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मुखिया के मुखारी

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इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति             रायपुर, 24 अप्रैल 17

छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने एक शानदार फैसला किया है कि अब बे-ईमान व भ्रष्ट अफसरों को घर बिठा दिया जाएगा। सुनने में बहुत अच्छा लगता है पर यकीन मानिए कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है अन्यथा प्रदेश में काम करने वाला सरकारी अमले की संख्या लगभग शून्य हो जाएगी क्योंकि इस सरकार में हमाम में सभी नंगे हैं।
एक बड़े अफसर ने आज सुबह चोखेलाल को फोन किया और कहा कि चुनाव के करीब आते ही सरकार बौरा क्यों गई है, जरा पता लगाइए। उसने कहा कि हर सरकार के हर फैसले के विरोध में जनमानस खड़ा हो रहा है। शरीब बेचने का बेतुका फैसला किया तो पूरे प्रदेश में आंदोलन होने लगे। अब आदिवासियों से महुआ एकत्र करने का हक भी छीनने की कोशिश की गई। वह तो बस्तर के मंत्रियों का दबाव काम आ गया वरना वनांचलों से भाजपा का नाम-ओ-निशान ही मिट जाता।
चोखेलाल के साथ विस्तार से चर्चा करते हुए इस अफसर ने कहा कि बे-ईमान व भ्रष्ट अफसरों को घर बिठाने से पहले सरकार को इसकी परिभाषा तय करनी होगी। मुख्यमंत्री सचिवालय में काम करने वाले अफसरों के लिए अलग तथा अन्य अफसरों के लिए अलग परिभाषा नहीं हो सकती। जिन अफसरों को यह जिम्मा दिया जाएगा कि वे बे-ईमान व भ्रष्ट अफसरों की जांच करें, उन्हें खुद पाक साफ होना पड़ेगा। प्रदेश में यह स्थिति तो नहीं है। अगर नजर दौड़ाई जाए तो मुख्यमंत्री सचिवालय में तैनात हर सरकारी व मनोनीत अफसर विवादों के मकडज़ाल में फंसा है। संभागों के कमिश्नर तथा कलक्टरों की बात ही क्या कहें। सभी पर कोई न कोई मामला चल रहा है। सचिव स्तर के अधिकतर अफसरों को मंत्रालय में इसलिए तैनात किया गया है क्योंकि फील्ड में उनकी परफॉरमेंस विवादित रही है। जिन अफसरों पर दांव खेला जा सकता है वे अपनी पत्नियों के कारण विवाद में हैं। ऐसे में ये अफसर कैसे तय करेंगे कि अमुक अफसर या कर्मचारी बे-ईमान व भ्रष्ट है।
इस फैसले को लेने से पहले मुख्यमंत्री व उनकी कैबिनेट को लोक आयोग और एण्टी करप्शन ब्यूरो में लम्बित प्रकरणों पर एक नजर अवश्य डाल लेनी चाहिए, जहां रिश्वत लेते हुए या बेनामी सम्पति के साथ पकड़े गए अफसरों पर सरकार मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दे रही है। अनुमति देने का काम सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग का होता है और खुद मुख्यमंत्री इस विभाग के मंत्री भी हैं। जब वे ही बे-ईमान व भ्रष्ट अफसरों पर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दे रहे हैं तब ऐसे अफसरों व कर्मचारियों को घर में बिठा देने की बात कहना किसी मजाक से कम नहीं लगती है।
दरअसल भाजपा सरकार पर नौकरशाही पर नियंत्रण न लगाने का आरोप लगता रहा है इसलिए केवल प्रशासन में खौफ पैदा करने के लिए कैबिनेट में यह विषय लाया गया और उस पर फैसला किया गया। बे-ईमान व भ्रष्ट अफसरों पर कार्रवाई करने के लिए सरकार को इस तरह के फैसले करने की आवश्यकता नहीं है। संविधान में उसे अधिकार प्राप्त हैं। वह किसी भी अफसर या कर्मचारी पर जांच बिठा सकती है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जिसमें शिकायतें प्रायोजित कराकर सम्बंधित अधिकारी या कर्मचारी पर कार्रवाई गई है। उन्हें बर्खास्त तक किया गया है। इसलिए दिखावा करने के बजाए सरकार को जमीन पर उतरकर काम करने की जरूरत है। कैबिनेट के फैसले के मुताबिक सरकार ने अगर एक भी बे-ईमान व भ्रष्ट अफसर को घर बिठा दिया तो मान लीजिए कि कई मंत्री बे-नकाब हो जाएंगे। इसलिय भय पैदा करने के लिए यह फैसला ठीक है, सच्चाई में इस पर अमल करना कम से कम इस सरकार के लिए बेहद मुश्किल है क्योंकि यहां किसी भी मंत्री, अफसर या कर्मचारी पर हाथ डालें, काली कमाई ही निकलेगी।

               चोखेलाल
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