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मुखिया के मुखारी

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                     रायपुर, 21 दिसम्बर 2017
 
 
किसी लाइन को अगर छोटी करना है तो उसे मिटाने की जरूरत नहीं है, उसके बगल में एक बड़ी लाइन खींच दीजिए, वह स्वत: छोटी हो जाएगी। भारतीय जनता पार्टी की आंतरिक राजनीति में इन दिनों कुछ ऐसा ही चल रहा है। करीब छह महीने पहले कोरबा में हुई भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के बाद एक बयान सुर्खियों में रहा था, जिसमें कहा गया था कि अगले साल होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव के बाद अगर पार्टी को चौथी बार सरकार बनाने का जनादेश मिलता है तो प्रदेश का नेतृत्व पार्टी की शीर्ष नेतृत्व तय करेगा। इस बयान के कई मायने निकाले गए और पार्टी के अंदर तरह-तरह की चर्चाएं होती रहीं। 
दरअसल इस बयान को हवा में उछालने का काम पार्टी की एक राष्ट्रीय स्तर की नेत्री ने किया, जो लोकसभा का पिछला चुनाव हराए जाने की पीड़ा से अब तक उबर नहीं पाई हैं। उसे अच्छी तरह से पता है कि प्रदेश भाजपा के अनेक कद्दावर व प्रभावशील नेताों को वह पसंद नहीं है जिसके कारण उसकी राजनीतिक राह में रोड़े अटकाए जाते रहे हैं और आगे भी रास्ता रोका जा सकता है। शायद यही वजह है कि उसने प्रदेश की राजनीति में नए सिरे से प्रवेश करने के लिए दिल्ली का रास्ता चुना। 
प्रदेश भाजपा के सत्ता और संगठन से ताल्लुक रखने वाले अने प्रभावशाली नेताओं को उस समय सांप सूंघ गया, जब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने तय किया कि केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली के साथ मुख्यमंत्री चुनने के लिए यह नेत्री संगठन की तरफ से पर्यवेक्षक रहेगी और अहमदाबाद जाकर विधायकों से रायशुमारी करेगी। निश्चित रूप से प्रदेश भाजपा के लिए यह गौरव की बात हो सकती थी परंतु पार्टी के किसी भी नेता ने इस उपलब्धि के लिए उस नेत्री को बधाई नहीं दी। यह बताने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए गुजरात में चुनाव जीतना कितना महत्वपूर्ण था और जब वहां जीत मिल गई तो संगठन ने छत्तीसगढ़ की इस नेत्री पर भरोसा करके यह संकेत दे दिया कि अगले साल होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव में उसकी सक्रिय भागीदारी से इनकार नहीं किया जा सकता है। पार्टी धीरे-धीरे इस नेत्री को छत्तीसगढ़ में पुन: स्थापित करने में लगी है। 
वैसे लोकसभा के पिछले चुनाव में इस नेत्री के पराजय की पूरी पड़ताल योगी आदित्यनाथ के एक मंत्री ने की और उसने जो रिपोर्ट पार्टी के शीर्ष संगठन को सौंपी है अगर उसका खुलासा कर दिया जाए तो प्रदेश के ऐसे कई नेता बे-नकाब हो जाएंगे, जिन्हें भाजपा का चेहरा माना जाता है। शायद यही वजह है कि विधानसभा चुनाव में पार्टी इस नेत्री को अपनी देखरेख में उतारने की तैयारी कर रही है ताकि अब अगर किसी ने भितरघात किया तो बताने की जरूरत नहीं है कि उसका क्या हश्र किया जाएगा। 
इस नेत्री के माध्यम से भाजपा का शीर्ष नेतृत्व प्रदेश में एक नया पॉवर प्वाइंट तैयार करने में लगा हुआ है और यह काम विधानसभा चुनाव से पहले तक पूरा कर लिया जोगा ताकि प्रदेश भाजपा के किसी भी बड़े नेता को यह गुमान न हो पाए कि अगर उसने साथ नहीं दिया तो पार्टी की भट्ठा बैठ जाएगा। प्रदेश में होने वाली सभी राजनीतिक के साथ पार्टी के अंदर चलने वाली खींचतान पर शीर्ष नेतृत्व की पैनी नजर है। खासकर शिक्षाकर्मियों की हड़ताल को तोडऩे के लिए जो तौर-तरीका अपनाया गया, उसको लेकर पार्टी नेतृत्व खुश नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने तो इस पर गहरी नाराजागी जताई है। संघ के एक बड़े स्वयंसेवक ने भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के एक नेता से यह तक कह दिया कि इसके बाद पार्टी या संघ को आपातकाल की विरोध करने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि इस प्रकार का अत्याचार तो आपातकाल में भी नहीं हुआ है। 
पार्टी के अंदर भी शिक्षाकर्मियों की हड़ताल को तोडऩे के तरीके को लेकर को लेकर नाखुशी है क्योंकि पार्टी के नेता किसी भी जगह पर दौरे पर जाते हैं, उन्हें सरकार के खिलाफ सुनना पड़ता है। शायद यही वजह है कि शिक्षाकर्मियों को साधने के लिए अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आगे किया गया है लेकिन जिस तरह की प्रताडऩा शिक्षाकर्मियों ने झेली है, उसको देखकर लगता तो नहीं है कि वे आसानी से सध जाएंगे। बहरहाल गुजरात चुनाव के नतीजों को देखकर सहमी प्रदेश भाजपा अपनी रणनीति में तेजी से बदलाव करने की जुगत में है क्योंकि सभी जानते हैं और अलग-अलग स्त्रोतों से सरकार को भी पता चल चुका है कि सत्तारूढ़ दल के खिलाफ एण्टी-इनकम्बैंसी तेजी से बढ़ी है। पहले किसानों के आत्महत्याओं, फिर बोनस की मांग और अब शिक्षाकर्मियों की नाराजगी का व्यापक असर दिखने लगा है। इसको रोकना और नाराजगी दूर सरकना सत्तारूढ़ दल के लिए बड़ी चुनौती है। देखने वाली बात होगी कि आने वाले चार-छह महीनों में सत्तारूढ़ दल की कार्यशैली में किस तरह का बदलाव आएगा क्योंकि सरकार ऐसा करेगी, इसमें शक है। वह तो नौकरशाहों के चंगुल में फंसी हुई है जो उसे एक ही सलाह देते हैं कि कट जाइए परंतु झुकिएगा नहंीं। 
 
चोखेलाल
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