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10 साल से एक शव को अंतिम संस्कार के लिए अपने वारिस का इंतजार

इंदौर. मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित एमजीएम मेडिकल कॉलेज में 10 साल से एक शव को अंतिम संस्कार के लिए अपने वारिस का इंतजार है. मेडिकल कॉलेज के एनाटोमी विभाग में 25 नंबर 2007 को दान में यह शव मिला था. उसके बाद से संपत्ति की लालच में क़ानूनी दाव-पेंच में इस शव को ऐसा उलझाया कि पूरे दस साल हो गए आज तक कोई हल नहीं निकला.

फेमिना के एडिटर विमल वैध की 25 नवंबर 2007 को मौत हुई थी. उस समय एनॉटोमी विभाग की अध्यक्ष डॉ सुधा श्रीवास्तव थीं और उन्होंने इस शव को विमल के भांजे अजय खरे से दान में लिया था. जब वारिस को प्रमाण प्रत्र देने की बारी आई तभी विमल के भतीजे अनिल वैध कॉलेज पहुंचे और पूरी घटना की हकीकत बताई. तब से यह मामला कानूनी दांव- पेंच में फंसा है.

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, अगर कोई परिजन का शव सरकारी मेडिकल कॉलेज को दान करता है तो उसे जो प्रमाण पत्र कॉलेज से दिया जाता है, वह उसका वारिस होने का सबूत होता है. इस प्रमाण पत्र को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती नहीं दी जा सकती है.विमल वैध ने 1975 में अपने भतीजे अनिल वैध को गोद लिया था. विमल की करोड़ों की संपत्ति थी जिसमें मुंबई का फ्लैट शामिल है.

अजय खरे विमल को बहलाकर इंदौर ले आया. इंदौर आने के कुछ दिन बाद विमल की मौत हो गई. अजय ने विमल के शव को मेडिकल कॉलेज को दान कर दिया. शव की दावेदारी के लिए भतीजे और भांजे दोनों ने केस लगा है. यह मामला कोर्ट में चल रहा है. इस लड़ाई में यह साफ नहीं हो पाया है कि इस शव को किसे दिया जाए.

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