मुखिया के मुखारी

    दान का रुतबा, और ये सियासी गुरूर

    मंदिरों को मिले दान के सोने पर एक नेताजी की नजर अटक गई। कहने लगे, ‘देश के धार्मिक न्यासों में एक ट्रिलियन डॉलर का सोना पड़ा हुआ है। भारत सरकार को कोरोना संकट से निपटने के लिए इसका इस्तेमाल करना चाहिए।’ सियासी गलियारे में उनके इस बयान से बवाल मचना स्वाभाविक था, क्योंकि नेताजी खुद महाराष्ट्र के मुखिया रह चुके हैं। ऐसे में विपक्षी पार्टी भी बात को कहां गिरने देने वाली थी। आला नेताओं पर फौरन निशाना साधा और मुगल आक्रमणकारियों से लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी तक से पार्टी की तुलना कर डाली।


    कुछ दिन पहले ऐसे ही एक नेताजी ने दान की वस्तुओं को लेकर फरमान जारी किया था। हालांकि फरमान को अपील की चादर ओढ़ाई गई थी और उस पर सोशल डिस्टेंसिंग की मुहर भी। वे बोले थे कि दान की सभी वस्तुएं उनके पास इकट्ठी की जाएं ताकि वे लोगों में बांट सके। पब्लिक को माजरा समझते देर नहीं लगी। एक केला दान कर चार फोटो खिंचवाना, अखबार में चार कालम की खबर छपवाना और फिर सोशल मीडिया पर वाहवाही लूटना। वही, उंगली कटा कर शहीदों में नाम लिखाने वाला पैंतरा। हालांकि यहां उनकी मंशा पूरी नहीं हुई।
    इधर माननीयों ने वेतन दान कर इतिश्री कर ली। ऐसा लग रहा है जैसे गंगा नहा लिए हों। सोचो जरा! माननीयों का वेतन किसकी बदौलत है, दान की ही न! मतदाताओं ने मतों का दान किया तो रुतबेदार ओहदे पर बैठे। सत्ता की चाबी मिली। चमचमाता सिंहासन मिला। यानी जनता के दान के सहारे ही उनकी जीत हुई और वे अपने विरोधी को मात दे सके। सीधी सी बात ये है कि यह दान उन्हें न मिलता तो कुर्सी किसी और की होती। और वैसे भी सैद्धांतिक रूप से हमारे माननीय कमाई की दृष्टि से तो राजनीति में नहीं ही होंगे! अगर ऐसा है तो समाज सेवा का भाव उनकी दानशीलता में दिखाई देना ही चाहिए।
    चंदे से पार्टी चलाना। चुनाव के लिए चंदा लेना। जीतने के बाद उसी चंदे से जश्न मनाना। सबकुछ दान का ही तो है। कैसा हो अगर चुनाव के दौरान घोषित संपत्ति का अंश दान अपने दाताओं को करें। जुगाड़ की राशि या राशन को बांटकर फोटो छपवाने की बजाय संचित संपत्ति का उपयोग अपनी शक्ति को व्यवस्थित करने में किया जाए। क्योंकि मतदाता ही तो माननीयों की शक्ति हैं। पं. विजयशंकर मेहता के अनुसार शास्त्रों में कहा गया है कि जब संसार बनाना था तो उसी समय परमशक्ति ने चर्चा की कि बनाना, चलाना और मिटाना, क्योंकि फिर एक नया संसार बनाना है। इसी तरह अगली बार भी तो सरकार बनाना है। इसके लिए जीतना जरूरी है। और जीतने के लिए मतों का दान मिलना आवश्यक है। यही मौका है, सही समय पर फंड का उचित इस्तेमाल कर जीत का नया फंडा तैयार करने का।
    एक वक्त वो भी था जब भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देश की जनता से अपील कर कहा था कि देश के जंग के हालात हैं, आप एक ही वक्त का भोजन करें। उनका व्यक्तित्व इस बात का स्वयं प्रमाण है कि ऐसा बोलने से पहले उन्होंने खुद भोजन त्याग दिया होगा। हमारे माननीय दूसरों से दान की अपील कर रहे हैं, तो क्या उन्हें खुद भी दान का पुण्य कमाने की पहल नहीं करनी चाहिए।  
    अगर आप समाज में आगे चलना चाहते हैं तो आपात स्थिति में बाहर क्यों नहीं निकलते? पालघर की घटना के बाद किसी सफेदपोश ने कहा कि पुलिस वाले करते भी क्या, उनके हाथ में डंडा था, हथियार नहीं! बात बिल्कुल सही है, लेकिन उनके हाथ में डंडा किसने थमाया!? इस घटना के बाद आप सामने क्यों नहीं आए? पुलिस वालों पर पत्थरबाजी हुई तो भी हाथ बांधे खड़े रहे!? जब आतंकवादी के लिए न्यायपालिका को कटघरे में खड़ा किया गया तब भी आपकी खामोशी सवालों से घिरी रही!? पार्टी के कानूनविदों ने भी जुबान नहीं खोली। आप समाज को दिशा तो देना चाहते हैं, लेकिन संस्था पर होने वाले प्रहार को नहीं झेलना चाहते। सरकार क्यों ऐसा कानून नहीं बनाती कि राजनीतिक पार्टियों के प्रदर्शन दौरान पुलिस पर हुए हमले को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा जाए। 
    अभी भी वक्त है। संकट में अपने दानदाताओं के साथ खड़े रहिए। कोरोना काल से निपटने के लिए सरकार ने 20 लाख का पिटारा खोल दिया है, लेकिन तीन दिनों से जारी धारावाहिक में तात्कालिक राहत की उम्मीद दिखाई नहीं दे रही। इधर आप भी हाथ बांधे बैठे रहेंगे तो काम कैसे चलेगा? कोरोना संक्रमण के इस संकटकाल में माननीयों से ही तो उम्मीद की जाएगी। ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग का बहाना नहीं चलेगा। आपके दानदाताओं की आस आप ही पर टिकी हुई है। आप समाज का नेतृत्व कर रहे हैं तो समाज के लिए कुछ करना भी आपकी जिम्मेदारी है। आपका ही अनुसरण लोग करते हैं। इसलिए सियासत का गुरूर छोड़िए, क्योंकि ये दान का रुतबा मत का दान करने वालों का ही दिया हुआ है। दान से आपकी देह पर चढ़े सत्ता के आरारोट की अकड़ उतर जाए तो ये बताइएगा जरूर कि इन मजदूरों के पलायन के पीछे किनका योगदान है और प्रवासी नेताओं को सत्ता सुख भोगवाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति के पीछे कौन है?

    -चोखेलाल

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    मुखिया के मुखारी में व्यवस्था पर चोट करती चोखेलाल की आक्रामक टिप्पणियों के लिए पढ़ते रहिये।
    कलम का कौशल, महाकोशल और chhattisgarh. co

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