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मुखिया के मुखारी

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                     रायपुर, 28 दिसम्बर 2017
 
 
विधायिका और कार्यपालिका में शक्तिशाली कौन है, लोकतंत्र में इसका स्वाभाविक जवाब विधायिका है क्योंकि इसमें वह शख्सियतें शामिल होती हैं, जिन्हें जनमानस चुनता है और अपने भविष्य को गढऩे का अधिकार देता है लेकिन छत्तीसगढ़ के परिप्रेक्ष्य में यह जवाब लगातार गलत साबित होता जा रहा है क्योंकि छत्तीसगढ़ की निर्वाचित भाजपा सरकार में कार्यपालिका जितनी ताकतवर है, वैसे उदाहरण देश के किसी भी राज्य में देखने को नहीं मिलेगा। प्रदेश के नौकरशाह हर पल निर्वाचित जनप्रतिनिधयों को उनकी औकात दिखाते रहते हैं। हर बार यह संदेश देते हैं कि भले उन्हें जनता ने चुना होगा लेकिन प्रदेश में होगा वही, जो नौकरशाह चाहेगा। 
ताजा उदाहरण राजधानी के पण्डरी इलाके का है, जहां ऑक्सीजोन बनाने के लिए नगर निगम ने सत्तर दुकानदारों को उखाड़ फेंका। सूरज की किरणों के निकलने से पहले खालसा स्कूल के सामने का छोटा सा शॉपिंग एरिया मैदान में तब्दील हो चुका था। राज्य की भाजपा सरकार की नजर में रोजी-रोटी से अधिक ऑक्सीजोन महत्वपूर्ण है। दुकानों को तोडऩे से पहले तथाकथित संवेदनशील सरकार और उसके नौकरशाहों ने यह नहीं सोचा कि उन सत्तर परिवारों का क्या होगा, जिनके घर में चूल्हा इन्हीं दुकानों की बदौलत जलता है। नौकरशाहों को तो बस अपने नम्बर बढ़ाने से मतलब है ताकि देशभर में वे इस बात के लिए ख्याति हासिल कर सकें कि रायपुर को प्रदूषण से निजात दिलाने के लिए उन्होंने ऑक्सी जोन बनाया है। 
किसी को ऑक्सी जोन से विरोध नहीं है। विरोध इस बात का है कि दुकानदारों के पेट पर लात मारकर इसे न बनाया जाए। नगर निगम के महापौर के साथ सत्तारूढ़ दल के विधायक ने भी निगम आयुक्त को चिट्ठी लिखी और साफ कहा कि दुकानों को ऐसी जगह विस्थापित किया जाए, जहां से उनकी रोजी-रोटी चल सके, लेकिन जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि प्रदेश का कोई भी नौकरशाह किसी भी जनप्रतिनिधि को अपमानित करना अपना पहला फर्ज समझता है। नगर निगम के आयुक्त ने भी वहीं किया जो उनके कलक्टर या महानदी भवन में बैठे नौकरशाह करते हैं। महापौर की बातों को अनसुना कर दिया और भाजपा विधायक की चिट्ठी को कूड़ेदान में डालने में क्षणभर की देर नहीं की। नौकरशाहों को तो चुनाव नहीं लडऩा है। उनकी यह कार्यशैली कभी-कभी यह सोचने के लिए मजबूर कर देती है कि वे सरकार के पक्ष में काम कर रहे हैं या फिर विरोधियों को पनपने का भरपूर मौका दे रहे हैं। क्योंकि वे भली-भांति जानते हैं कि इस प्रकार की कार्रवाई से सत्तारूढ़ दल के प्रति जनाक्रोश भड़केगा, जिसका नुकसान उसे अगले साल होने वाले चुनाव में भुगतना पड़ेगा। 
सत्तारूढ़ दल के विधायक के लिए यह बेहद शर्मनाक व पीड़ादायक है। चाहकर भी वे अपने मतदाताओं की मदद नहीं कर पा रहे हैं और उससे भी ज्यादा खराब स्थिति पार्टी के अंदर है। खुद की सरकार होने के बाद भी वे नौकरशाहों को अपने मर्जी के हिसाब से काम करने के लिए बाध्य नहीं कर पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में उनकी पार्टी उन पर जीतकर आने का दबाव बनाती है तो वे निरुत्तर हो जाते हैं। कुछ महीनों के बाद उन्हें इन्हीं लोगों के पास वोट मांगने जाना है, जिनकी दुकानें उजाड़ दी गई हैं, उन्हें सड़कों पर लाकर पटक दिया गया है। ये लोग अब भाजपा को वोट क्यों देंगे। वोट नहीं देंगे, यह तो तय है परंतु दुकान उजडऩे की पीड़ा से उनका पूरा परिवार भाजपा का विरोधी हो जाएगा। ऐसी स्थिति का सामना करने के लिए भाजपा विधायक भले तैयार हो जाएं परंतु नौकरशाही की मनमानी के खिलाफ पार्टी के अंदर बोलने का साहस वे निश्चित रूप से नहीं जुटा पाएंगे। भाजपा के यह विधायक व्यापारियों के भी नेता माने जाते हैं, जिन पर व्यापारियों के हितों की रक्षा करने का दारोमदार भी है लेकिन इस मोर्चे पर भी वे फिसड्डी साबित हुए हैं। 
नौकरशाहों की योजना के चलते राजधानी का बुरा हाल है। सर्वत्र धूल और गंदगी है लेकिन सत्तारूढ़ दल के किसी भी जनप्रतिनिधि में इसके खिलाफ बोलने का साहस नहीं है। राजधानीवासियों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। अस्थमा, दमा और न जाने कौन-कौन सी बीमारियों से ग्रसित हो रहे राजधानीवासी इस बार भाजपा को सबक सिखाने का संकल्प ले चुके होंगे। क्योंकि उन्हें अच्छी तरह पता है कि भाजपा राज में तो सत्ता का संचालन नौकरशाह ही करते हैं। मंत्री और विधायक भलें बड़ी-बड़ी डींगे हांकें परंतु अगर सामने कोई आईएएस या आईपीएस आ जाए तो उनकी घिग्गी ऐसे बंधती है मानो उन्होंने जनमानस की आवाज उठाकर कोई संगीन जुर्म कर दिया है। जिन लोगों ने भाजपा को विपक्ष की भूमिका निभाते हुए देख चुके हैं, वे हर्गिज भी इस बात को नहीं स्वीकारेंगे कि शेर की तरह दहाडऩे वाले भाजपा नेता कुर्सी पर बैठते ही भीगी बिल्ली बन चुके हैं। अपना जमीर और स्वाभिमान घर पर रखकर राजनीति करने की कोशिश करने वाले भाजपा नेताओं को अब सत्ता परिवर्तन के संकेत मिलने लगे हैं। शायद यही वजह है कि पब्लिक की परेशानी को छोड़कर वे नौकरशाहों से निजी सम्बंध बनाने को प्राथमिकता देने लगे हैं ताकि विपक्ष में रहने के बावजूद उनका अधिक अहित न हो सके। 
 
 
चोखेलाल
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