है, उसका असर चुनाव में जरूर दिखेगा। ताजा उदाहरण प्रदेश के करीब पौने दो लाख शिक्षाकर्मी हैं, जिन्हें रातों-रात अपनी हड़ताल खत्म करनी पड़ी। भाजपा के रणनीतिकारों को यह हर्गिज भी नहीं भूलना चाहिए कि 2013 के चुनाव में मतगणना के दिन पार्टी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। ले-देकर सरकार बनाने में कामयाब रही थी। कांग्रेस से मात्र 74 हजार मत अधिक पाने पर उसे सत्ता हासिल हो पाई है। इस बार किसान, मजदूर, शासकीय सेवक,. शिक्षाकर्मी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सामान्य जनमानस जिस तरह से आक्रोशित है, उसको देखकर अगले सालांत की धुंधली तस्वीर धीरे-धीरे साफ होती जा रही है। फिलहाल कोई भी सरकार के खिलाफ बोलने का साहस नहीं कर रहा है लेकिन होली के बाद प्रदेशवासियों के सुर जिस तरह से बदलने वाले हैं, उसके संकेत अभी से मिलने लगे हैं। 
रही बात कांग्रेस की  तो गुजरात और छत्तीसगढ़ में एक समानता है। छत्तीसगढ़ की तरह गुजरात में भी कांग्रेस के पास पूरे प्रदेश की स्वीकार्यता वाला कोई भी नेता नहीं है। बावजूद इसके कांग्रेस ने उम्दा प्रदर्शन करके यह साबित कर दिया कि भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत बनाने का सपना पूरा होना मुमकिन नहीं है क्योंकि सत्तारूढ़ दल के विकल्प के रूप में आज भी देश और प्रदेश में कांग्रेस की स्वीकार्यता है। कांग्रेस अगर रणनीति बनाकर राजनीति करे और जनमानस से जुड़े हुए मुद्दों को लेकर परिणामोन्मुखी लड़ाई लड़े तो भाजपा को कड़ी टक्कर देने से उसे कोई नहीं रोक सकता है लेकिन सभी जानते हैं कि कांग्रेस महत्वाकांक्षी नेताओं की पार्टी है और उसके नेताओं को सच में एक करना बेहद मुश्किल काम है। गुजरात चुनाव के बाद पार्टी के नए अध्यक्ष राहुल गांधी के मार्गदर्शन में प्रदेश कांग्रेस के काम करने की दिशा किस तरह होती है, यह देखना जरूरी होगा क्योंकि उसी पर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजे निर्भर करेंगे।
चोखेलाल
——————
आपसे आग्रह: कृपया चोखेलाल की टिप्पणियों पर नियमित रूप से अपनी राय व सुझाव दें, ताकि इसे बेहतर बनाया जा सके।
 
भारतीय जनता पार्टी भले ही गुजरात में सरकार बनाने में कामयाब रही है और देशभर में इस जीत का जश्न मना रही हो लेकिन  वहां कांग्रेस ने जिस तरह से सत्तारूढ़ दल को कड़ी टक्कर दी है, उसको देखकर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सोच में पड़ गया है। भाजपा ने गुजरात में पूरी ताकत झोंक दी थी। प्रधानमंत्री से लेकर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लगातार गुजरात में रहे और एक राज्य के चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा बनाकर लड़ते रहे। परिणाम भाजपा की अपेक्षा के अनुरूप नहीं निकला लेकिन इस चुनाव ने कांग्रेस नेताओं का मनोबल बढ़ा दिया है। 
दिखावे के लिए भाजपा की जीत का जश्न छत्तीसगढ़ में भी मनाया गया लेकिन अनौपचारिक चर्चा में पार्टी के बड़े नेता अब यह कहने लगे हैं कि पूरी ताकत लगाने के बाद कांग्रेस ने प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के गृहराज्य में नेक टू नेक मुकाबला किया तो अगले साल छत्तीसगढ़ की स्थिति सोचनीय है। यहां पर तो पार्टी गुजरात की तरह न ताकत झोकेगी और न ही प्रतिष्ठा ही दांव पर लगाएगी। यहां पर तो अपनी इमेज और काम के बल पर चुनाव लडऩा पड़ेगा, जिसके सहारे नैया पार लगना थोड़ा मुश्किल ही दिख रहा है। 
गुजरात चुनाव के परिणामों को देखकर यहां के मंत्री सिहरे हुए हैं क्योंकि गुजरात में रूपाणी सरकार के नौ मंत्रियों को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। कुछ महीनों बाद यहां के मंत्रियों को भी चुनाव मैदान पर उतरना है लेकिन गुजरात के नतीजे उन्हें अभी से डराने लगे हैं। रातों में उन्हें भयानक सपने दिखाई देने लगे हैं। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने गुजरात में कई मंत्रियों को मैदान पर उतारने का जोखिम लिया था लेकिन परिणामों को देखकर अब अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में सर्वाधिक संकट मंत्रियों पर ही दिखाई दे रहा है क्योंकि जनमानस की मंत्रियों से जिस तरह की नाराजगी है, उसका खामियाजा आखिरकार पार्टी को भुगतना पड़ रहा है। इसलिए राजनीति के जानकारों को कहना है कि अगले सालांत में होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव में भाजपा उन्हीं मंत्रियों पर दांव खेलेगी जिनकी जीत असंदिग्ध हो और इस प्रकार के मंत्रियों की संख्या दो-तीन से अधिक नहीं है। 
बहरहाल जीत की खुमारी से उभरने के बाद प्रदेश भाजपा चुनावी तैयारियां शुरू कर रही है क्योंकि उसके पास एक बड़ा लक्ष्य  (90 में से 65 सीटों पर जीत का) है। यह लक्ष्य पार्टी को राष्ट्रीय अध्यक्ष देकर गए हैं। वैसे अब तक प्रदेश भाजपा ने जिस तरह की तैयारी की है, उसको देखकर लगता है कि अगर वह 2013 के अंक को ही पकड़ ले तो बड़ी बात होगी क्योंकि प्रदेश सरकार से जिस तरह से नाराजगी है, उसका असर चुनाव में जरूर दिखेगा। ताजा उदाहरण प्रदेश के करीब पौने दो लाख शिक्षाकर्मी हैं, जिन्हें रातों-रात अपनी हड़ताल खत्म करनी पड़ी। भाजपा के रणनीतिकारों को यह हर्गिज भी नहीं भूलना चाहिए कि 2013 के चुनाव में मतगणना के दिन पार्टी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। ले-देकर सरकार बनाने में कामयाब रही थी। कांग्रेस से मात्र 74 हजार मत अधिक पाने पर उसे सत्ता हासिल हो पाई है। इस बार किसान, मजदूर, शासकीय सेवक,. शिक्षाकर्मी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सामान्य जनमानस जिस तरह से आक्रोशित है, उसको देखकर अगले सालांत की धुंधली तस्वीर धीरे-धीरे साफ होती जा रही है। फिलहाल कोई भी सरकार के खिलाफ बोलने का साहस नहीं कर रहा है लेकिन होली के बाद प्रदेशवासियों के सुर जिस तरह से बदलने वाले हैं, उसके संकेत अभी से मिलने लगे हैं। 
रही बात कांग्रेस की  तो गुजरात और छत्तीसगढ़ में एक समानता है। छत्तीसगढ़ की तरह गुजरात में भी कांग्रेस के पास पूरे प्रदेश की स्वीकार्यता वाला कोई भी नेता नहीं है। बावजूद इसके कांग्रेस ने उम्दा प्रदर्शन करके यह साबित कर दिया कि भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत बनाने का सपना पूरा होना मुमकिन नहीं है क्योंकि सत्तारूढ़ दल के विकल्प के रूप में आज भी देश और प्रदेश में कांग्रेस की स्वीकार्यता है। कांग्रेस अगर रणनीति बनाकर राजनीति करे और जनमानस से जुड़े हुए मुद्दों को लेकर परिणामोन्मुखी लड़ाई लड़े तो भाजपा को कड़ी टक्कर देने से उसे कोई नहीं रोक सकता है लेकिन सभी जानते हैं कि कांग्रेस महत्वाकांक्षी नेताओं की पार्टी है और उसके नेताओं को सच में एक करना बेहद मुश्किल काम है। गुजरात चुनाव के बाद पार्टी के नए अध्यक्ष राहुल गांधी के मार्गदर्शन में प्रदेश कांग्रेस के काम करने की दिशा किस तरह होती है, यह देखना जरूरी होगा क्योंकि उसी पर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजे निर्भर करेंगे।
चोखेलाल
——————
आपसे आग्रह: कृपया चोखेलाल की टिप्पणियों पर नियमित रूप से अपनी राय व सुझाव दें, ताकि इसे बेहतर बनाया जा सके।
 
भारतीय जनता पार्टी भले ही गुजरात में सरकार बनाने में कामयाब रही है और देशभर में इस जीत का जश्न मना रही हो लेकिन  वहां कांग्रेस ने जिस तरह से सत्तारूढ़ दल को कड़ी टक्कर दी है, उसको देखकर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सोच में पड़ गया है। भाजपा ने गुजरात में पूरी ताकत झोंक दी थी। प्रधानमंत्री से लेकर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लगातार गुजरात में रहे और एक राज्य के चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा बनाकर लड़ते रहे। परिणाम भाजपा की अपेक्षा के अनुरूप नहीं निकला लेकिन इस चुनाव ने कांग्रेस नेताओं का मनोबल बढ़ा दिया है। 
दिखावे के लिए भाजपा की जीत का जश्न छत्तीसगढ़ में भी मनाया गया लेकिन अनौपचारिक चर्चा में पार्टी के बड़े नेता अब यह कहने लगे हैं कि पूरी ताकत लगाने के बाद कांग्रेस ने प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के गृहराज्य में नेक टू नेक मुकाबला किया तो अगले साल छत्तीसगढ़ की स्थिति सोचनीय है। यहां पर तो पार्टी गुजरात की तरह न ताकत झोकेगी और न ही प्रतिष्ठा ही दांव पर लगाएगी। यहां पर तो अपनी इमेज और काम के बल पर चुनाव लडऩा पड़ेगा, जिसके सहारे नैया पार लगना थोड़ा मुश्किल ही दिख रहा है। 
गुजरात चुनाव के परिणामों को देखकर यहां के मंत्री सिहरे हुए हैं क्योंकि गुजरात में रूपाणी सरकार के नौ मंत्रियों को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। कुछ महीनों बाद यहां के मंत्रियों को भी चुनाव मैदान पर उतरना है लेकिन गुजरात के नतीजे उन्हें अभी से डराने लगे हैं। रातों में उन्हें भयानक सपने दिखाई देने लगे हैं। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने गुजरात में कई मंत्रियों को मैदान पर उतारने का जोखिम लिया था लेकिन परिणामों को देखकर अब अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में सर्वाधिक संकट मंत्रियों पर ही दिखाई दे रहा है क्योंकि जनमानस की मंत्रियों से जिस तरह की नाराजगी है, उसका खामियाजा आखिरकार पार्टी को भुगतना पड़ रहा है। इसलिए राजनीति के जानकारों को कहना है कि अगले सालांत में होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव में भाजपा उन्हीं मंत्रियों पर दांव खेलेगी जिनकी जीत असंदिग्ध हो और इस प्रकार के मंत्रियों की संख्या दो-तीन से अधिक नहीं है। 
बहरहाल जीत की खुमारी से उभरने के बाद प्रदेश भाजपा चुनावी तैयारियां शुरू कर रही है क्योंकि उसके पास एक बड़ा लक्ष्य  (90 में से 65 सीटों पर जीत का) है। यह लक्ष्य पार्टी को राष्ट्रीय अध्यक्ष देकर गए हैं। वैसे अब तक प्रदेश भाजपा ने जिस तरह की तैयारी की है, उसको देखकर लगता है कि अगर वह 2013 के अंक को ही पकड़ ले तो बड़ी बात होगी क्योंकि प्रदेश सरकार से जिस तरह से नाराजगी है, उसका असर चुनाव में जरूर दिखेगा। ताजा उदाहरण प्रदेश के करीब पौने दो लाख शिक्षाकर्मी हैं, जिन्हें रातों-रात अपनी हड़ताल खत्म करनी पड़ी। भाजपा के रणनीतिकारों को यह हर्गिज भी नहीं भूलना चाहिए कि 2013 के चुनाव में मतगणना के दिन पार्टी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। ले-देकर सरकार बनाने में कामयाब रही थी। कांग्रेस से मात्र 74 हजार मत अधिक पाने पर उसे सत्ता हासिल हो पाई है। इस बार किसान, मजदूर, शासकीय सेवक,. शिक्षाकर्मी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सामान्य जनमानस जिस तरह से आक्रोशित है, उसको देखकर अगले सालांत की धुंधली तस्वीर धीरे-धीरे साफ होती जा रही है। फिलहाल कोई भी सरकार के खिलाफ बोलने का साहस नहीं कर रहा है लेकिन होली के बाद प्रदेशवासियों के सुर जिस तरह से बदलने वाले हैं, उसके संकेत अभी से मिलने लगे हैं। 
रही बात कांग्रेस की  तो गुजरात और छत्तीसगढ़ में एक समानता है। छत्तीसगढ़ की तरह गुजरात में भी कांग्रेस के पास पूरे प्रदेश की स्वीकार्यता वाला कोई भी नेता नहीं है। बावजूद इसके कांग्रेस ने उम्दा प्रदर्शन करके यह साबित कर दिया कि भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत बनाने का सपना पूरा होना मुमकिन नहीं है क्योंकि सत्तारूढ़ दल के विकल्प के रूप में आज भी देश और प्रदेश में कांग्रेस की स्वीकार्यता है। कांग्रेस अगर रणनीति बनाकर राजनीति करे और जनमानस से जुड़े हुए मुद्दों को लेकर परिणामोन्मुखी लड़ाई लड़े तो भाजपा को कड़ी टक्कर देने से उसे कोई नहीं रोक सकता है लेकिन सभी जानते हैं कि कांग्रेस महत्वाकांक्षी नेताओं की पार्टी है और उसके नेताओं को सच में एक करना बेहद मुश्किल काम है। गुजरात चुनाव के बाद पार्टी के नए अध्यक्ष राहुल गांधी के मार्गदर्शन में प्रदेश कांग्रेस के काम करने की दिशा किस तरह होती है, यह देखना जरूरी होगा क्योंकि उसी पर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजे निर्भर करेंगे।
चोखेलाल
——————
आपसे आग्रह: कृपया चोखेलाल की टिप्पणियों पर नियमित रूप से अपनी राय व सुझाव दें, ताकि इसे बेहतर बनाया जा सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *