Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                 ०4 अप्रैल 17

सरकारी हवाई जहाज उडऩे लगा है, जिसमें बैठकर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह गांवों में उतरेंगे और वहां के लोगों की समस्याएं सुनेंगे। दावा तो यह है कि उन समस्याओं का मौके पर ही निराकरण कर दिया जाएगा परंतु यह काम तो मुख्यमंत्री बीते कई बरसों से कर रहे हैं। समस्याओं का निराकरण तो नहीं होता लेकिन मुख्यमंत्री अपनी ब्रांडिंग जरूरत कर लेते हैं।
पिछले सालों तक इस अभियान को ग्राम या लोक सुराज अभियान कहा जाता रहा है। इस बार अभियान का नाम बदल दिया गया है। उसे लोक सुराज अभियान के साथ लक्ष्य समाधान कहा जाने लगा है। अगर इसी बात की मीमांसा की जाए तो साबित होता है कि यह पहला अवसर होगा जब मुख्यमंत्री समस्याओं का समाधान करेंगे। इससे पहले के सालों तक वे केवल समस्याएं सुना करते थे। प्रचार तो यह किया जा रहा है कि मुख्यमंत्री औचक किसी भी स्थान पर उतरेंगे लेकिन सच्चाई यह है कि जिस स्थान पर मुख्यमंत्री को जाना होता है, वहां के सरकारी अमले के साथ वहां के जनमानस को भी मुख्यमंत्री के आने की खबर होती है। यानी स्क्रिप्ट तैयार रहती है, मुख्यमंत्री को बस वहां जाकर डॉयलॉग बोलना होता है। सबकुछ प्रायोजित होता है। उनके सामने किस समस्या को किस तरह से रखना है और उन्हें उस पर क्या कार्रवाई करनी है, सब पूर्व निर्धारित होता है। यहां तक कि कौन का हिस्सा मीडिया की सुर्खियां बनेगा, यह भी तय होता है।
इस अभियान के कारण पूरा पखवाड़ा प्रशासन पंगु बना रहता है। पूर्व के महीने में विधानसभा के बजट सत्र के कारण सरकारी दफ्तरों में कामकाज ठप था। मानो हर अधिकारी और कर्मचारी विधानसभा की कार्यवाही में व्यस्त है और अब अगले पंद्रह दिनों तक पूरा प्रशासनिक अमला मुख्यमंत्री के उडऩखटोले के पीछे भागेगा। कहने का मतलब यह है कि किसी भी दफ्तर में सरकारी कामकाज नहीं होगा। कॉमन मैन नक्शे, अलग-अलग प्रमाणपत्रों व अन्य छोटे-छोटे कामों के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाता रहेगा और अमला खुद को मुख्यमंत्री की जी-हुजूरी में व्यस्त रखेगा।
प्रदेश में भाजपा को शासन करते हुए साढ़े तेरह साल गुजर चुके हैं। इस दौरान खुद मुख्यमंत्री साप्ताहिक जनदर्शन करते हैं। कलक्टरों को जनदर्शन के निर्देश दिए गए हैं। मंत्री क्षेत्रों में जाते हैं लेकिन सोचने वाली बात यह है कि इतना सबकुछ होने के बावजूद समस्याओं का समाधान क्यों नहीं हो पा रहा है? जनदर्शनों व इस तरह के अभियानों में मिलने वाले आवेदनों पर अगर नजर डाली जाए तो अधिकतर लोग बीमारी के इलाज के लिए राशि उपलब्ध कराने की मांग करते हुए आवेदन देते हैं। इसके अलावा नौकरी देने, स्कूल-अस्पताल भवन ठीक करने, नाला-पुल बनाने, स्कूल में मास्टर और अस्पतालों में डॉक्टर तैनात करने की मांग अधिक होती है। कुछ नेता किस्म के लोग किसी अफसर के खिलाफ शिकायत व उसे हटाने की मांग करते हुए आवेदन देते हैं। इन आवेदनों को एकत्र करना ही लोक सुराज अभियान कहलाता है क्योंकि अगर इन छोटी-छोटी समस्याओं का सरकार प्राथमिकता के साथ समाधान कर देती या अभी भी इनके निराकरण की नीयत होती तो प्रदेश में रामराज आ जाता और फिर कभी इस तरह के अभियान चलाने की जरूरत नहीं होती। साल में एक बार मदर्स डे, वेलेण्टाइन डे व वीमन डे मनाने की तर्ज पर ही राज्य सरकार अपने मुख्यमंत्री के लिए यह अभियान चलाती है।
सर्वाधिक दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान मीडिया का पूरा फोकस मुख्यमंत्री पर रहता है क्योंकि बदले में प्रदेश का जनसम्पर्क विभाग रोज बड़-बड़े विज्ञापन जारी करता है। चूंकि सरकार से विज्ञापन मिलता है इसलिए सरकार के मुखिया का प्रचार करना नमक हलाली ही मानी जाएगी। इस दौरान सरकार के अन्य मंत्री-विधायक व भाजपा के सांसद लगभग गुम जाते हैं। किसी को पता नहीं चलता कि ये सब कहां हैं और क्या कर रहे हैं। अभियान की समाप्ति पर जनसम्पर्क विभाग गर्व के साथ जानकारी देता है कि इन पंद्रह दिनों में मुख्यमंत्री इतने गांवों में गए, इतने लोगों ने मिले। उन्हें इतने आवेदन मिले और उन्होंने इतने आवेदनों का निपटारा कर दिया जबकि सच्चाई यह है कि मुख्यमंत्री आवेदनों को जिस विभाग में भेजते हैं, उनकी बेवसाइट में उस आवेदन को निराकृत लिख दिया जाता है। यह है लोक सुराज और यही होगा समाधान का लक्ष्य अभियान।

चोखेलाल
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