Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                 15 अप्रैल 17

उम्मीदों का गुब्बारा एक बार फिर से फूट गया। प्रदेशभर के कांग्रेसी बड़ी आस लगाए बैठे थे कि अध्यक्षजी इस बार नए जिला अध्यक्षों की सूची लेकर दिल्ली गए हैं। जरूर कुछ करके आए हैं पर बहुत कम लोगों को पता है कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष न पहले कभी और न ही इस बार कोई सूची लेकर दिल्ली गए थे। वे तो पार्टी के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा की तबियत देखने गए थे लेकिन जाने से पहले उनके इशारे पर उनके गुर्गों ने यह खबर प्रायोजित करके मीडिया तक पहुंचा दी कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए अध्यक्षजी चिंतित हैं और नई टीम के लिए वे पार्टी हाईकमान से हरी झण्डी लेने गए हुए हैं। एक रोज बाद अध्यक्ष जब लौटे तो कांग्रेस में कुछ भी नहीं बदला था। वहीं पुराने चेहरे, वहीं बड़ी-बड़ी बातें और सरकार बनाने का सपना।
दरअसल पूरी खामी प्रदेश नेतृत्व में ही है। अध्यक्ष बने हुए भूपेश बघेल को एक लम्बा अरसा गुजर गया परंतु वे अपनी टीम नहीं बना पाए। वही पुराने नेताओं के भरोसे संगठन चला रहे हैं। जिलों में कांग्रेस संगठन का बुरा हाल है। दो-चार नेताओं के भरोसे अधिकतर जिलों का संगठन चल रहे हैं। कई जिलों में कार्यवाहकों के जिम्मे संगठन की बागडोर है। हालात यह है कि जन्मतिथि और पुण्यतिथि मनाने के अलावा जिलों के पास अपना खुद का कोई कार्यक्रम नहीं है। कुछ इसी तरह की स्थिति प्रदेश संगठन की है। कमजोर संगठन के सहारे सत्ता के शिखर तक पहुंचने का हसीन सपना मुंगेरीलाल ही देख सकता है।
सच्चाई तो यह है कि अजीत जोगी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने के बाद कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष खुद को प्रदेश स्तर का बड़ा नेता मानने लगे हैं। उनके आसपास रहने वाले यदा-कदा कहते रहते हैं कि प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री पाटन (अध्यक्ष अभी पाटन से विधायक हैं) से होगा तो यह बात उन्हें अंदर तक गुदगुदा देती है जबकि जमीनी हकीकत का आंकलन किया जाए तो जुम्मे-जुम्मे बनी अजीत जोगी की पार्टी का संगठन अधिक मजबूत दिखाई देता है। अजीत जोगी जिस तरह से अपने संगठन में नियुक्तियां कर रहे हैं और उसका विस्तार कर रहे हैं उसको देखखर लगता है कि कुछ दिनों तक परिवर्तन की उम्मीद करने के बाद कांग्रेस के कई नेता अजीत जोगी की तरफ रुख कर लेंगे।
अब संगठन में फेरबदल के लिए अध्यक्ष इच्छुक भी हैं या नहीं, इस पर शक है क्योंंकि जब वे अड़ते हैं तो देवेंद्र यादव को भिलाई महापौर पद के लिए टिकट मिल जाता है। डॉ. चरणदास महंत जैसे दिग्गज नेताओं को पछाड़कर वे छाया वर्मा को राज्यसभा में भेजने में सफल हो जाते हैं। तत्कालीन प्रभारी महासचिव नारायण सामी के चेहरे पर कालिख पोतने वाले की ससम्मान पार्टी में वापसी हो जाती है। कांग्रेस भवन में खुले आम चाकू-छूरी चलाने वालों का निलम्बन रद्द कर दिया जाता है। तब पार्टी हाईकमान उन्हें ऐसा करने से क्यों नहीं रोक पाता। केवल जिलों में अध्यक्ष बनाने या प्रदेश कार्यकारिणी के पुनर्गठन पर ही अड़ंगा क्यों लगाया जाता है। इसका साफ मतलब है कि अध्यक्ष शिद्दत के साथ नहीं चाहते हैं कि जिलों में संगठन मजबूत हो, प्रदेश में धारदार पदाधिकारी हों। यह संकेत है कि प्रदेश कांग्रेस ने अभी से ही तय कर लिया है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को वॉक-ओवर देना है क्योंकि जब सेना ही मजबूत नहीं होगी तो सेनापति किसके दम पर रणभूमि पर युध्द के लिए उतरेगा?  तब तक कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए अध्यक्षजी के गुर्गे इस तरह का शिगूफा फेंकते हैं कि इस बार दिल्ली में अध्यक्षजी परिवर्तन की बात करेंगे। अभी तक तो इन अफवाहों में सफलता मिली है पर बहुत जल्द पार्टीजनों को मोह प्रदेश नेतृत्व से भंग होता दिखाई देने लगेगा।

चोखेलाल
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