Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                 रायपुर, 19 अप्रैल 17
प्रदेश की भाजपा सरकार इन दिनों लोक सुराज अभियान चला रही है जिसके तहत मुख्यमंत्री व अन्य जनप्रतिनिधि गांवों में औचक पहुंचते हैं तथा मौके पर ही समस्या का समाधान करते हैं पर इसे क्या कहेंगे अगर लोक सुराज अभियान के समाधान शिविर में अपनी बात कहने वाले एक व्यक्ति को इसलिए जेल में डाल दिया गया क्योंकि उसे यह बात नागवार गुजरी कि इस शिविर में एक संसदीय सचिव को केक खिलाकर उनका जन्मोत्सव मनाया गया और दुर्भाग्यजनक बात यह रही कि संसदीय सचिव को केक खिलाने वाला कोई और नहीं उस जिले का कलक्टर था।
यह बात बार-बार कही जाती है कि प्रदेश में प्रशासनिक आतंकवाद चल रहा है। विपक्ष के अलावा सत्तारूढ़ दल के नेता भी इस बात को कई बार कह चुके हैं परंतु सत्ता के शिखर में बैठे लोग खामोश बैठे हुए हैं। वे अफसरों के सामने मजबूर और लाचार नजर आते हैं। परिणामस्वरूप प्रदेश पूरी तरह नौकरशाही की गिरफ्त में है और इसी का परिणाम है कि कोरबा जिले के हरदीबाजार में भूविस्थापितों की तरफ से अपनी बात कहने गए नौजवान को केवल इस आरोप में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया क्योंकि उसने संसदीय सचिव को केक खिलाते हुए कलक्टर की तस्वीर सोशल मीडिया में वायरल कर दी थी। जिला प्रशासन का तर्क है कि वह नौजवान शिविर के अफसरों के साथ अभद्रता कर रहा था परंतु प्रशासन ने इस बात पर कोई सफाई नहीं दी कि कलक्टर वहां के संसदीय सचिव को केक क्यों खिला रहे थे।
प्रदेश में भ्रष्ट नेताओं और अफसरों की जुगलबंदी है। इन दोनों की मौज है। दोनों ही भ्रष्टाचार के आकंठ तक डूबे हुए हैं और दोनों की एक-दूसरे का बचाव कर रहे हैं। इनके बीच पिस रही है छत्तीसगढ़ की ढाई करोड़ आबादी। प्रदेश में सरकार या अफसरों का विरोध करने का कोई प्रावधान नहीं है। ससंदीय सचिव को केक खिलाते हुए फोटो को सोशल मीडिया में वायरल करने की सजा जेल है और पुलिस पर माओवादियों के साथ मिले रहने का आरोप लगाना भी दण्डनीय अपराध है। ऐसी स्थिति में प्रदेश के सरकारी नुमाइंदे जब लोकतंत्र की हिफाजत की बात करते हैं, तो वह किसी मजेदार चुटकुले की तरह लगता है।
विरोध की आवाज दबाना प्रदेश सरकार की आदत में शामिल हो गया है। राजनीतिक विरोधियों के अलावा उन आवाजों को भी न्यूनतम बल प्रयोग करके दबा दिया जाता है, जिनको सुनकर सरकार असहज हो जाती है। छत्तीसगढ़ की मीडिया ने तो विरोध की अपनी ताकत को पूरी तरह खो दिया है। तकरीबन सभी मीडिया समूह सरकार की जी-हुजूरी में लग गए हैं। उनमें यह प्रतिस्पर्धा हो रही है कि कौन मुख्यमंत्री से सबसे अधिक करीब है। इसकी वजह यह है कि मीडिया में परदेशियों का कब्जा है और वे यहां पत्रकारिता करने नहीं बल्कि खाने-कमाने आए हैं। उन्हें लगता है कि जनता की आवाज बनने से बेहतर है सरकार का मुखपत्र बन जाएं। कम से कम जब घर लौटें तो यह तो बता सकें कि छत्तीसगढ़ से यह कमा कर आए हैं। उन्हें इस मिट्टी का कर्ज अदा नहीं करना है।
पूरे प्रदेश में सरकार का विरोध करने वालों का शामत है। देश में छत्तीसगढ़ शायद एकमात्र राज्य होगा, जहां शराब दुकानों के विरोध करने वालों पर शासकीय कार्य में बाधा डालने का मामला दर्ज होता है। यही स्थिति लोक सुराज अभियान की हो रही है। इसमें केवल सरकारी नुमाइंदों को ही बोलने का अधिकार दिया गया है। आवेदन देने के बाद काम क्यों नहीं हो रहा है या कब तक हो जाएगा, यह भी पूछना गुनाह है। अगर ऐसा नहीं होता तो कोरबा जिले के युवक को जेल में नहीं ठूंसा जाता। उसे समझाइश दी जाती परंतु उसने तो नेता और नौकरशाही के बीच चल रही साठगांठ को उजागर किया, जिसे नागवार तो गुजरना ही था। ऐसा करके कोरबा कलक्टर ने यह संदेश दे दिया है कि पूरे प्रदेश में कहीं भी अगर ऐसा किया गया, तो विरोध करने वाले की जगह जेल की सलाखों के पीछे होगी।  सच में यही है प्रदेश में चल रहे लोक सुराज अभियान की जमीनी हकीकत।

चोखेलाल
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