Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति रायपुर, 15 मई 17

तेरा क्या होगा कालिया……यह सवाल इन दिनों भाजपा विधायकों के बीच गूंज रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जब से संकेत दिए हैं कि अगले साल होने वाले विधानसभा के चुनाव में भाजपा कई नए चेहरों के साथ मैदान में उतरेगी, भाजपा विधायकों में खलबली मच गई है। सब खुद को अच्छा साबित करने में लग गए हैं। मुख्यमंत्री ने अपने बयान में मंत्रियों को भी क्लीन चिट नहीं दी है। उन्होंने कहा कि मंत्रियों के बारे में फैसला केंद्रीय चुनाव समिति करेगी। इससे यह साबित होता है कि तेरह सदस्यीय मंत्रिमंडल के करीब आधे मंत्री रॉडार में हैं।
मुख्यमंत्री भले चेहरों के साथ चुनाव मैदान पर उतरने की तैयारी कर रहे हैं परंतु भाजपा के तीसरे शासनकाल में मंत्रियों व भाजपा विधायकों की हैसियत किसी से छिपी नहीं है। वे सिर्फ नाम के मंत्री व विधायक हैं। बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत, प्रेमप्रकाश पाण्डेय, अजय चंद्राकर और केदार कश्यप के अलावा शायद ही किसी मंत्री या संसदीय सचिव का राज्य सरकार में कोई वजूद हो। इनमें भी अधिकतर मंत्री इसलिए यदा-कदा दिख जाते हैं क्योंकि वे मुख्यमंत्री के करीबी माने जाते हैं या उनके पास नियम-कायदों की जानकारी है। भाजपा के अधिकतर विधायक तो इन साढ़े तीन साल में अपनी पहचान भी नहीं बना पाए हैं।
भाजपा भले ही वर्तमान विधायकों के कामकाज को आधार बनाकर उनके बारे में फैसला करे पर सच्चाई यही है कि किसी विधायक के पास इतनी ताकत नहीं है कि वह अपने क्षेत्र या क्षेत्र के किसी भी कार्यकर्ता का काम सरकार से करा सके। चूंकि विधायकों का क्षेत्र की जनता से सीधा सम्बंध रहता है, लिहाजा जनता का आक्रोश पहले उन्हें ही उठाना पड़ता है। हाल ही में सरकार ने जब शराब बेचने का फैसला किया तो मुख्यमंत्री ने अपने किसी विधायक से रायशुमारी नहीं की गई। भाजपा संगठन से भी किसी प्रकार की सलाह नहीं ली गई। कैबिनेट में उस समय फैसला किया गया जब बृजमोहन अग्रवाल और प्रेमप्रकाश पाण्डेय गैरहाजिर थे। अफसरों क सलाह पर यह फैसला विशुध्द मुख्यमंत्री का था जिसका खामियाजा अपने-अपने क्षेत्रों में विधायकों व भाजपा के अन्य जनप्रतिनिधियों को भुगतना पड़ रहा है। दबी आवाज में भाजपा के अधिकतर नेताओं ने सरकार के इस फैसले का विरोध किया लेकिन पार्टी के कथित अनुशासन के कारण उनके स्वर मुखर नहीं हो पाए।
वर्तमान विधायकों के नाम काटने से पहले भाजपा चुनाव समिति को यह जरूर देखना चाहिए कि मुख्यमंत्री के सामने उस विधायक की औकात क्या थी। क्या वह अपनी बात खुलकर मुख्यमंत्री से करता रहा है। क्या अधिकारी उस विधायक की बात मानकर क्षेत्र में काम करते थे। जिस प्रदेश में कलक्टर और पुलिस अधीक्षक की तैनाती मुख्यमंत्री के नाक के बाल समझे जाने वाले अफसरों की पसंद से होती रही है, उस प्रदेश में सत्तारूढ़ दल के विधायक की हैसियत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। जिस प्रदेश के गृहमंत्री को नहीं पता होता है कि किस जिले के एसपी, आईजी बदल दिए गए हैं, वहां के मंत्रियों को अपनी औकात आंकने में देर नहीं लगानी चाहिए। ऐसे समय में मंत्रियों व विधायकों के परफारमेंस को खराब कहकर उन्हें टिकट से वंचित करना न्यायसंगत तो नहीं कहा जा सकता।
इस स्थिति में तो ठीकरा राज्य सरकार के नेतृत्व पर फोडऩा चाहिए क्योंकि छत्तीसगढ़ में सत्ता का केंद्रीयकरण है। यहां अधिकारों का विभाजन नहीं है। कहने के लिए तो प्रदेश में गृह, परिवहन, लोक निर्माण, स्वास्थ्य जैसे विभागों में मंत्री हैं, पर सच्चाई यही है कि इन सभी विभागों का संचालन मुख्यमंत्री निवास से होता है। इसीलिए अगर कहीं पुल गिरता है या किसी का गर्भाशय निकाल लिया जाता है, आंखें फोड़ दी जाती हैं या नक्सल घटना में जवान शहीद हो जाते हैं तो सम्बंधित मंत्री पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती क्योंकि सभी जानते हैं कि इस सरकार में इन विभागों के मंत्री केवल शो पीस हैं। रिमोट तो कहीं और हैं जहां से सत्ता का संचालन किया जाता है। इसलिए जब इन दिखावे के मंत्रियों व विधायकों के पास कोई अधिकार ही नहीं है, बोलने के लिए जुबान ही नहीं है तो इन बे-जुबानों की कुर्बानी कहां तक उचित होगी, यह पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को सोचना होगा।

चोखेलाल
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