Chhattisgarh India Raipur

गर्भधारण के पर्व पर हो गई गोद सूनी…

रायपुर। छत्तीसगढ़ की पहचान बनाने वाले पर्व पोला पर चार माताओं की गोदें सूनी हो गईं। प्रदेश की भाजपा सरकार की कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था का दुष्परिणाम यह निकला कि प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल (डॉ. भीमराव अम्बेडकर अस्पताल) में ऑक्सीजन नहीं मिलने की वजह से चार नौनिहालों ने दम तोड़ दिया। दुर्भाग्यजनक स्थिति तब बनी जब पोस्टमार्टम कराए बिना प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव सुब्रत साहू ने यह ऐलान कर दिया कि नौनिहालों की मौत कम ऑक्सीजन मिलने के कारण नहीं हुई है। उनके इस बयान के बाद राज्य सरकार कठघरे में खड़ी हो गई है।
                                                                     मान्यता है कि पोला के दिन से छत्तीसगढ़ में नई फसल में दूध भरना शुरू हो जाता है। यानी कि फसलों पर दानें आने शुरू हो जाते हैं। ऐसी पौराणिक मान्यताओं वाले दिन में सरकारी लापरवाही के कारण चार नौनिहालों का असमय काल के गाल में समा जाना बेहद दुखद ही माना जाएगा।
बयानों में विरोधाभास
इस दुखद घटना के बाद राजनीतिक सरगर्मी भले बढ़ी हो परंतु यह बात साबित हो गई कि सरकारी अफसरों में आपस में कोई समन्वय नहीं है। अम्बेडकर अस्पताल प्रशासन और संचालक चिकित्सा शिक्षा प्रसन्ना ने घटना के तुरंत बाद यह माना कि ऑक्सीजन की कमी के कारण ही बच्चों की मौत हुई है लेकिन इसके कुछ घण्टे बाद ही स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव सुब्रत साहू सामने आए और उन्होंने बकायदा प्रेस कांफ्रेंस लेकर कहा कि कम ऑक्सीजन के कारण बच्चों की मौतें नहीं हुई हैं। इसकी वजह कुछ और है। इस दौरान उन्होंने लो ब्रीथिंग और रेसिपीरेटरी सिस्टम फेल होने जाने से मेडिकल के शब्दों का इस्तेमाल किया। जिसका सामान्य बोलचाल की भाषा में यही मतलब होता है कि ऑक्सीजन नहीं मिलने के कारण ही बच्चों की जान गई।
सीएम चले गए दिल्ली
पोला जैसे महान पर्व पर सरकारी व्यवस्था की लापरवाही से चार बच्चे काल के गाल में समा गए परंतु मुख्यमंत्री घटना की जांच के आदेश देकर दिल्ली चले गए। अब पूरी व्यवस्था नौकरशाहों के हाथों में आ गई है और वे इस मामले में पूरी तरह लीपापोती करने में जुट गए हैं।
मि. इंडिया बने स्वास्थ्य मंत्री
चार नौनिहालों की असमय मौत के बाद पूरे प्रदेश में हाहाकार मच गया और प्रदेश का सबसे बड़ा अस्पताल संदेहों के घेरे में खड़ा हो गया परंतु हर छोटी-बड़ी बातों पर प्रतिक्रिया देने वाले स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर अब तक सामने नहीं आए हैं। उनके मोबाइल नम्बर लगातार बंद मिल रहे हैं और घटना के बीस घण्टे बाद भी वे अस्पताल नहीं पहुंचे हैं। कहने का मतलब यह है कि सरकार ने मृतक बच्चों के परिजनों तथा वहां उपचार करा रहे सैकड़ों मरीजों को उनके भाग्य पर छोड़ दिया है।
जिम्मदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं
बीते एक सप्ताह से प्रदेश में होने वाली घटनाओं को लेकर राज्य की भाजपा सरकार बेहद असहज स्थिति में आ गई है। पहले बेरला में एक नाबालिग के साथ सामूहिक अनाचार की घटना होती है और उसके दौ दिन बाद भाजपा के एक स्थानीय नेता के जामुल स्थित गौशाला में दो सौ से अधिक गायों के मरने की खबर आती है। सरकार इन घटनाओं से उबर भी नहीं पाती है कि अम्बेडकर अस्पताल में ऑक्सीजन नहीं मिलने के कारण चार बच्चों की मौत हो जाती है।
ये घटनाएं साबित करती हैं कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के हाथों से सरकार अनियंत्रित हो चुकी है। उनका प्रशासन पर खौफ व नियंत्रण नहीं रह गया है। प्रदेश को हिलाकर रख देने वाली इन तीनों घटनाओं में राज्य सरकार ने अब तक किसी की जवाबदेही तय नहीं की है। सामूहिक अनाचार के मामले में अब तक मुख्य आरोपी को गिरफ्तार नहीं करने वाले पुलिस अफसर अब तक वहीं है। दो सौ गायों के कातिल पशुपालन विभाग के मंत्री, अफसर तथा गौसेवा आयोग के पदाधिकारी अब तक पदों पर बने हुए हैं और चार बच्चों की असमय मौत के जिम्मेदार अस्पताल अधीक्षक, संचालक स्वास्थ्य सेवाएं, प्रमुख सचिव स्वास्थ्य और स्वास्थ्य मंत्री पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
आक्रामक हुआ विपक्ष
इन तीनों घटनाओं को लेकर विपक्ष ने अपने तेवर तीखे कर लिए हैं। घटना के बाद अस्पताल पहुंचे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने इसकी जांच के लिए कांग्रेस के चिकित्सा प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राकेश गुप्ता की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाने की घोषणा करते हुए इस घटना के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार माना। उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री से इस्तीफे अथवा उन्हें बर्खास्त करने की मांग की। छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस ने भी इस घटना के विरोध में अस्पताल के सामने प्रदर्शन किया तथा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

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