Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                 7 मार्च 17
तिहाड़ जेल की सख्त जमीन पर दरी बिछाकर सोने वाले दर्द का एहसास आईएएस अफसर बाबूलाल अग्रवाल  को है अथवा नहीं, यह तो वही बता सकते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की मीडिया इस बात को जानकर दर्द से तड़प रही है। इस तरह की तड़पन उन मीडिया समूहों को है, जिन्होंने छत्तीसगढ़ और छत्तीगसढिय़ों के दर्द को कभी भी महसूस नहीं किया। इन मीडिया समूहों में काम करने वाले अधिकतर बाहरी पत्रकार हैं और उनको छत्तीसगढ़ के गांव-बोली-भाषा, रहन-सहन का अनुभव नहीं है। सोशल मीडिया में तस्वीरें पोस्ट करने के लिए वे यदा-कदा गांवों में जाकर यह दर्शाने की कोशिश करते हैं कि उन्हें यहां के लोगों से लगाव है। उन्हें तो सिर्फ सत्ता की चकाचौंध ही दिखाई देती है। अफसरों के चमचमाते वातानुकूलित कमरे उनको आकर्षित करते हैं। स्टार होटलों में लेट नाइट पार्टीस तथा त्योहारों में मिलने वाले महंगे गिफ्ट्स इन मीडिया कर्मियों को छत्तीसगढिय़ों की तरफ नहीं देखने को प्रेरित करती हैं।
देश और प्रदेशों की जेलों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। एक उदाहरण नहीं मिलेगा, जिसके आधार पर यह कहा जाए कि जेल जाने वाले किसी भी आरोपी को घर के समान सुविधाएं मिली हों। अदालतें भी बीमार या नि:शक्तों को कुछ सुविधाएं दिलाती हैं। ऐसी स्थिति में अगर बाबूलाल अग्रवाल को तीन रोटियां, दाल, सब्जी, दरी और चादर-तकिया मिल रही है, तो इसमें छत्तीसगढ़ की बाहरी मीडिया के पेट में दर्द क्यों होना चाहिए? इसके लिए अपने अखबारे में बड़ी-बड़ी जगह देने का औचित्य समझ नहीं आया।
छत्तीसगढ़ में आकर व्यापार करने वाले मीडिया हाउसेस को यह समझने की जरूरत है कि राज्य सरकार, राजनेता, कुछ धनाढ्य विज्ञापनदाताओं, शराब माफियाओं व रियल इस्टेट के क्षेत्र में काम करने वालों के अलावा भी छत्तीसगढ़ है और वे अपना अखबार उन्हीं लोगों के लिए निकालते हैं। बाबूलाल अग्रवाल को जेल में हो रही तकलीफ को प्रकाशित करने से पहले मीडिया हाउसेस को यह सोचना चाहिए कि बाबूलाल अग्रवाल ने आखिर ऐसा क्या किया, जिसके कारण उसे तिहाड़ जेल जाना पड़ा। यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि छत्तीसगढ़ में बाबूलाल अग्रवाल भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुके हैं। उन्होंने छत्तीसगढिय़ों के साथ छल किया है, उनका हक मारा है। सबकुछ जानते हुए भी राज्य सरकार उसे संरक्षण देती रही, लेकिन वह भी उसे कब तक बचाती। आखिरकार बाबूलाल अग्रवाल को किए की सजा मिल गई।
लेकिन यह प्रदेश के उन मीडिया हाउसेस को रास नहीं आ रहा है, जो पत्रकारिता की आड़ में दलाली करके इस पाक पेशे को बदनाम कर रहे हैं। प्रदेश में ऐसे कई मीडिया कर्मी हैं जो पत्रकारिता कम दलाली (नीरा राडिया की तरह)अधिक करते हैं। अखबार की दुनिया में ऐसे पत्रकारों को लाइजनर्स कहा जाता है। वे दूर की सोचते हैं। अपने अखबार में वे आज बाबूलाल अग्रवाल की पीड़ा इसलिए छाप रहे हैं क्योंकि उन्हें अब भी उम्मीद है कि अगर कल बाबूलाल अग्रवाल के दिन फिर गए और वे फिर राज्य सरकार के किसी असरदार ओहदे पर बैठ गए तो आज प्रकाशित अखबार को दिखाकर वे अपना उल्लू सीधा कर लेंगे। ऐसे मीडिया हाउसेस की विश्वसनीयता सदैव संदेहास्पद रहेगी और यह तय रहेगा कि जिस धरा में में धन कमा रहे हैं, वे वहां के लोगों के कभी नहीं हो सकते हैं।

                                        चोखेलाल
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