Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति रायपुर, 16 मई 17

(एक पाठक के सुझाव पर)

अक्सर यह सुनने को मिलता है कि महिलाओं की सबसे बड़ी दुश्मन महिलाएं ही हैं। यह विषय बहस का हो सकता है परंतु यह बात सोलह आने सही है कि महिलाओं की हमदर्द महिलाएं तो निश्चित रूप से नहीं है। छत्तीसगढ़ में इसके उदाहरण बिखरे पड़े हैं। राजनीति में 33 फीसदी भागीदारी की मांग करने वाली किसी महिला ने आज तक यह नहीं बताया है कि उसने महिला उत्थान के लिए क्या किया। पुण्यतिथि, जन्म दिन और धरना-प्रदर्शनों में अपने मेकअप और साडिय़ों की ब्रांडिंग कर सेल्फी लेने वाली महिलाओं की प्रदेश कांग्रेस और भाजपा में भरमार है। राजनीतिक दलों में सक्रिय होने के कारण पास-पड़ोस और कुछ हद तक परिवार में मान-सम्मान पाने वाली इन महिलाओं की राजनीति में कितनी भागीदारी है, यह बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि राजनीतिक दलों में कम से कम छत्तीसगढ़ में तो महिलाओं को शो पीस से अधिक नहीं माना जाता है और अपनी कार्यशैली के कारण वे इस लायक हैं भी।
हो सकता है कि चोखेलाल की आज की टिप्पणी से नारी शक्ति मर्माहत हो जाएं। उन्हें ऐसा लगने लगे कि यह महिलाओं का अपमान है परंतु ऐसा सोचने से पहले उन्हें यह जरूर याद कर लेना चाहिए कि आइना तोडऩे से शक्ल अच्छी नहीं हो जाती। खूबसूरत दिखने के लिए चेहरे को सुंदर बनाना होता है। प्रदेश भाजपा में ऐसी नेत्रियों की कमी नहीं है, जिनकी ख्याति देशव्यापी है। राजनीतिक व आरएसएस की पृष्ठभूमि रखने वाली महिलाओं को सरकार ने विभिन्न पदों पर सुशोभित भी किया है। किसी को राज्य महिला आयोग का अध्यक्ष मनोनीत किया है तो किसी को बाल कल्याण, नि:शक्तजन आयोग या महिलाओं व बच्चों से जुड़ी दूसरी संवैधानिक संस्थाओं की जिम्मेदारी दी है। इसके अलावा भाजपा का प्रदेश व जिला स्तरीय महिला मोर्चा है, लेकिन याद कीजिए कि एक आईपीएस की प्रताडऩा से परेशान एक महिला आरक्षक के कंधे पर किसने हाथ रखा। किसने उसके लिए आवाज उठाई। ठीक है कि वह आरक्षक सरकारी मुलाजिम है इसलिए सरकार सेवा नियमों के तहत कार्रवाई कर रही है लेकिन क्या कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त करने वाली इन मेकअप से पुती नेत्रियों की जिम्मेदारी नहीं है कि वे उस महिला को सम्बल प्रदान करें क्योंकि आयोगों का दायित्व सम्भालते हुए तो इन्होंने बड़ी-बड़ी बातें की थीं कि प्रदेश की अंतिम महिला को न्याय दिलाने के लिए वे लड़ाई लड़ेंगी फिर क्या हुआ? एक मंत्री की बद्तमीजी का विरोध करने वाली एक महिला अफसर का मामला सामने आते ही इन प्रखर नेत्रियों को सांप सूंघ गया। डर लगने लगा कि अगर उस महिला के साथ गईं तो पद और रुतबे के साथ कमाई भी बंद हो जाएगी।
केवल बैठकों, सरकारी आयोजनों में जलवा बिखेरने वाली इन नेत्रियों के आंख-कान उस दिन बंद हो गए जब राजधानी के भाठागांव में दो सिपाहियों ने दो युवतियों को अगवा करने की कोशिश की। प्रशासन ने अपना काम किया परंतु क्या इन नेत्रियों की जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि वे इन युवतियों के पास जाती और विश्वास दिलाती कि शासन-प्रशासन उनके साथ है और प्रदेश की कोई भी युवती या महिला महफूज नहीं है। महिला अत्याचार से पूरा बस्तर दहल रहा है, लेकिन देशव्यापी पहचान रखने वाली छत्तीसगढ़ भाजपा की एक नेत्री ने कभी नहीं कहा कि वे बस्तर की आदिवासी महिलाओं को न्याय दिलाएंगी। उन्हें सिर्फ अपनी राजनीति से मतलब है क्योंकि उनके सपने बड़े हैं और रोज उन्हें सपने में महानदी भवन (राज्य सचिवालय)दिखाई देता है। वे केवल गणेश परिक्रमा पर भरोसा रखती हैं। उन्हें पता है कि विध्नहर्ता प्रसन्न हुए तो जनमानस कुछ नहीं बिगाड़ सकता है।
लोकतंत्र में विपक्ष की अहम भूमिका होती है लेकिन छत्तीसगढ़ में विपक्ष और खासकर महिला कांग्रेस की क्या स्थिति है, किसी से छिपी नहीं है। अब तो महिला कांग्रेस के वजूद पर भी सवाल खड़े किए जाने लगे हैं। कांग्रेस का यह फ्रण्टल ऑर्गेनाइजेशन एक समय बेहद सशक्त हुआ करता था लेकिन पार्टी के बड़े नेताओं की आपसी खींचतान ने जिस तरह कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया, उसका असर इस संगठन पर दिखाई देने लगा है। अब तो शायद ही किसी को पता हो कि महिला कांग्रेस की प्रदेश या जिलों में अध्यक्ष कौन है। कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ में महिलाओं की जो दुर्दशा है, उसके लिए यहां राजनीति करने वाली महिलाओं से बढ़कर कोई दोषी नहीं है अन्यथा नारी शक्ति के सामने सारा जहां झुकता रहा है, फिर यह सरकार किस खेत ही मूली है परंतु राजनीति करने के कारण पद और प्रतिष्ठा की जो भूख है, उससे प्रदेश में राजनीति करने वाली महिलाएं खुद को अलग नहीं रख पाई हैं लिहाजा प्रदेश की महिलाएं लुटती रही हैं और लुटती रहेंगी। इसे कोई नहीं रोक सकता है।
चोखेलाल
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