Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                            रायपुर, 14 जून 17

जो छत्तीसगढ़ की बात करेगा, वो छत्तीसगढ़ में राज करेगा…..यह नारा अभी सार्वजनिक रूप से तो सुनाई नहीं दे रहा है लेकिन विधानसभा चुनाव के करीब आते-आते इसकी गूंज प्रदेश के हर गली-मोहल्ले में सुनाई दे, इसकी व्यवस्था की जा रही है। छत्तीसगढ़ सरकार की खुफिया एजेंसियों को इसकी भनक है या नहीं लेकिन एक संगठन डोमेसाइल के मुद्दे पर जन समर्थन जुटाने की तैयारियां कर रहा है। आउटसोर्सिंग (बाहरीवाद) का विरोध करके हाल ही में सुर्खियों में आए इस संगठन के निशाने पर राजनेताओं के साथ नौकरशाह भी हैं। संगठन इन सभी की कुण्डली तैयार कर रहा है ताकि विधानसभा चुनाव में इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया जा सके।
यह बात तो सच है कि छत्तीसगढ़ का निर्माण भी केवल इसलिए किया गया था कि यहां की सत्ता स्थानीय लोगों के हाथों में रहे ताकि राज्य का बहुमुखी विकास हो सके। राज्य निर्माण तो हो गया लेकिन सत्ता बाहरी लोगों के हाथों में चली गई। पिछले तेरह साल से प्रदेश में भाजपा की सरकार है लेकिन सभी जानते हैं कि जिनके आसपास सत्ता घूमती है, वे छत्तीसगढ़ के नहीं है। किसी की नाल राजस्थान में गड़ी है तो कोई निमाड़-नीमच के प्रति वफादार है। कोई बिहार और कोई हरियाणा के प्रति अपने प्रेम को प्रदर्शित करता है। इसी तरह जो नौकरशाह प्रदेश के ढाई करोड़ लोगों का भविष्य तय करते हैं उनमें से कोई केरल के प्रति समर्पित है और किसी को ओडिशा की चिंता लगी रहती है। इसी तरह मध्यप्रदेश के प्रति वफादार अफसर तो प्रदेशवासियों की दुर्दशा करने में तुले हुए हैं। नौकरशाहों की पत्नियां अचानक क्लासिकल कलाकार बन जाती हैं और छत्तीसगढ़ के आम कलाकार का हक मारती हैं। छत्तीसगढ़ के बुनियादी कलाकारों को कला का प्रदर्शन करने पर जहां कुछ हजार रुपए मिलेंगे, वहीं इन नौकरशाहों की पत्नियों को कुछ देर तक कमर मटकाने के एवज में लाखों रुपए का भुगतान किया जाता है, जो छत्तीसगढिय़ा कलाकारों का अपमान ही है। कहने का मतलब है कि जिन अफसरों को महानदी और इंद्रावती नदी के बीच का अंतर पता नहीं है, जिन्हें यहां की बोली-भाषा, रहन-सहन और खानपान नहीं पता है, वे तय करते हैं कि छत्तीसगढ़ के लोग कैसे रहेंगे, क्या खाएंगे और कहां घूमेंगे।             समय-समय पर सोशल मीडिया में एक संदेश चलता है, जिसमें लिखा होता है कि अगर भारत में देशभक्त होते तो पाकिस्तान नहीं बना होता। यह बहस का विषय हो सकता है परंतु छत्तीसगढ़ के परिप्रेक्ष्य में यह कहा जा सकता है कि बाहरी लोगों को शासक बनाने में छत्तीसगढ़ के लोग सबसे अधिक जिम्मेदार हैं। बेशक अतिथियों का सत्कार करने की यहां की परम्परा रही है लेकिन मेहमान को सिर पर बिठाने की परम्परा तो निश्चित रूप से नहीं रही है और होनी भी नहीं चाहिए। हो सकता है कि योग्यता के पैमाने पर छत्तीसगढिय़ा थोड़े कमजोर हों, लेकिन वे इतने भी कमजोर नहीं हैं कि कोई बाहरी आकर उन पर अपना राज चला सके। ठीक है सम्भलने के लिए समय लगता है और अब तो छत्तीसगढ़ सत्रह साल का युवा हो चुका है। अपने पैरों पर खड़ा होने को तैयार है। अब किसी बाहरी को बर्दाश्त करना इस माटी का अपमान होगा। बाहरी चाहे राजनीति में हो, नौकरशाही में, मीडिया में हो या व्यवसाय में, अब भइगे…छत्तीसगढिय़ों में इतनी काबलियत आ चुकी है कि वे अपने राज्य का कुशलता पूर्वक संचालन कर सकते हैं।
आउटसोर्सिंग का विरोध करके इसकी शुरुआत कर दी गई है। विधानसभा के अगले चुनाव छत्तीसगढिय़ा और गैर छत्तीसगढिय़ा एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। जिसको छत्तीसगढ़ की बोली-माटी से प्यार है, वही चुना जाएगा। राजनीति, नौकरशाही और मीडिया में बाहरीवाद को खत्म करने का ताना-बाना बुना जा रहा है। अब उस व्यक्ति को विधानसभा से बाहर रखा जाएगा जो छत्तीसगढ़ी नहीं बोल पाएगा। जो अपनी बोली-भाषा में बात नहीं करेगा, छत्तीसगढ़ के दर्द को महसूस नहीं करेगा, उसे वोट नहीं देने की अपील करने के लिए एक संगठन खड़ा हो रहा है। इस संगठन का मानना है कि सत्ता अगर छत्तीसगढिय़ों के हाथ में रही तो यहां के किसानों को उपज का पूरा मूल्य मिलेगा, यहां के नदी, नाले और तालाब उद्योगपतियों को बेचे नहीं जाएंगे। यहां के गांवों का चहुंमुखी विकास होगा। खास बात यह होगी कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय होगी। उन्हें अपने गांव, समाज और परिवार में जवाब देना होगा कि सत्ता में रहते हुए उन्होंने अपनी माटी के लिए क्या किया है। देश के कई राज्यों में स्थानीयता का भाव कूट-कूटकर भरा पड़ा है, जिसका अभी छत्तीसगढ़ में अभाव है। शायद इसीलिए राजनेता और नौकरशाह इसे चारागाह समझते हैं और जब भी किसी नौकरशाह के ठिकानों पर छापा पड़ता है तो उनकी आलमरियां करोड़ों उगलती हैं। सच्चाई तो यह है कि यह राशि प्रदेश के गरीब-किसानों के हिस्से की होती है, जिसे छल और प्रपंच के माध्यम से नौकरशाह अपनी तिजोरी तक पहुंचाते हैं और इसी राशि से कोई राजस्थान में तो कोई निमाड़-नीमच में कोठियां बनवाता है। कोई अफसर भोपाल में तो कोई कटक में करोड़ों रुपए का होटल खरीदता है। छत्तीसगढिय़ों के हाथों में सत्ता आने पर कम से कम यह राशि तो छत्तीसगढ़ में ही खर्च होगी।
                                            चोखेलाल
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