Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति             रायपुर, 17 मई 17

दिद्दा चलीं सावित्री बनने….कहानियों में सभी ने यह पढ़ा होगा कि सत्यवान नामक एक नौजवान की जान लेकर जब यमराज रवाना हो रहे थे तो सत्यवान की पत्नी ने उन्हें रोका और आखिरकार ऐसा तप किया कि यमराज को सत्यवान को बख्शना पड़ा। यहां जान (मृत्यु) का मतलब संकट से है। अपने सत्यवान को संकट में देखकर दिद्दा अक्सर सावित्री का रूप धर लेती हैं और फिर संकट पैदा करने वाले सत्यवान को बख्श देते हैं।
चोखेलाल अपने पाठकों को कुछ महीने पीछे ले जाना चाहता है जब एक दिव्यांग युवक ने मुख्यमंत्री निवास के सामने अग्निस्नान कर लिया था। उस वक्त उस नौजवान के परिजनों को मदद दिलाने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी मुख्यमंत्री निवास के सामने धरने पर बैठ गए थे या यूं कहिए कि वे वहां जमीन पर गद्दा बिछाकर लेट गए थे। उनकी जिद थी कि जब तक मुख्यमंत्री उस दिव्यांग नौजवान के परिजनों को राहत नहीं पहुंचाएंगे, वे जमीन पर लेटे रहेंगे। माहौल की नजाकत और अपने सत्यावान को संकट में देखकर दिद्दा प्रकट हुईं और उन्होंने पहले अजीत जोगी से फोन पर बात की और उसके बाद चाय-नाश्ता भिजवाया। दिद्दा का यह वार काम आया और विरोधी चारों खाने चित हो गया। चाय-नाश्ता के बाद धरना तो क्षणभर में खत्म हो गया परंतु उसके बाद से आज तक यह नहीं पता लग पाया कि उस दिव्यांग युवक के परिजन कहां हैं तथा किस हाल में जी-खा रहे हैं। उसकी मौत का राजनीतिक उपयोग किया गया और हित साध लिया गया। दिद्दा ने भी साबित कर दिया कि राजनीतिक समझ व गुण उनमें भी है। कई मामले पुलिस के डण्डे से नहीं निपटाए जा सकते हैं। उसके लिए प्यार भरी एक बोली और एक प्याली चाय ही काफी है।
दिद्दा कहती हैं कि राजनीति में उनकी दिलचस्पी नहीं है और वे चुनाव नहीं लडऩा चाहतीं परंतु इस प्रदेश के लोग अच्छी तरह जानते हैं कि जनदर्शन की तरह दिद्दा का भी जनदर्शन लगता है। बेहद गंभीर मामलों में फंसे अफसर, नेता दिद्दा की शरण में जाते हैं और रात के बाद जब सुबह आती है तो वह इन दिनों के लिए सुखद खबर लाती है। दिद्दा उन्हीं मामलों में दखल देती हैं, जिसमें उनके सत्यावान की दिक्कत बढऩे वाली होती है वरना आम लोगों की क्या मजाल है कि वे दिद्दा के दरबार तक पहुंच जाएं। उनके दरबार में दलाल व चापलूस किस्म के भाजपा नेता व अफसरों की लाइन लगी रहती है। कहा तो यह भी जाता है कि प्रशासन से जुड़े कई बड़े फैसलों में उनकी राय को महत्व दिया जाता है।
दिद्दा वैसे तो बेहद कम बोलती हैं परंतु जब बोलती हैं, वह अपने सत्यवान के साथ खड़ी रहती हैं। इस समय उन्होंने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल की मां व पत्नी के बारे में बोला क्योंकि भूपेश बघेल अपने बेहद आक्रामक अंदाज में भाजपा सरकार को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इससे मुख्यमंत्री निवास में शायद बेचैनी हो और मुख्यमंत्री के रणनीतिकार इससे निपट नहीं पा रहे हों क्योंकि देखा गया है कि सरकार के भूपेश बघेल पर किए जा रहे अधिकतर वार सरकार पर भारी पड़ रहे हैं। शायद इसी स्थिति को भांपकर दिद्दा एक बार फिर सामने आईं और उन्होंने बेहद सधे हुए अंदाज में कह दिया कि महिलाओं खासकर बुजुर्ग महिलाओं का इस तरह थाने या किसी भी जांच एजेंसी के दफ्तर में जाना शोभनीय नहीं है। सरकार को देखना चाहिए कि महिलाओं का सम्मान बना रहे।
दिद्दा के इस बयान ने असर किया और जिस सहानुभूति के भूपेश बघेल पात्र थे, वह दिद्दा के हिस्से में चली गईं और यह साबित करने की कोशिश की गई कि महिलाओं व बुजुर्गों के प्रति सरकार संवेदनशील है। परंतु यहां सवाल यह उठता है कि दिद्दा को तब पीड़ा क्यों नहीं हुई जब सुरक्षा जवानों ने मीना खलको का बलात्कार करके उसे मार डाला। तब दिद्दा का दिल क्यों नहीं पसीजा जब एक आईपीएस अफसर ने अपनी अधीनस्थ महिला सिपाही का यौन शोषण किया। दिद्दा तब उन महिलाओं के साथ क्यों खड़ी नहीं हुईं, जिन्हें सरेराह सिपाहियों ने अगवा करने की कोशिश की। शायद इसलिए दिद्दा शांत रहीं क्योंकि वे सब कॉमन मैन हैं और जिन महिलाओं के बारे में उन्होंने बोला वे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के परिजन हैं। दिद्दा भले कहें कि राजनीति में उनकी रुचि नहीं है परंतु सच यही है कि वे बेहद महत्वाकांक्षी हैं और अवसर लिने पर मौका नहीं छोड़ेंगी।

चोखेलाल
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