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मुखिया के मुखारी

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इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति             रायपुर, 28 अप्रैल 17

इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि सोशल मीडिया ने दुनिया की साइज बेहद छोटी कर दी है। देश-विदेश यहां तक कि आसपास होने वाली घटनाओं की जानकरी अब कुछ ही पलों में लोगों तक पहुंच जाती है। सिर्फ इतना ही नहीं सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति का आजादी को मजबूत किया है। हालांकि इसके कुछ दुष्परिणाम भी हो रहे हैं पर इसका उपयोग आम लोगों को तय करना होगा क्योंकि चाकू से प्याज भी काटी जा सकती है और गला भी।
देखा गया है कि किसी भी घटना पर जनमानस त्वरित प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। चौराहे पर खड़ा सिपाही अगर किसी से दुव्र्यवहार करता है कि कुछ ही पलों में यह बात जनमानस व प्रशासन तक पहुंच जाती है क्योंकि सड़क के गुजरते हुए अधिकतर व्यक्तियों के हाथों में स्मार्ट फोन होता है। इसी तरह अस्पताल, स्कूलों व सरकारी दफ्तरों में भी आम लोगों के साथ शासकीय सेवकों का आपत्तिजनक व्यवहार उनके अधिकारियों के पास प्रमाण के साथ त्वरित पहुंचता है।
सोशल मीडिया के बारे में इतनी बड़ी भूमिका बांधने के पीछे मकसद यह है कि सुकमा में हुए नक्सली हमले के बाद सोशल मीडिया में एक मैसेज बड़ी तेजी से वायरल हो रहा है, जिसके चार लाइनों में पूरे छत्तीसगढ़ की तस्वीर और राज्य सरकार के क्रियाकलापों का खुलासा हो जाता है। इस मैसेज में लिखा है….बस्तर बारूद के ढेर पे…रायगढ़ राख के ढेर पे…सरगुजा दलालों के फेर में…बिलासपुर फिरौतीबाजों के चंगुल में…रायपुर बिल्डरों के मकडज़ाल में…..अपन ला का करना है, रमन के गोठ सुन और सरकारी दुकान के दारू ला पी…अगर इस मैसे की समीक्षा की जाए तो लगेगा कि कहीं भी कुछ भी गलत नहीं लिखा गया है। सच्चाई यही है कि बस्तर बम-गोलियों की आवाज से गूंज रहा है। जवान शहीद हो रहे हैं। रायगढ़ में सरकार ने जिस उदारता के साथ पॉवर प्लाण्टों को लगाने की अनुमति दी है, उससे वहां के निवासियों का जीना दुश्वार हो गया है। रही बात बिलासपुर की तो वहां सभी निर्वाचित जनप्रतिनिधि भाजपा के हैं फिर भी कानून-व्यवस्था लचर है। कभी भी किसी का अपहरण हो जाता है। अपहरणकर्ता खुले आम फिरौती मांगते हैं। उनमें पुलिस का खौफ नहीं रह गया है। वहां के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर हमेशा संदेह बना रहता है। इसी तरह सरगुजा संभाग में होने वाली मानव तस्करी को देशव्यापी शोहरत मिल चुकी है और वहां इस प्रतिष्ठा के अनुरूप आज भी मानव तस्करी बेरोकटोक जारी है।
इन सबके बीच राजधानी रायपुर के बारे में लिखी गई बात एकदम सटीक है। पूरी राजधानी बिल्डरों के कब्जे में है। हर बिल्डर किसी ने किसी अफसर या नेता-मंत्री की काली कमाई का रखवाला है। बिल्डरों का रायपुर की तरह  रुतबा शायद ही कहीं हो। इसका प्रमाण भी है कि एक बिल्डर जब किसी मंत्री के लिए चुनौती पैदा करने लगा तो उसे कई मामलों में फंसाकर जेल भेज दिया गया। चूंकि बिल्डरों के पास अफसरों व नेता-मंत्रियों की काली कमाई है इसलिए वे बेखौफ होकर कहीं बगीचे की जमीन पर बिल्डिंग बना लेते हैं तो कहीं श्मशानघाट को भी नहीं बख्शते। अतिक्रमण व अवैध निर्माण करके बिल्डर जिस तरह की कमाई कर रहे हैं, उससे कॉमन मैन भले परेशान हो लेकिन सत्ता में बैठे लोगों के कानों पर जंू नहीं रेंग रही है। सरकार ने अब तक किसी बिल्डर के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की है बल्कि बिल्डरों के कार्यक्रम में जाकर अपना स्वागत-सत्कार खूब कराया है।
बिल्डर सत्ताधीशों की आंखों के तारे हैं। उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई की अनुमति शासन से नहीं मिलती है। बिल्डरों के भागीदारों में सत्ता के रसूखदार हैं। ऐसे में बिल्डरों को लूटमार करने की अघोषित रूप से खुली आजादी  मिली हुई है। आयकर विभाग की तरफ से भी केवल दिखावे की कार्रवाई होती है। बिल्डरों के साथ विवादों के सैकड़ों मामले थानों व अदालतों में लम्बित हैं परंतु आज तक यह सुनने को नहीं मिला कि कभी शिकायतकर्ता को राहत मिली है। इन सबके बीच सरकार खुले आम शराब बेच रही है और मुख्यमंत्री प्रदेश में लोक सुराज की स्थापना करने के लिए दौरा कर रहे हैं। प्रदेश के प्रमुख शहरों में जिस तरह की अराजकता है, उसको छोड़कर अगर गांवों में सुराज की कोशिश की जा रही है तो इसे सुशासन तो नहीं कहा जा सकता है।

                           चोखेलाल
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