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मुखिया के मुखारी

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                 रायपुर, 24 दिसम्बर 2017
 
करीब साढ़े चार साल पहले हुआ झीरम नरसंहार एक बार सबकी आंखों के सामने घूम गया। 25 मई 2013 की शाम का मंजर जिसने भी देखा या सुना था, वे सभी एक बार कांप गए क्योंकि सबकी आंखों के सामने कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे विद्याचरण शुक्ल, नंदकुमार पटेल,नंदकुमार पटेल, उदय मुदलियार और नौजवान दिनेश पटेल के लहु-लुहान शव दिखाई देने लगे। दरअसल बात ही ऐसी हुई कि सबको वह ह्रदय विदारक दृश्य याद आने लगे। 
बात हो रही है विधानसभा के शीतकालीन सत्र की, जिसमें हास-परिहास के दौरान मुख्यमंत्री ने यह कह दिया कि कांग्रेस विधायक कवासी लखमा ने अगर सच बोल दिया तो छत्तीसगढ़ ही नहीं पूरे देश में हाहाकार मच जाएगा। प्रदेशवासी भले ही सोचें कि यह बात सदन के वातावरण को हलका करने के लिए कही गई है परंतु इसमें कोई दो राय नहीं कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह एक सधे हुए राजनीतिज्ञ हैं। उन्हें पता है कि कब, कहां और क्या बोलना है। सभी जानते हैं कि बस्तर की बारह सीटों पर भाजपा अपेक्षाकृत कमजोर है। खासकर कोण्टा विधानसभा से कवासी लखमा को पराजित करने थोड़ा मुश्किल है क्योंकि वहां भाजपा के पास ऐसा एक भी चेहरा नहीं है, जिसे जीतने योग्य माना जाए। ऐसी स्थिति में भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि अगर कोण्टा जीते तो बस्तर की राह आसान हो सकती है। इसी रणनीति के तहत मुख्यमंत्री ने झीरम काण्ड का नाम लिए बिना यह कह दिया कि कवासी लखमा बड़ी-बड़ी बातों के राजदार हैं। 
मुख्यमंत्री ने अपने इस बयान से एक तीर से दो निशाने साधे हैं। एक तो उन्होंने कांग्रेस के अंदर कवासी लखमा को संदेही बना दिया और दूसरा यह संदेश दिया कि झीरम जैसे ह्रदय विदारक नरसंहार का खुलासा केवल इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि कवासी लखमा जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी मुंह बंद करके बैठे हुए हैं। वैसे एक संकेत और मिला कि झीरम नरसंहार के पीछे की कहानी से मुख्यमंत्री भी अनभिज्ञ नहीं हैं। 
गेंद अब कांग्रेस के पाले में हैं। मुख्यमंत्री की हैसियत से डॉ. रमन सिंह ने संकेत दे दिया है। अब आगे की कार्रवाई प्रदेश कांग्रेस या उनके बड़े नेताओं को करनी है। कांग्रेस अगर चाहती है कि झीरम नरसंहा का खुलासा हो तो उसे कवासी लखमा से किसी भी स्थिति में सबकुछ उगलवाना पड़ेगा क्योंकि कवासी लखमा ही बता सकते हैं कि नंदकुमार पटेल के नेतृत्व में निकाली जा रही परिवर्तन यात्रा का रास्ता किसके कहने पर बदला गया था। उन्हें अच्छी तरह से पता है कि झीरम में नक्सलियों ने किसके लिए एम्बुश लगाया था। वे यह भी जानते हैं कि हमलावरों का नेतृत्व कौन कर रहा था। यह सब सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि गोलीबारी के बीच नक्सलियों ने न केवल कवासी लखमा को वहां से जाने दिया बल्कि उन्हें वहां से जाने से लिए चाभी लगी मोटर साइकिल भी लिए। बेशक किसी जांच एजेंसी के सामने कवासी लखमा ने कुछ भी नहीं बताया हो लेकिन जिस आत्मविश्वास के साथ विधानसभा में मुख्यमंत्री बोल रहे थे, उससे यही प्रतिध्वनित हो रहा है कि कवासी लखमा ने उन्हें अन ऑफिशियली सबकुछ बता दिया है कि इस लोमहर्षक घटना के पीछे की राजनीति क्या है और उसमें किसकी मिलीभगत है। 
वैसे सभी जानते हैं कि झीरम काण्ड को भले ही नक्सलियों ने अंजाम दिया हो परंतु यह राजनीतिक घटना है, जिसमें प्रदेश के ही कुछ बड़े और कद्दावर नेताओं की मिलीभगत है। एनआईए और सीबीआई जैसी देश की बड़ी जांच एजेंसियों ने भले ही इस घटना की जांच से हाथ खड़े कर दिए हों लेकिन प्रदेश की ढाई करोड़ जनता हमेशा यह जानना चाहेगी कि विद्याचरण शुक्ल, नंदकुमार पटेल, महेंद्र कर्मा और उदय मुदलियार जैसे नेताओं से किसको खतरा था। ऐसे कौन लोग हैं जो इन सबको जिंदा नहीं देखना चाहते थे और वे कौन से चेहरे हैं जिन्होंने नक्सलियों से मिलीभगत करके देश की सबसे बड़ी वारदात को अंजाम दिलाया। सभी को वक्त का इंतजार है। एक न एक दिन सच्चाई जरूर सामने आएगी, तब वे चेहरे सामने आएंगे लेकिन तब तक वे चेहरे कहां औ्र कैसे होंगे, यह देखने वाली बात होगी। 
 
चोखेलाल
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