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मुखिया के मुखारी

इंडिया राइटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति                 २ मार्च 17

 

    विधानसभा चुनाव से डेढ़ साल पहले अफसरों ने जिस तरह से आंखें तरेरना शुरू किया है, उसके संकेत मुख्यमंत्री और प्रदेश की भाजपा सरकार को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। प्रदेश में उस राजनीतिक दल की सरकार है, जिसे हिंदूवादी माना जाता है और यह समझा जाता है कि जिस प्रदेश में भाजपा की सरकार है वहां साधू-संतों का आदर-सत्कार होगा परंतु छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के होते हुए साधू-संत सार्वजनिक रूप से अपमानित हो रहे हैं। दुर्भाग्यजनक पहलू यह है कि अपमान करने वालों में प्रदेश की वह नौकरशाही शामिल है, जिसे मुख्यमंत्री की नाक का बाल कहा जाता है।
    ज्ञान बांटना बहुत आसान है परंतु जब पीड़ा होती है, तब सारा ज्ञान धरा का धरा रह जाता है। पिछले दिनों जब एक आईएएस अधिकारी ने श्यामाप्रसाद मुखर्जी की राजनीतिक उपलब्धियों पर सवाल खड़ा किया, तो पूरी सरकार उन पर पिल पड़ी। आईएएस अधिकारी एसोसिएशन के अध्यक्ष होने के नाते एन. बैजेंद्र कुमार ने भी उन्हें लताड़ा और अपर मुख्य सचिव की हैसियत से उन्होंने तमाम अफसरों के लिए एक गाइड लाइन जारी की, जिसमें कहा गया कि प्रदेश के अफसर सोशल मीडिया का उपयोग केवल सरकार की उपलब्धियों को बताने के लिए करेंगे। इसके लिए एन. बैजेंद्र कुमार ने सिविल सेवा आचरण अधिनियम का वास्ता दिया और कार्रवाई की चेतावनी भी दी।
    एन. बैजेंद्र कुमार ने ज्ञान तो बांट दिया, लेकिन उसकी अनुपालना करना खुद भूल गए। मुख्यमंत्री के न्योते पर आए आर्ट ऑफ लिविंग के अध्यात्म गुरु श्री श्री रविशंकर को उन्होंने अपने निशाने पर ले लिया। ऐसा करते समय मुख्यमंत्री के अपर मुख्य सचिव एन. बैजेंद्र कुमार यह भूल गए कि श्री श्री रविशंकर राज्य अतिथि हैं और अपर मुख्य सचिव की हैसियत से उनका सम्मान करना चाहिए। हालांकि बैजेंद्र कुमार से पहले कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल ने श्री श्री रविशंकर की आलोचना कर दी थी परंतु अगले ही दिन एन. बैजेंद्र कुमार की श्री श्री रविशंकर पर की गई ट्वीट को एक राजनीतिक संकेत माना जा सकता है।
    मुख्यमंत्री के आसपास रहने वाले अफसरों का चेहरा समय-समय पर बदलता रहता है। कहा जाता है कि मुख्यमंत्री सचिवालय की यह आदत है कि चूसने के बाद अफसरों को गन्ने की तरह फेंक दिया जाता है। अतीत के पन्नों को पलटने पर पता चलता है कि मुख्यमंत्री के आसपास कभी राधेश्याम सिंह और ओपी गुप्ता जैसे लोगों का बोलबाला था। उस समय विक्रम सिंह सिसोदिया की कही हुई बात मुख्यमंत्री के लिए अंतिम सत्य होती थी। समय बदला और फिर शिवराज सिंह त्यागी का दौर आया परंतु वह अधिक दिनों नहीं चल पाए और कुछ दिनों बाद ही मुख्यमंत्री एन. बैजेंद्र कुमार, अमन सिंह और मुकेश गुप्ता जैसे अफसरों के घिर गए। इन अफसरों का लम्बा दौर चला। पहले के सभी अफसर कहां खो गए, किसी तो पता नहीं चला। लेकिन अब यह तिकड़ी भी टूट गई। पहले मुकेश गुप्ता और अब एन. बैजेंद्र कुमार मुख्यमंत्री से दूर चले गए हैं। अमन सिंह के एक करीबी क्रेडा अफसर शैलेंद्र कुमार शुक्ला पर कार्रवाई होते ही रिश्तों में खटास आ गई है। हालांकि अमन सिंह ने दूरी नहीं बनाई है परंतु कहा जाता है कि मुख्यमंत्री से उनके रिश्ते अब पहले जैसे नहीं रहे।
    मुख्यमंत्री से बैजेंद्र कुमार की दूरी का परिणाम ही है कि उन्होंने श्री श्री रविशंकर पर ट्वीट कर कहा कि उन्हें गुरुओं से निराशा हो गई है क्योंकि वे रसूखदारों व पैसेवालों के हो गए हैं। इस बात को प्रमाणित करने के लिए उन्होंने तीसरी कसम खाई है। सवाल यह है कि बैजेंद्र कुमार की पहली और दूसरी कसमें क्या हैं। बैजेंद्र कुमार के यह बगावती तेवर उन नौजवान अफसरों को प्रेरित करेंगे, जो सोशल मीडिया में अपनी भड़ास निकालने के लिए लालयित रहते हैं। यह स्थिति सरकार के लिए परेशानी भरी रहेगी क्योंकि जब आला अफसर ही सरकार के कायदे-कानूनों को नजर अंदाज कर रहे हैं तो जूनियर्स तो अराजक हो ही जाएंगे। बैजेंद्र कुमार के बहाने राज्य सरकार को पूरी नौकरशाही के कामकाज की समीक्षा करने की जरूरत है पर यक्ष प्रश्न तो यह है कि मुख्यमंत्री किन अफसरों पर भरोसा करें क्योंकि अधिकतर तो उनके विरोध में खड़े हो चुके हैं।
                             चोखेलाल 
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