Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति             रायपुर, ०5 मई 17

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर इन दिनों देशभर में बहस चल रही है। टीवी चैनलों में सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता इस बात की पैरवी करते नजर आ रही हैं कि बेशक देश में बोलने की आजादी होनी चाहिए लेकिन इसके लिए एक मर्यादा तय की जानी जरूरी है। मर्यादा का ख्याल सत्तारूढ़ दल को उस समय आया, जब वे सरकार में बैठ गए हैं। इससे पहले अगर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के बयानों को देखा जाए तो पता चल जाएगा कि मर्यादा का सर्वाधिक उल्लंघन किसने किया है।
देश में लोकतंत्र की पैरवी करने वाले किसी भी राजनीतिक दल में आतंरिक लोकतंत्र का नामो निशान नहीं है। किसी भी राजनीतिक दल पर नजर डाली जाए तो यह बात सामने आ जाएगी कि किसी भी नेता या कार्यकर्ता ने शीर्ष नेतृत्व की आलोचना की तो अगले ही क्षण उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। हालांकि भाजपा लगातर दावा करती है कि पार्टी फोरम में हर तरह की बातों को बोलने की आजादी है। चूंकि भाजपा को एक अनुशासित राजनीतिक दल के रूप में जाना जाता है इसलिए पार्टी नेतृत्व अपने नेताओं व कार्यकर्ताओं से अपेक्षा करता है कि वह सार्वजनिक बयानबाजी से बचे लेकिन पार्टी के अंदर जो कुछ भी चल रहा है, उसको देख-जानकर आम कार्यकर्ताओं में छटपटाहट होने लगी है और वह नतीजों की परवाह किए बिना बोलने लगा है।
प्रदेश के किसी भी गांव या कस्बे की चाय-पान दुकान में जाकर देखा जा सकता है, राज्य सरकार को कोसने वालों की कमी नहीं मिलेगी। साढ़े तेरह साल में पूरे प्रदेश के लोग भाजपा से त्रस्त हो चुके हैं। हर जगह भ्रष्टाचार व भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने वाले भाजपा नेताओं को कोसने वाले मिल जाएंगे। पूरे प्रदेश में शायद ही कोई व्यक्ति मिले, जो यह छाती ठोंककर कह सके कि किसी भी सरकारी अस्पताल, स्कूल या कार्यालय में उसने बिना चक्कर लगाए या रिश्वत दिए अपना काम सफलतापूर्वक करा लिया है। राज्य सरकार भले ही दावा करे परंतु सच यही है कि राज्य सरकार व उसके नुमांइदों की कार्यशैली से आम छत्तीसगढिय़ा उकता चुका है। सबकी जुबान पर बस एक ही शब्द होता है…भइगे….अब नहीं सकों। अगर यह स्थिति है तो इसकी भनक सरकार चलाने वालों तक क्यों नहीं पहुंचती है। प्रदेश के मुख्यमंत्री जब किसी मजदूर के साथ ईंटें जोड़ते हैं या किसी के ऑटो में बैठते हैं या फिर किसी नाई की दुकान में उसका हालचाल पूछते हैं तो उन्हें यह क्यों नहीं पता चल पाता कि प्रदेश में कॉमन मैन परेशान है। उसके रोजमर्रा के काम नहीं हो रहे हैं। जन्म-मृत्यु व विवाह प्रमाणपत्र बनाने के लिए उसे महीनों इंतजार करना पड़ रहा है। यह सब छोटे परंतु महत्वपूर्ण काम हैं, जिनके नहीं होने से सरकार के प्रति आम लोगों का गुस्सा बढ़ता है।
बात हो रही थी भाजपा में आंतरिक लोकतंत्र की, जो पार्टी से जुड़े लोगों का मानना है कि लोकतंत्र न पार्टी के अंदर है और बाहर होने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता। नेतृत्व को आंख दिखाने वाले पलभर में पार्टी के इतिहास पुरुष बन जाते हैं। नंदकुमार साय, रमेश बैस, करुणा शुक्ला, गणेशराम भगत, सोहन पोटाई, देवलाल दुग्गा जैसे दिग्गज कभी भाजपा के चेहरे हुआ करते थे लेकिन सरकार की कार्यशैली को नापंसद किया तो उन्हें हाशिए पर फेंक दिया गया। आज ही भाजपा किसान मोर्चा के एक प्रदेश स्तरीय नेता को तत्काल प्रभाव से भूतपूर्व बना दिया गया क्योंकि उसने कमीशनखोरी पर कटाक्ष करते हुए एक तस्वीर सोशल मीडिया में वायरल कर दी थी। तस्वीर सच्चाई बयां कर रही थी, जो पार्टी के बड़े व चापलूस नेताओं को रास नहीं आई। निष्ठा प्रदर्शित करने का मौका गंवाए बिना उन्होंने ऐसा करने वाले को पद से हटा दिया और यह साबित करने की कोशिश की कि पार्टी के लिए सबसे अधिक समर्पित वही हैं। दरअसल सामने विधानसभा के चुनाव हैं और उस समय यही निष्ठा काम आएगी क्योंकि भाजपा में प्रत्याशी बनने का अब तक यह सबसे अच्छा फार्मूला रहा है कि जो जितना चापलूस या मिठलबरा, वह टिकट के लिए सबसे अधिक योग्य। भाजपा संगठन में बैठे नेता अब इसी काम में लगे हैं ताकि प्रत्याशी बनने का उनका रास्ता आसान हो सके। पर कहा जा रहा है कि इस बार फार्मूला बदला जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो चापलूसी करने वालों का पत्ता कटना तय है और योग्य व बे-बाक लोगों को मौका मिल जाएगा।

चोखेलाल
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