Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                 12 अप्रैल 17
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री व मंत्रियों को अचानक याद आया कि अगर किसी को कह देंगे कि उलटा लटका देंगे तो प्रशासनिक दहशत बढ़ जाएगी। यही वजह है कि मुख्यमंत्री पहले गौवध करने वालों को और फिर शराब कोचियों के बारे में यह कहा कि ऐसा करने वाले को उलटा लटका देंगे और उनके तुरंत बाद खुद में मुख्यमंत्री के सब गुण देखने और अपने क्षेत्र में खुद को अगला मुख्यमंत्री प्रचारित कराने वाले मंत्री अजय चंद्राकर ने भी यही कह दिया। पर यहां उनसे छोटी सी गलती हो गई। यह बात उन्होंने बालोद में भाजपा कार्यकर्ताओं से कह दिया। बस फिर क्या था, वे बिफर गए और अब मामला भाजपा के प्रदेश नेतृत्व के पास पहुंच गया है।
दरअसल बीते साढ़े तेरह सालों से प्रशासनिक ढिलाई का आरोप सह रही डॉ. रमन सिंह की सरकार को थोड़ा करंट उस समय आया, जब राज्य की राजनीति में नए माने जाने वाले पड़ोसी राज्य उत्तरप्रदेश के साधु मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तेवर दिखाने शुरू किए। मुख्यमंत्री व मंत्रियों को लगने लगा कि ऐसा तेवर तो वे भी दिखा सकते हैं लिहाजा कोशिश शुरू की परंतु ऐसा करते समय वे भूल गए कि वे ऐसा नहीं कर सकते हैं क्योंकि योगी आदित्यनाथ की तरह उनका राजनीतिक कैरियर साफ नहीं है। सभी पर भांति-भांति के आरोप लगे हुए हैं। योगी आदित्यनाथ की तरह वे नि:स्वार्थ होकर राजनीति नहीं कर सकते इसलिए साहस भरे फैसले लेना छत्तीसगढ़ भाजपा नेताओं के बस की बात नहीं है क्योंकि अगर उन्होंने ऐसा किया तो इस बात की संभावना अधिक है कि दांव उलटा पड़ सकता है। भाजपा के कार्यकर्ता ही मंत्रियों को अपने गिरेबां में झांकने की सलाह दे डालेंगे।
सवाल यह उठता है कि मुख्यमंत्री व मंत्रियों को अचानक प्रशासनिक कसावट की याद क्यों आ गई। उस समय उनकी याददाश्त को क्या हुआ था जब झीरम में नक्सलियों ने कांग्रेस की पूरी लीडरशिप को खत्म कर दिया था। तब क्यों साहस नहीं दिखाया जब बिलासपुर एसपी राहुल शर्मा ने खुद को गोली मार ली थी। तब क्यों सरकारी अमले को उलटा नहीं लटकाया गया, जब आंखफोड़वा कांड किया गया था, महिलाओं के गर्भाशय निकाले गए थे। सरकार ने तब यह कदम क्यों नहीं उठाया जब आईपीएस राजकुमार देवांगन के सरकारी बंगले से डाके का माल बरामद हुआ। सरकार तब क्यों खामोश रही जब आईएएस बाबूलाल अग्रवाल पर एण्टी करप्शन ब्यूरो ने छापा मारा, जिसके बाद बाबूलाल अग्रवाल को निलम्बित करने की नौबत आई। सरकार तब क्यों चुप्पी साधे रही जब नान घोटाले में आईएएस डॉ. आलोक शुक्ल व अनिल टुटेजा की संलिप्तता सामने आई। सरकार तब क्यों मूक दर्शक बनी रही जब आईपीएस एसआरपी कल्लूरी बस्तर में त्राहिमाम-त्राहिमाम मचाए हुए थे।
ऐसा नहीं है कि सरकार इस समय पूरी तरह एक्शन मोड में है। अभी भी बड़ी कार्रवाइयों में उसके हाथ कांप रहे हैं वरना आईपीएस पवन देव पर यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाने वाली महिला आरक्षक को अब तक न्याय मिल जाता। बाबूलाल अग्रवाल अब तक बर्खास्त हो चुके होते। डॉ. आलोक शुक्ल व अनिल टुटेजा जेल में होते। पं. श्यामाप्रसाद मुखर्जी पर सार्वजनिक टिप्पणी करने वाले और रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़े जाने वाले आईएएस पर अब तक प्रभावी कार्रवाई हो चुकी होती पर सरकार ऐसा नहीं कर पा रही है। उसका जोर तो हमेशा कमजोरों पर चलता रहा है इसलिए पहले गौवध करने वालों को और फिर शराब कोचियों को उलटा लटकाने की बात की गई। इन सबको सरकार न्यूनतम बल प्रयोग करके उलटा लटका सकती है। भाजपा कार्यकर्ताओं पर भी मंत्री कार्रवाई कर सकते हैं लेकिन सरकार के लिए भस्मासुर बन चुके कई अफसरों की तरफ आंख उठाने तक का साहस इस सरकार में नहीं है, इसलिए मुख्यमंत्री व मंत्रियों को योगी आदित्यनाथ की तर्ज पर सरकार चलाने के बारे में सपने में भी नहीं सोचना चाहिए क्योंकि योग आदित्यनाथ तो पारिवारिक मोहमाया से दूर हैं पर यहां के मंत्री तो बस इसी में उलझे रहते हैं कि उनके परिवार का हर सदस्य काम पर लग जाए। तबादला-पोस्टिंग और ठेकेदारी के साथ वे अपने परिजनों व रिश्तेदारों को राजनीतिक रूप से भी सक्षम बनाने में लगे रहते हैं ऐसे में इन सबका योगी आदित्यनाथ की राह पर चल पाना असंभव है।

चोखेलाल
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