Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                 रायपुर, 18 अप्रैल 17

सोचिए, अगर परिवार के किसी सदस्य को हार्ट अटैक आ जाए और डॉक्टर के कहने पर नौ सौ रुपए वाला इंजेक्शन नौ हजार में खरीदना पड़े या टाइफाइड ठीक करना वाला 25 रुपए वाला इंजेक्शन 53 रुपए में खरीदना पड़े या ढाई सौ रुपए में होने वाली सोनाग्राफी के लिए साढ़े सात सौ रुपए खर्च करने पड़े तो दिल पर क्या गुजरती है। इन दिनों देश और प्रदेश में जिस तरह की महंगी मेडिकल सर्विसेस है, उसको देखकर तो यही लगता है कि मध्यम वर्गीय परिवार को बीमार होने का भी अधिकार नहीं है। सिर्फ कल्पना करके देखिए कि बाजार में जिन दवाइयों या जांचों की कीमत कुछ रुपए है, उनके लिए बड़ी रकम खर्च करना पड़े तो वह कितना पीड़ादायक है।
कहा जा सकता है कि सरकारों ने स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र की जिस तरह अनदेखी की है, उसके कारण देश और प्रदेश में निजी शैक्षणिक संस्थाओं और अस्पतालों की बाढ़ आ गई है। किसी भी शैक्षणिक संस्थान में फीस के लिए कोई नियम नहीं है। इसी तरह अस्पतालों में भी दवाइयों व जांचों की कोई रेट लिस्ट नहीं है। सरकारी शैक्षणिक संस्थाओं व अस्पतालों में सुविधाएं नहीं हैं। शायद यही वजह है कि बच्चों को प्राइवेट स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाना और परिजनों का बड़े अस्पताल में उपचार करना जरूरत के साथ सोशल स्टेटस बन गया है, जिसका फायदा उठाया जा रहा है।
इन दोनों ही स्थानों में कमीशन पर काम होता है। स्कूलों के लिए कॉपी-किताब, जूते-मोजे, बस, पेन-पेंसिल की बिक्री कमीशन के लिए की जाती है और अस्पतालों में यह तस्वीर अधिक भयावह है। सोचिए, एमआरआई की प्रति जांच के पीछे रिफर करने वाले डॉक्टर का कमीशन तीन हजार रुपए तक रहता है। महीने में अगर उसने कम से कम दस मरीजों को एमआरआई के लिए रिफर किया तो कमीशन के रूप में उसे बड़ी रकम मिल जाती है। इसके अलावा अन्य जांचों के साथ दवाइयों में कमीशन फिक्स होता है। इस समय हर डॉक्टर अपने अस्पताल में एक दवा दुकान अवश्य चलाता है और वहां वहीं दवाइयां मिलती हैं, जिसे वह लिखता है। कहने का मतलब यह है कि परिवार में अगर कोई दुर्भाग्य से बीमार पड़ गया तो इतना तय है कि बिल लाखों रुपए में जाएगा।
डॉक्टरों का सिंडिकेट एक ही शहर में नहीं है। बड़ी बीमारियों के लिए वे देश के अन्य शहरों में मरीजों को रिफर करते हैं, जिसके बदले उन्हें मोटा कमीशन मिलता है। दवा कम्पनियों के अलावा अन्य अस्पतालों से मिलने वाले कमीशन के अलावा दवा कम्पनियां डॉक्टरों की हर सुख-सुविधा का पूरा ख्याल रखती हैं। महंगे उपहारों के अलावा विदेशों के पैकेज टूअर्स अक्सर डॉक्टरों को मिलते रहते हैं।
इस पूरी तस्वीर के लिए सीधे तौर पर राज्य सरकार जिम्मेदार है क्योंकि उसने कभी किसी बड़े अस्पताल के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं की। सरकार के नुमाइंदों को अच्छी तरह पता है कि इन अस्पतालों में किस तरह से लूट हो रही है पर अस्पताल संचालकों के खिलाफ कार्रवाई करने से सरकार के हाथ कांपते हैं। पिछले कुछ सालों में अगर देखा जाए तो शहरों में बड़े-बड़े अस्पताल बन गए हैं। सुपर स्पेश्यलटी अस्पताल भी हैं, जहां फाइव स्टार होटलों के समान सुविधाएं हैं। सबको बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं दिलाना सरकार का नैतिक दायित्व है परंतु इस दायित्व का निर्वहन नहीं किया जा रहा है। हाल ही में एक डॉक्टर ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि डॉक्टर बनने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है। कई रात जागना पड़ता है। यह बात सही है लेकिन इसके बदले में डॉक्टरों को मनमानी करने की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि डॉक्टरी पेशे को पाक-पवित्र माना गया है लेकिन इन दिनों अधिकांश डॉक्टर उस शपथ को भूल चुके हैं, जो उन्होंने इस पेशे को अपनाते हुए ली थी।
चोखेलाल की इस टिप्पणी से निश्चित रूप से डॉक्टरी पेशे से जुड़े लोगों को पीड़ा होगी, वे आलोचना भी करेंगे कि पत्रकार कुछ भी लिखते रहते हैं लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि पत्रकार का दायित्व आइना दिखाने का होता है। खुद की खराब शक्ल देखकर आइना तोडऩे से बेहतर होगा कि खुद की शक्ल सुधार लें। डॉक्टरों का एक बड़ा वर्ग लूट-खसोट में लगा है, यह सबको स्वीकार करना चाहिए क्योंकि कम से कम छत्तीसगढ़ के लोग यह अच्छी तरह जानते हैं कि यहां स्मार्ट कॉर्ड घोटाला हो चुका है, जिसमें कई डॉक्टरों को जेल जाना पड़ा था। तब यह साबित हो गया था कि हमाम में अधिकांश नंगे हैं।
चोखेलाल
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