Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति             रायपुर, 18 मई 17

राज्य निर्माण से पहले यहां किसी भी प्रकार का आंदोलन होता था तो एक नारा जरूर लगाया जाता था….लइके रहिबो छत्तीसगढ़ राज। खैर परिस्थितियां बदलीं और यह नारा सार्थक भी हो गया। राज्य निर्माण में किसने क्या भूमिका निभाई वह अलग विषय है परंतु राज्य बनने के सत्रह साल बाद वह सपना पूरा नहीं हुआ, जिसके लिए राज्य की स्थापना की गई थी।…लइके रहिबो छत्तीसगढ़ राज का नारा बुलंद करने वालों ने इसे अपनी बड़ी जात मान ली और उसके बाद उन्होंने ऐसी खामोशी ओढ़ ली मानो उन्होंने कोई बड़ी जंग जीत ली है।
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पीछे सिर्फ एक उद्देश्य था कि इस छोटे से खनि-सम्पदा से भरपूर वाले राज्य  में छत्तीसगढिय़ों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार मिले। शासन-प्रशासन में छत्तीसगढिय़ों की भागीदारी सुनिश्चित हो और यहां के हर तरह के विकास में छत्तीसगढिय़ों की अहम भूमिका हो। चोखेलाल की आंखों से आंसू झरने लगे जब उसने इन दिनों सोशल मीडिया में छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्नदृष्टा माने जाने वाले दिवंगत संत कवि पवन दीवान की बातों को सुना। हालांकि अब वे इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके विचारों वाले इस ऑडियो-वीडियो टेप से यह साबित हो गया कि अपार संभावनाओं से भरे इस छत्तीसगढ़ में गैर छत्तीसगढिय़ों का राज हो गया है। इन गैर छत्तीसगढिय़ों ने यहां की पावन व उर्वरा धरा के लोगों को कामचोर व मजदूर बनाकर रख दिया है।
अगर निर्वाचित सरकार के नुमांइदों के नामों पर नजर डाली जाए तो अधिकतर जनप्रतिनिधि गैर छत्तीसगढिय़ा हैं। इसी तरह नौकरशाही में तो गैर छत्तीसगढिय़ों का बोलबाला है और रही बात मीडिया की तो दूसरे प्रदेशों से आए मीडिया समूहों ने माधवराव सप्रे व गजानन माधव मुक्तिबोध की उकृष्ठ पत्रकारिता की इस धरा को तार-तार कर दिया है। अखबारों को कॉरपोरेट हाउसों की तरह चलाया जा रहा है जहां पत्रकारिता नहीं नौकरी कराई जाती है। लोकतंत्र के ये तीनों स्तंभ प्रदेश के उन ढाई करोड़ छत्तीसगढिय़ों के भविष्य का फैसला कर रहे हैं, जिन्हें छत्तीसगढ़ की माटी से लगाव नहीं है। छत्तीसगढ़ की कला-संस्कृति से वे अनजान हैं।
राज्य निर्माण के बाद दो सरकारें बनीं। कांग्रेस की सरकार मनोनीत थी तथा भाजपा ने तीन बार चुनाव जीतकर सरकार बनाई। इन सत्रह सालों में दोनों ही राजनीतिक दल के नेता प्रदेश के किसी एक छत्तीसगढिय़ा का नाम लेकर यह नहीं कह सकते कि उसके निजी विकास में उनका कोई योगदान है। कागजों पर सरकार अनेक योजनाओं का दावा कर सकती है परंतु सरकारी नुमाइंदों को उस समय शर्म से गड़ जाना चाहिए जब साइकिल या कंधे पर शव लादकर कोई आदिवासी अपने परिजन को ले जा रहा होता है। उस समय इन लोगों की आंखें झुक जानी चाहिए जब यह बात सामने आती है कि पीने के पानी या राशन के लिए आम छत्तीसगढिय़ा को मीलों का सफर तय करना पड़ रहा है। इन नुमांइदों को तब आत्मग्लानि होनी चाहिए जब पता चलता है कि दवाइयों के अभाव में किसी की मौत हो गई। शाला त्यागी बच्चों के आंकड़े साल-दर-साल बढ़ रहे हैं पर सरकारी सरपरस्ती में महंगे प्राइवेट स्कूल खुलते जा रहे हैं।
पुरखों ने यह सब देखने के लिए छत्तीसगढ़ राज्य का सपना नहीं देखा था। उन्होंने राज्य की कमान जिन हाथों को सौंपी, वे सब व्यापारी बन गए। राजनीति और नौकरशाही ने मिलजुलकर छत्तीसगढ़ में वह सब किया, जो आम छत्तीसगढिय़ों के हित में तो निश्चित रूप में नहीं है। सरकार में गैर छत्तीसगढिय़ा, नौकरशाही में गैर छत्तीसगढिय़ा, मीडिया समूहों में गैर छत्तीसगढिय़ा यहां तक कि विकास में भागीदार बनने के लिए अपनी जमीन देकर कारखाने खड़े कराने वालों की जगह वहां का संचालन भी गैर छत्तीसगढिय़ा कर रहे हैं। छत्तीसढिय़ों के हाथ में केवल चाकरी है।  वे राजनीतिक दलों में कार्यकर्ता हैं जिनसे दरी बिछवाई जाती है, पोस्टर-बैनर लगवाए जाते हैं और जब लाभ देने की बारी आती है तो यह राजस्थान, उत्तरप्रदेश व अन्य राज्यों के नेताओं को दे दिया जाता है। इसी तरह नौकरशाही में बड़ी कुर्सियों पर गैर छत्तीसगढिय़ा बैठे हैं और छत्तीसगढिय़ा बाबू और चपरासी बन गए हैं। मीडिया हाउस में नीति निर्धारक गैर छत्तीसगढिय़ा हैं और लड़ाई लडऩे के लिए स्थानीय नौजवान को पत्रकार के रूप में झोंक दिया जाता है। कारखानों में मजदूरी करने वाला छत्तीसगढिय़ा ही है। उसे मैनेजर या बड़ी कुर्सी पर नहीं बिठाया जाता है।
दरअसल अगर देखा जाए तो इस स्थिति के लिए सबसे बड़ा दोष छत्तीसगढिय़ों का है, जिन्होंने बड़े प्यार से अपना हक और अधिकार गैर छत्तीसगढिय़ों को सौंप दिया। अब बाहरी लोग छत्तीसगढ़ में राज कर रहे हैं। किसी छत्तीसगढिय़ा में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह कश्मीर के नौजवानों की तरह आक्रामक रुख अख्तियार करे क्योंकि वहां भी तो लड़ाई अधिकारों की ही तो हो रही है। इस समय नौजवान छत्तीसगढिय़ों को सोचने की जरूरत है कि की-पोस्ट पर वे बैठेंगे या फिर अपने पूर्वजों की तरह बाहरियों की चाकरी करते रहेंगे।

चोखेलाल
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