Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                 6 मार्च 17
तरकश से बाण निकल चुका है, प्रत्यांचा चढ़ चुकी है और निशाना भी तय है बस प्रत्यांचा छोडऩे की देरी है। इस तस्वीर से यह साबित हो रहा है कि प्रदेश भाजपा में आगे चलकर सब-कुछ ठीक नहीं होने वाला है। राजनीति में जब भी गुटबाजी की चर्चा होती है तो सबसे पहले कांग्रेस की बात होती है, लेकिन अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष बनकर केबिनेट मंत्री का दर्जा हासिल करके अपने गृह प्रदेश लौटे नंदकुमार साय के स्वागत के समय जो दृश्य दिखा, उससे साफ हो गया कि प्रदेश भाजपा के सत्ता और संगठन के शीर्ष पदों पर बैठे नेताओं को यह रास नहीं आया। इस कद्दावर आदिवासी नेता के स्वागत में ऐसा कोई बड़ा नेता नहीं पहुंचा, जिसे भाजपा का चेहरा कहा जा सकता है।
लम्बे समय से हाशिए में रहने वाले नंदकुमार साय ने बार-बार अपमान झेला। सत्ता और संगठन के नेताओं को जब मौका मिला, उन्हें अपमानित किया। एक समय भाजपा के आदिवासी चेहरा माने जाने वाले नंदकुमार साय की गलती केवल यह थी कि उन्हें राज्य सरकार के कुछ फैसले रास नहीं आते थे और इन पर वे अपनी सार्वजनिक राय दे देते थे, जो सत्ताधीशों को नागवार गुजरता था और वे साय को अपना विरोधी मान बैठे थे। सत्ताधीश यह भूल जाते थे कि साय ने सदैव ईमानदारी की राजनीति की है। बलीराम कश्यप जैसे अपने परिवार को राजनीति में स्थापित नहीं किया है।
नंदकुमार साय के अपमान की पराकाष्ठा उस समय हो गई, जब प्रदेश भाजपा के प्रभावी नेताओं ने राज्यसभा से उनका पत्ता साफ करा दिया और तुरंत बाद उन्हें भाजपा कोरग्रुप से विदा कर दिया। इसके बावजूद नंदकुमार साय खामोश रहे और पार्टी या नेताओं के खिलाफ कुछ नहीं बोला। इसका परिणाम उन्हें मिला और आज वे केंद्रीय मंत्री का दर्जा हासिल करने के बाद अपने घर लौटे हैं। घर लौटते ही उन्होंने अपने तेवर दिखा दिए। स्वागत के दौरान धनुष पर प्रत्यांचा चढ़ाते हुए उन्हें कह दिया कि उनके निशाने पर कई लोग हैं। साय ने यह बात भले मजाक में कही हो, लेकिन यह सच है कि इस आदिवासी नेता के मन में प्रदेश भाजपा के कुछ शीर्ष नेताओं के प्रति बेहद गुस्सा है और अब वे एक कुर्सी पर बैठकर इन नेताओं को घेरने की तैयारी कर रहे हैं।
आदिवासी समुदाय में नंदकुमार साय की एक हैसियत है। नक्सली समस्या के समाधान करने के माध्यम से वे प्रदेश के आदिवासी बहुल संभाग बस्तर में गुसेंगे और वहां से जिस तरह की राजनीति करेंगे, वह प्रदेश भाजपा के सत्ताधीशों की नींद उड़ाने के लिए काफी होगी। साय को बस्तर में भाजपा के नाराज सोहन पोटाई व देवलाल दुग्गा जैसे आदिवासी नेताओं का साथ मिल सकता है। ऐसे में अगर अजीत जोगी ने बस्तर से उप मुख्यमंत्री व बस्तर को राजधानी बनाने का सपना दिखाया है तो नंदकुमार साय के साथ वहां के आदिवासी नेता भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से बड़ी घोषणा करा सकते हैं। यह घोषणा आदिवासी मुख्यमंत्री की हो सकती है। ऐसा होने पर प्रदेश भाजपा का नेतृत्व विधानसभा चुनाव में कितनी शिद्दत के साथ उतरेगा, यह तो वक्त बताएगा परंतु एक बात साफ ही कि यह आदिवासी नेता अपने अपमानों को बदला गिन-गिनकर लेने की तैयारी कर चुका है।

चोखेलाल
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