Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                 ०6 अप्रैल 17

पिछले कुछ सालों में जिस तेजी से मीडिया की विश्वसनीयता में गिरावट आई है शायद कभी उतनी तेजी से सेंसेक्स में भी गिरावट नहीं आई होगी। इस समय मीडिया में परोसी जाने वाली हर खबर प्रायोजित रहती है। हर खबर को नफा-नुकसान देखकर परोसा जाता है। ऐसा करते हुए पत्रकारिता के स्थापित सिध्दांतों की खुले आम अनदेखी की जाती है। पिछले दिनों संसद में जनता दल (यूनाइटेड) के सांसद शरद यादव ने जिस तरह मीडिया के अंदरखाने में चलने वाली कारगुजारियों को उजागर किया, उसको सुनकर पूरा देश हतप्रभ हो गया, लेकिन मीडिया से जुड़े सभी लोग जानते हैं कि शरद यादव की एक-एक बात सच्ची थी।
मीडिया की विश्वसनीयता पर देशव्यापी कमी आई है और छत्तीसगढ़ उससे अछूता नहीं है। कहने को तो इस प्रदेश में बड़े अखबार समूह हैं, नामी पत्रकार हैं, जिन्होंने देशभर में बड़ी ख्याति अर्जित की है, लेकिन मीडिया ने यहां जो भूमिका बना रखी है, उससे प्रदेश का बड़ा पाठक वर्ग इत्तेफाक नहीं रखता है। हालिया वाक्या एक कोटा (बिलासपुर) के एक निजी विश्वविद्यालय का है, जिसने डिग्री की आड़ में एक बड़ी दुकान खोल रखी है। बीते पांच सालों में इस विश्वविद्यालय ने देशभर में न जाने कितने नौजवानों को फर्जी डिग्रियां बेचकर उनका भविष्य अंधकारमय कर दिया होगा। यह सब राज्य सरकार के कुछ अफसरों की सरपरस्ती में किया जाता रहा, इसलिए विश्वविद्यालय का प्रबंधन बे-खौफ होकर अपने काम को अंजाम देता रहा।
राज्य सरकार के संज्ञान में आते ही विश्वविद्यालय की जांच के लिए एक आईएएस अफसर को तैनात कर दिया गया, लेकिन छत्तीसगढ़ के बड़े मीडिया समूहों को यह रास नहीं आया क्योंकि उन्हें उन नौजवानों से कोई मतलब नहीं था, जिन्हें बड़ी रकम लेकर विश्वविद्यालय ने फर्डी डिग्रियां थमा दी हैं। मीडिया समूहों को इस विश्वविद्यालय की साख व प्रतिष्ठा की चिंता रही क्योंकि विश्वविद्यालय की तरफ से प्रदेश के लगभग सभी छोटे-बड़े मीडिया समूहों को साल में लाखों रुपए का विज्ञापन दिया जाता है। इसके अलावा मीडिया कर्मियों को भी समय-समय पर उपकृत किया जाता रहा है। इस वजह से मीडिया समूह विश्वविद्यालय के साथ खड़े दिखाई पड़े। उन्हें लगने लगा कि विद्यार्थियों से उन्हें कोई फायदा नहीं होगा और अगर विश्वविद्यालय की कारगुजारियों को उजागर किया तो धंधा चौपट हो जाएगा।
दरअसल छत्तीसगढ़ में अधिकतर मीडिया समूह बाहरी हैं। कोई मध्यप्रदेश का है तो कोई राजस्थान का तो कोई हरियाणा का। इतना ही नहीं इन मीडिया समूहों में काम करने वाले अधिकतर मीडिया कर्मी बाहरी हैं, जो यहां सिर्फ नौकरी कर रहे हैं। कहने का मतलब है कि उन्हें छत्तीसगढ़ या छत्तीसढिय़ों की पीड़ा से कोई वास्ता नहीं है। वे तो धंधा करने आए हैं। अखबारों को वे व्यवसाय की तरह चला रहे हैं। कहने को तो खुद को वे पाठकों की आवाज कहते हैं पर सच्चाई यह है कि उनकी भूमिका वैशाली की नगरवधु से कम नहीं है।
अगर उन्हें सच में छत्तीसगढ़ से प्यार होता, यहां के लोगों के प्रति दर्द होता तो आज वे उस विश्वविद्यालय के साथ नहीं बल्कि उन हजारंों नौजवानों के हक में खड़े होते जिन्हें छला गया है, जिनके भविष्य से साथ खेला गया है। पर ऐसा नहीं हो रहा है। मीडिया हाउसेस इस विश्वविद्यालय की पैड न्यूज प्रकाशित करके उसे महिमामंडित कर रहे हैं। मीडिया बता रही है कि यह विश्वविद्यालय पाक साफ है। ऐसा कहकर मीडिया राज्य सरकार की जांच, विश्वविद्यालय नियामक आयोग और यूजीसी जैसी संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास फैलाकर देशद्रोह के समान काम कर रही है। चंद सिक्कों के लिए छत्तीसगढ़ के मीडिया समूह प्रदेश के हजारों नौजवानों के साथ धोखाधड़ी कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में मीडिया को नियंत्रित करने वाली संस्थाओं की जिम्मेदारी बढ़ जाती है वरना वह दिन दूर नहीं जब मीडिया एक इतिहास की बात होकर रह जाएगा।
            चोखेलाल
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