Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                 4 मार्च 17

इसमें कोई दो मत नहीं कि छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश भाजपा की राजनातिक में बृजमोहन अग्रवाल की एक हैसियत है लेकिन जब उनके विभागों (जल संसाधन व कृषि) की चर्चा होती है तो खासकर सत्ता पक्ष के कुछ लोग मुंह-कान बनाने लगते हैं। पिछले दिनों विधानसभा में कृषि विभाग में की गई खरीदी में हुई गड़बड़ी से सम्बंधित एक सवाल के जवाब में जब मंत्री बृजमोहन ने कहा कि उन्हेंं पता है कि उनके विभागों के अधिकारी हरिश्चंद्र (ईमानदार व सचरित्र) नहीं हैं, तो अधिकारी दीर्घ में बैठे अफसरों को सांप सूंघ गया।
दरअसल विवाद और बृजमोहन अग्रवाल का करीबी रिश्ता है। वे बेहद महात्वाकांक्षी नेता है, जिनके दिलो-दिमाग में सदैव मुख्यमंत्री की कुर्सी नाचती रहती है। इसकी वजह से उन्हें कई तरह का राजनीतिक नुकसान झेलने पड़ते हैं परंतु वे अपनी साफगोई से बाज नहीं आते हैं। प्रदेश की राजनीति में वे मौका मिलते ही मुख्यमंत्री को चुनौती देने से नहीं चूकते हैं और जब मौका मिलता है मुख्यमंत्री भी उनके पैर काटने में देरी नहीं करते हैं। बजट के लिए विभागवार बैठकों के दौर में जब कृषि विभाग की बारी आई तो मुख्यमत्री ने छूटते ही बृजमोहन अग्रवाल से कहा कि सर्वाधिक भ्रष्टाचार उनके विभागों में है, जिसे रोकने की आवश्यकता है।
विधानसभा में जवाब देते समय मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के दिमाग में यही बात रही होगी तभी तो उन्होंने कह दिया कि उनके विभाग के अफसर हरिश्चंद्र नहीं हैं। ऐसा कहकर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने गेंद अन्य मंत्रियों के पाले में डाल दी। अब अन्य मंत्रियों को बताना होगा कि उनके विभागों के अफसर हरिश्चंद्र हैं या नहीं। सच्चाई तो यह है कि राज्य सरकार में चपरासी से लेकर आला अफसरों तक हरिश्चंद्र खोजने से नहीं मिलेंगे क्योंकि हाल ही में आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने एक सूची जारी की है, जिसमें हर स्तर के अधिकारियों व कर्मचारियों पर पिछले पांच साल में 131 छापे मारे गए और उनके पास से चार अरब से अधिक की अनुपातहीन सम्पति का खुलासा किया। इसमें सर्वाधिक 19 करोड़ रुपए की अनुपातहीन सम्पति बृजमोहन अग्रवाल के जल संसाधान विभाग के कार्यपालन अभियंता के पास से मिली और संयोग से वह भी अग्रवाल ही हैं।
इस तरह के गैर हरिश्चंद्रों से पूरा प्रदेश भरा पड़ा है औ्र राज्य सरकार की इन पर सरपरस्ती है। अफसरों का कहना है कि सरकार उन्हें इतना वेतन देती है कि भ्रष्टचारा करने की जरूरत नहीं है लेकिन ऊपरवालों की बेगारी उन्हें यह सब करने के लिए बाध्य करती है। कहीं किसी के सास-ससुर के दवाई-पानी की व्यवस्था तो कभी बाबा साहब या मैम साहब की शॉपिंग के लिए पैसे खर्च करने पड़ते हैं। ठेका-परमिटों व तबादलों की यह स्थिति है कि बिना कमीशन कुछ होता ही नहीं है। तेरह साल पहले जो काम सात प्रतिशत में हो जाता था, वह अब बीस प्रतिशत में होता है और वह भी एडवांस। ऐसे में अफसर हरिश्चंद्र कैसे बन सकते हैं। ऐसे में मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की स्वीकारोक्ति राज्य सरकार के आंतरिक कामकाज को सार्वजनिक करती है।
    चोखेलाल
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