Jagdalpur

समानांतर सरकार चलाने का नक्सलियों का सपना अब टूट गया है

रायपुर। बस्तर में नक्सली भले ही 23 मई से 29 मई तक नक्सलबाड़ी की गोल्डन जुबली मना रहे हो, पर हकीकत यही है कि पिछले 2 दशक में नक्सलियों का गढ़ कमजोर हुआ है और उनकी शीर्ष कमेटी का कोरम भी पूरा नहीं हो पा रहा है. एक समय था जब नक्सलियों की दहशत से पूरा बस्तर थर्राता था, लेकिन पुलिस और सेना की संयुक्त कार्रवाई ने नक्सलियों के नापाक मंसूबो को कुचल कर रख दिया है.

छत्तीसगढ़ में दंडकारण्य के दुर्गम जंगलों में गणपति ने सितंबर 2004 में वह काम किया जो आजादी के बाद भारत में किसी भी छापामार लड़ाके समूह ने नहीं किया था. उसने पीडब्ल्यूजी और बिहार के माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) का विलय कर दिया और सीपीआइ (माओवादी) नाम की पार्टी गठित की. 2005 आते-आते यह पार्टी  ‘आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा’ बन गई।

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के मुरकिनार में 2007 में माओवादी एक सरकारी बस पर सवार होकर आए और एक पुलिस पोस्ट को उड़ा दिया. हमले में हल्की मशीनगनों का भी इस्तेमाल किया गया था.  इस हमले में 11 पुलिसवाले मारे गए थे. यह काम था अत्याधुनिक कोर ग्रुप का। तब से कई बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया गया। देश के नक्सली घटना के इतिहास में कांग्रेस नेताओं पर हमला और उनके नेताओं की मौत आज भी स्याह पन्ने की तरह दर्ज है। इस कोर ग्रुप के  नियंत्रण में 10,000 आदिवासी छापामार लड़ाकों की एक फौज 2050 तक भारत सरकार को उखाड़ फेंकने का सपना पाले बैठी थी लेकिन इनका यह सपना टूटता नजर आ रहा है।

गणपति भारत के नौ राज्यों के 83 जिलों में फैले इस लाल साम्राज्य का मुखिया है. एकीकरण की प्रक्रिया के बाद माओवादियों का पूर्वी राज्यों से संबंध मजबूत हुआ है, इस साम्राज्य को गणपति अपने सहयोगियों की मदद से ही चलाता है. वेणुगोपाल के हाथ में दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी है, मल्लाराजी रेड्डी संवेदनशील छत्तीसगढ़-ओडिसा स्टेट बॉर्डर कमेटी का काम देखता है, गोपालरावपल्ली के कादरी सत्यनारायण रेड्डी डीके जोनल कमेटी का सेक्रेटरी है और पुल्लुरी प्रसाद राव उत्तरी तेलंगाना जोनल कमेटी का मुखिया है.

पुलिस को उम्मीद है कि यह नेतृत्व या तो आत्मसमर्पण कर देगा या परिजनों और दोस्तों के विश्वासघात का शिकार हो जाएगा. इनमें सबके ऊपर  छत्तीसगढ़ सरकार ने एक करोड़  रु. का इनाम  घोषित किया है. अब तक सेंट्रल कमेटी के सिर्फ एक नेता लंका पापी रेड्डी ने ही पांच साल पहले आत्मसमर्पण किया है.  अफसर माओवादी नेतृत्व को  मरणासन्न मानते हैं. अधिकारी बताते हैं, “माओवादियों को नए रंगरूट पाने में काफी दिक्कत आ रही है.

दूसरी कतार के नेताओं में गणपति और उनके सहयोगियों जैसी प्रतिबद्धता भी नहीं है.” वे नक्सली समस्या के अवसान की ओर इशारा कर रहे हैं. छत्तीसगढ़ में स्थिति सुधरी है। पिछले कुछ महीनो में इनके हौसले पस्त हुए हैं। लगातार मिलती असफलताओं ने इनकी कमर तोड़ दी है। पिछले 6 महीने में 200 से अधिक नक्सलियों ने आत्म समर्पण किया है। यह अलग बात है कि इनमे बड़े नक्सली नेता शामिल नहीं। कुछ बड़े नक्सली नेताओं ने आंध्र में आत्म समर्पण किया । शायद यही वजह है कि छत्तीसगढ़ की सरेंडर पॉलिसी बदलनी पड़ी। ऐसा नहीं है कि माओवादी हिंसा  पूरी तरह रु क गई है मगर अब माओवादी बचाव की मुद्रा में ज्यादा दिख रहे हैं.

नक्सलियों की सर्वोच्च संस्था पोलित ब्यूरो के 2007 में 16 सदस्य थे जिनमें से दो मारे गए, सात गिरफ्तार हुए या जेल में हैं. इसी तरह 25 सदस्यीय सेंट्रल कमेटी के आठ सदस्य जेल में हैं, एक की मृत्यु हो गई, एक ने आत्मसमर्पण कर दिया और दो मुठभेड़ में मारे गए. कोरम पूरा न होने से पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था सैंट्रल कमेटी की बैठक नहीं हो पा रही है क्योंकि मीटिंग के लिए जाने के चक्कर में नेता पकड़े जा सकते हैं. मीटिंग न होने से पोलित ब्यूरो व सैंट्रल कमेटी के स्थान नहीं भरे जा सके जाहिर है सपने अधूरे रह गए।

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