Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                                रायपुर, 25 जून 17

 कुछ साल पहले तक आयकर विभाग ऐसे लोगों को बुलाकर सम्मानित करता था, जिन्होंने ईमानदारी के साथ आयकर जमा किया है। विभाग की यह पहल निश्चित रूप से प्रेरणादायक थी लेकिन पिछले कई सालों से यह परम्परा बंद कर दी गई है। इसे बंद करने का कारण तो विभाग के अफसर ही बता सकते हैं परंतु हाल ही में न्यूजीलैण्ड के एक अखबार ने एक नई पहल शुरू की है, जिसका अनुशरण किया जा सकता है। इस अखबार ने अपने पहले पन्ने पर उन लोगों के नाम प्रमुखता के साथ प्रकाशित किए हैं जो शराब पीकर वाहन चलाते हैं। ऐसा करते समय या वे खुद दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं अथवा किसी अन्य की जान ले लेते हैं। अखबार का मानना है कि ऐसा करने वाले अपना नाम अखबारों में देखकर शर्मिंदा होंगे और परिवार व समाज में उन्हें बेइज्जत होना पड़ेगा।
अखबार की इस पहल की न्यूजीलैण्ड में बहुत सराहना हुई है। जहां तक भारत और छत्तीसगढ़ का सवाल है तो आंकड़े बताते हैं कि यहां सड़क दुर्घटनाओं में सर्वाधिक मौतें होती हैं और अधिकतर दुर्घटनाएं शराब या किसी दूसरे नशे में लिप्त होने के कारण होती हैं। हालांकि भारत सरकार व छत्तीसगढ़ सरकार अपने स्तर पर नशे के खिलाफ अभियान चला रही है परंतु यह प्रभावी नहीं है। जनमानस पर इसका कोई असर नहीं हो रहा है। दुर्घटनाओं पर विराम नहीं लग रहा है। अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी नेशनल हाइवे के पांच मीटर तक शराब दुकानें प्रतिबंधित कर दी हैं लेकिन राजस्व के लोभ में कई राज्य सरकारों ने इसकी तोड़ खोज ली हैं। उन्होंने नेशनल हाइवे को स्टेट हाइवे या जिला हाइवे में तब्दील कर दिया है। यानी वे इन स्थानों से शराब दुकानों को हटाने के पक्ष में नहीं हैं।
खासकर भारत में सड़कों पर होने वाली मौतों को रोकना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। तरह-तरह के प्रयोग किए जा रहे हैं परंतु अपेक्षित कामयाबी मिलती नहीं दिख रही है। स्कूलों में यातायात नियमों की जानकारी या तो नहीं दी जा रही है या फिर सिर्फ इसकी औपचारिकताएं पूरी की जा रही है। शहरों के प्रमुख चौराहों पर यातायात विभाग की तरफ से लगाए जाने वाले संकेतक अब इतिहास हो गए हैं। लाइसेंस बनवाने के पहले गाड़ी चलाने का टेस्ट अब शायद ही कहीं होता है। नियमों में तो इसका प्रावधान है लेकिन देशभर के परिवहन विभाग जिस तरह से दलालों के चंगुल में फंसे हुए हैं, उसके कारण शायद ही किसी की जांच करने के बाद लाइसेंस दिया जाता हो। कुछ अधिक पैसे देकर घर बैठे लाइसेंस प्राप्त करने की अघोषित योजना देशभर के परिवहन विभागों में चल रही है। यही वजह है कि परिवहन विभाग में प्रतिनियुक्ति पर जाने के लिए विभिन्न विभागों के अधिकारी लालायित रहते हैं और इसके लिए अपनी-अपनी सरकारों को प्री-पेड भुगतान करने से भी नहीं चूकते।
सड़कों पर होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सरकारों ने बहुत लुभावने कायदे बना रखे हैं लेकिन जब जमीन पर उसे लागू करने की बारी आती है तो सरकारी नुमाइंदों को हरी-हरी नोट दिखने लगती है अन्यथा ऐसी क्या वजह है कि अनेक बार प्रयास करने के बावजूद छत्तीसगढ़ पुलिस या परिवहन विभाग वाहन चालकों को हेलमेट नहीं पहना पाया। हेलमेट के नाम पर जिस तरह की वसूली की गई, सरकार उसे रोक नहीं पाई और आखिरकार उसे बैकफुट पर जाना पड़ा। हेलमेट निर्माताओं से बड़ी रकम वसूलने का आरोप सरकार पर भी लगा। इसमें कितनी सच्चाई है, यह बता पाना मुश्किल है लेकिन सच यह है कि हेलमेट लगाए बिना वाहन चालक पूरे प्रदेश में घूम रहे हैं।
नशे में वाहन चलाना रोकना सरकार की प्राथमिकता में होना चाहिए और इसके लिए न्यूजीलैण्ड की तर्ज पर प्रभावी अभियान चलाने की जरूरत है। जब तक नशे में वाहन चलाने वालों का सार्वजनिक रूप से अपमान नहीं होगा, इसे नहीं रोका जाएगा। पुलिस ऐसा कर सकती है और असमाजिक तत्वों के साथ वह ऐसा करती भी है। कई बार गुण्डे-बदमाशों का जुलूस निकाला जाता है ताकि उस इलाके में उनकी दहशत कम हो और उन्हें अपने किए पर शर्मिंदगी भी हो। नशे में वाहन चलाना एक बेहद गंभीर अपराध है और ऐसा करने वालों का सार्वजनिक अपमान किया जाना जरूरी है। इसके लिए प्रचार साधनों का भरपूर उपयोग किया जा सकता है और अखबार इसमें प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। आजकल तो सोशल साइट्स का जमाना है। पुलिस और परिवहन विभाग सोशल साइट्स का पूरा उपयोग करके इस पर काफी हद तक अंकुश लगा सकती है पर ऐसा करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत होगी। सरकारों को आगे आना होगा तभी सड़कों पर होने वाली असमय मौतों को रोका जा सकेगा, वरना रोज सैकड़ों घरों के चिराग बुझते रहेंगे और उनके परिजन सरकारों को कोसते हुए मातम मनाते रहेंगे।

चोखेलाल
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