Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति             रायपुर, 27 मई 17

भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व बार-बार कहता है कि राजनीति में शुचिता बनाए रखना है। शासन-प्रशासन में पारदर्शिता की वकालत की जाती है। सबका साथ, सबका विकास जैसे लोक लुभावन नारे दिए जाते हैं। बताइए….सुनने में कितना अच्छा लगता है। मन बल्लियों उछलने लगता है जब प्रदेश के मुख्यमंत्री कहते हैं कि मंत्रियों और भाजपा नेताओं को एक साल के लिए कमीशनखोरी बंद कर देनी चाहिए। काश…नेताओं की कही ये बातें होने लगे तो पूरे देश-प्रदेश का माहौल किसी रामराज्य से कम नहीं होगा।
भाजपा के साथ दिक्कत यह है कि वह सब पर दबाव बना सकती है परंतु जैसे ही अपनों की बारी आती है, तमाम नियमों को शिथिल कर दिया जाता है। जैसे भारत सरकार के कहने पर आज तक प्रदेश के मंत्रियों ने अपनी चल-अचल सम्पति का विवरण नहीं दिया है। जिन्होंने दिया है, उसको अंतिम सत्य मान लिया गया है। कई चीजें खुली आंख से दिख रही हैं जैसे फटीचर स्कूटर चलाने वाला भाजपा का एक नेता मंत्री बनते ही महंगी कारों में घूमने लगा। कभी छोटा-मोटा व्यवसाय करके अपना परिवार चलाने वाले भाजपा के अनेक नेता बीते तेरह सालों में प्रदेश के प्रतिष्ठित लोग बन गए हैं। महंगे बंगले, कार और अत्याधुनिक सुविधाएं उन्होंने कहां से और किस रास्ते पर चलकर गुजारी, इसका ब्योरा तो उन्होंने अब तक नहीं दिया है परंतु भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व खामोश है।
बेहतर होता कि भाजपा शुचिता और पारदर्शिता अपने घर से शुरू होती तो पता चलता कि महासमुंद से चुनाव जीतकर पहली बार लोकसभा पहुंचे भाजपा के एक नेता के परिजन रातों-रात ठेकेदार कैसे बन गए। भाई-भतीजे, साले व अन्य रिश्तेदारों में शायद ही कोई बचा हो जिसके पास रेत या गिट्टी की खदान न हो। जिले में होने वाले बड़े-बड़े निर्माण कार्यों में किसी न किसी रूप में उनकी भागीदारी तय है। इतना ही नहीं सांसद निधि की राशि भी घूम-फिरकर घर में ही पहुंचती है। यह तो कमीशनखोरी की बात है परंतु प्रदेश के एक मंत्री पर अपनी निधि अपने ही रिश्तेदारों के बीच बांटने का संगीन आरोप लगा है और राज्य की जांच एजेंसियों के पास इसकी शिकायत की गई है। चूंकि मामला सत्तारूढ़ पार्टी के मंत्री से सम्बंधित है, लिहाजा उसे जांच करने के नाम पर होल्ड कर दिया गया है।
पूरे प्रदेश में किसी भी विभाग के किसी बड़े काम पर हाथ डालिए, निश्चित रूप से उसमें प्रदेश या बाहर के किसी बड़े भाजपा नेता की भागीदारी मिलेगी। कहने का मतलब है कि सरकार भी भाजपा चलाएगी और ठेकेदारी भी उसके नेता करेंगे तो सवाल यह है कि आम व्यापारी या कॉमन मैन क्या करेगा। सामान्य व्यक्ति को भूल से कोई सरकारी काम मिल भी गया तो सम्बंधित विभाग के मंत्री और अफसर उससे इतना कमीशन मांगते हैं कि वह व्यक्ति काम छोड़ देना बेहतर समझता है। प्रदेश की खराब सड़कें इस बात का प्रमाण हैं कि कमीशन न देने के कारण ठेकेदार को वर्क ऑर्डर नहीं मिलता है और कुछ समय बाद वह खुद ही काम छोडऩे के लिए मजबूर हो जाता है। इसी तरह शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, वन, पंचायत, पयर्टन व संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाले बाहरी हैं अथवा वे लोग हैं जो मंत्रियों व अफसरों को भारी-भरकम कमीशन देने के लिए समर्थवान हैं। ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री चाहे लाउड स्पीकर लगाकर कमीशनखोरी बंद करने की बात करें या केंद्रीय नेतृत्व काम में शुचिता व पारदर्शिता की बात करे, सब असरहीन साबित होंगी क्योंकि सबके मुंह पर खून लग चुका है। फिर सामने चुनाव हैं, जिसमें बहुत खर्च करना पड़ेगा। जीत गए तो वसूल हो जाएगा और अगर हार गए तो आगे के जीवन के लिए कुछ तो बचत करनी होगी वरना बाल-बच्चे यही कहेंगे कि पापा….आपको राजनीति करना नहीं आती है।

                                            चोखेलाल
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