मुखिया के मुखारी : ‘बाड़ी’ को बनाएं रखें ‘बारी’, वरना आएगी आपकी बारी


    कोरोना संक्रमण से निपटने वाले टॉप-10 राज्यों में शामिल छत्तीसगढ़ के मवेशी भी इसमें सहयोग कर रहे हैं। उन्होंने सड़कों पर डेरा डालकर गौठानों को क्वारेंटाइन कर दिया है। मतलब कोरोना काल में इन निरीह बेजुबानों ने सहयोगात्मक आंदोलन छेड़ रखा है। मानो वे कह रहे हों- ‘सरकार! आपकी मंशा तो महल जैसा बनाने की थी, लेकिन आज भी सड़कें ज्यादा अच्छी हैं। लॉकडाउन में ट्रैफिक का दबाव कम हुआ तो सोचा यहीं धुनी रमाई जाए, ताकि सड़कें सूनी न लगें और कारिंदों को गलतियां सुधारने का मौका मिल सके। बारिश आने से पहले गौठान को रोड जैसा बनवा लो, तो हमें भी आराम मिले।’
    नरवा, गरवा, घुरवा और ‘बारी’, जिसे आपके कारिंदों ने ‘बाड़ी’ बना दिया है, जैसी महत्वाकांक्षी योजना की मॉनिटरिंग और क्रियान्वयन में की जा रही लापरवाही जमीन पर दिखाई दे रही है। मवेशी सड़क पर हैं। गांव में सस्ती सब्जी लेकर शहरी बिचौलिए चांदी काट रहे हैं और वाजिब दाम नहीं मिलने पर किसान फसलों पर ट्रैक्टर चला रहा है। अगर योजना का सही क्रियान्वयन होता तो किसानों की फसल सही हाथों तक पहुंचती और उन्हें उचित दाम भी मिलते।
    ऐसा लगता है कि खेती-किसानी के लिए समर्पित विभागों पर सरकार का कोई कंट्रोल ही नहीं है। बीज विकास निगम भी उनमें से ही एक है, जहां लाखों के घोटाले का खुलासा हुआ, जांच के निर्देश दिए गए। जांच भी हुई, लेकिन उसके परिणाम का पता नहीं चला। तकरीबन चार साल पहले अंबिकापुर में धान के रिजेक्टेड बीजों की बिक्री कर 67 लाख का घोटाला सामने आया था। अधिकारी-कर्मचारी निलंबित भी हुए। इसके बावजूद विभागीय अफसरों का रवैया जस का तस है। गुणवत्ताहीन बीजों की खरीदी करना, उसे किसानों को बेचना और नुकसान होने पर जांच का आश्वासन देना। बस, यही चल रहा है।
    क्या केवल बीजों की खरीदी-बिक्री के लिए ही है, बीज विकास निगम? आखिर क्षेत्र के किसानों में प्रमाणित बीजों के उत्पादन की रुचि क्यों नहीं बढ़ रही? या उन्हें रुचि लेने नहीं दिया जा रहा! ताकि बीजों की खरीदी प्रभावित न हो। छत्तीसगढ़ के कई आदिवासी क्षेत्रों में अभी भी ऐसे धान का उत्पादन होता है, जिनका औषधीय महत्व है। जैसे:- काली मूंछ, महाराजी, बायसुर, लायचा, रेसारी, आल्वा, भेजरी, नागकेसर आदि। बताया जाता है कि इस तरह की तकरीबन 350 से भी अधिक प्रजाति के धान गरियाबंद और बस्तर के जंगलों में होते हैं। गरियाबंद के किसान तो कुछ ऐसे धान का भी बखान करते हैं, जिसके उत्पादन में अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन ऐसे धान की खेती के उत्पादन को प्रोत्साहित न किया जाना समझ से परे है। आखिर इसके पीछे क्या स्वार्थ हो सकता है?
    सरकार चावल से शराब बनाना चाह रही है। बिल्कुल बनाना चाहिए। उद्देश्य सही है, अर्थव्यवस्था दुरुस्त करने का। लेकिन समाज पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव का क्या? शायद, शराबबंदी के संकल्प की वजह भी यही थी, जिसे दरकिनार कर सारे फैसले लिए जा रहे हैं। सरकार का सारा ध्यान तो नशे के कारोबार पर ही केंद्रित हो गया है। इसलिए दूसरे विकल्प दिखाई ही नहीं दे रहे। सरकार का ध्यान उन विकल्पों पर भी नहीं है, जिससे नरवा, गरवा, घुरवा, बारी का उद्देश्य हो और किसानों की आर्थिक स्थिति भी सुधरे।
    पहले बात करते हैं इंस्टेंट फूड की। 19वीं सदी में स्विट्जरलैंड में चल रहे इंडस्ट्रियल रेवेल्यूशन के दौरान महिलाएं घर से निकलकर फैक्ट्रियों और ऑफिसों में काम करती थीं। उनके पास घर में रहकर खाना बनाने का समय नहीं बचता था। इस समस्या का निदान स्विज वेलफेयर सोसायटी ने ‘जूलियस मैगी’ के रूप में निकाला। इसके बाद 1882 में मैगी इंस्टेंट फूड के रूप में लांच हुआ। फिर मैगी ब्रांड ने सूप, नूडल्स जैसी तरह-तरह की चीजें बनाईं।
    आज 21वीं सदी में लोगों का आकर्षण जैविक उत्पादों की तरफ है। लोग पौष्टिक आहार लेना चाह रहे हैं। ऐसे फल व सब्जियां खरीदने के इच्छुक हैं, जिसमें रसायन का प्रयोग न हुआ हो। छत्तीसगढ़ सरकार की नरवा, गरवा, घुरवा, बारी का क्रियान्वयन सही तरीके से हो तो इस दिशा में आगे बढ़ना मुश्किल नहीं। कुछ गांवों में स्थानीय स्तर पर ये प्रयोग हो रहे हैं और सफल हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर इसके लिए खास प्रयास नहीं किए जा रहे।
    इंडस्ट्रियल रेवेल्यूशन के दौरान अगर स्विट्जरलैंड में इंस्टेंट फूड ‘जूलियस मैगी’ का आविष्कार हुआ था तो छत्तीसगढ़िया संस्कृति में ‘खोयला’ प्रचलित था/है। बोरे-बासी खाकर जिंदगी गुजारने वाला छत्तीसगढ़िया विषम परिस्थितियों में खोयला, अथान और बड़ी आदि के सहारे पौष्टिक आहार लेता रहा है। जैविक उत्पादों की मांग के बीच खोयले को छत्तीसगढ़िया ब्रांड बनाकर दुनियाभर में बेचने की योजना बनाई जा सकती है। औषधीय चावल और खोयले का उत्पादन छत्तीसगढ़ को नई पहचान दे सकता है। लेकिन नहीं! सलाहकार तो चावल से निर्मित शराब से कमाई का गणित समझाएंगे। क्योंकि उन्हें तो किसानों से कोई लेना-देना ही नहीं है। जरा सोचिए! किसानों को नजरअंदाज कर छत्तीसगढ़ का विकास कैसे संभव है? जैसे सब्जियों की ऑनलाइन बिक्री के लिए किसानों की समिति बनी है या यहां भी बिचौलिए हावी रहेंगे? अगर संचालन बिचौलियों के हाथ में है तो फिर गांव में बारी औचित्य क्या?
    …और गेड़ी चढ़कर सत्ता तक पहुंचने वाले मुखिया ये अच्छे से जानते हैं। वे छत्तीसगढ़िया संस्कृति से वाकिफ हैं। फिर कृषि से संबंधित कोई भी काम होटल से संचालित क्यों हो रहे हैं? होटल टोटल योजना का प्रादुर्भाव इन सरकारी कारिंदों ने किया है। अब ये सोचना होगा कि क्या इससे किसानों का हित सध रहा है। कोरोना काल ने ये तो बता दिया है कि अंधाधुंध दौड़ जरूरी नहीं है। छोटे से वायरस के सामने आपके 100 साल का विकास बौना साबित हुआ। प्रकृति के कहर से बचने के लिए आपको आदिम काल का उपाय ही इस्तेमाल में लाना पड़ा।
    कोरोना संक्रमण काल में प्रदेश ने बेहरत काम किए। इसीलिए केंद्र सरकार ने पीठ भी थपथपाई। हम चाहते हैं कि सरकार नित नए आयाम छुए। योजनाएं कार्य रूप में परिणित हो रही हैं या नहीं, ये देखना प्रशासन का मुख्य काम है। सामान्य आदमी को खुली आंख से जो दिख रहा है, वह आपके कारिंदे क्यों नहीं देख पा रहे?! अगर देख पा रहे हैं तो आपको बता क्यों नहीं रहे?! इसका सीधा मतलब है कि प्रशासनिक कसावट ढीली है। अगर आप कोरोना रोकने में सक्षम हैं तो आपको जर्दायुक्त गुटखे की बिक्री भी रोकनी चाहिए। शराब दुकानंं बंद हैं तो अवैध कारोबार पर भी अंकुश लगाना चाहिए।
    लॉकडाउन के दौरान शराब दुकानें बंद रहीं। किसी तरह की हाय तौबा नहीं मची। अगर इसके पीछे दारू का अवैध कारोबार है तो इस असफलता का जिम्मेदार कौन है? अगर आप कह रहे हैं कि अवैध कारोबार नहीं हुआ। या कम हुआ। स्थिति नियंत्रण में रही। दारू नहीं पी गई, तो यह नई शराब बनाने का नहीं, शराबबंदी का मौका है। लॉकडाउन के दौरान ही यह फैसला लिया जाए। ग्राम सचिव से मुख्य सचिव तक ये बात पहुंचा दी जाए कि नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी ही किसान हित में है। इसमें लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह छत्तीसगढ़ के आर्थिक ढांचे का आधार बनेगी। इसी से छत्तीसगढ़ की नई पहचान बनेगी। आपकी बारी बार-बार आए। अपने कारिंदों को कहें कि वे आपकी बारी और छत्तीसगढ़ियों की ‘बारी’ को ‘बाड़ी’ न बनाएं। वरना अबकी बारी कारिंदों की बारी आने वाली है।

    • चोखेलाल

    आपसे आग्रह
    कृपया चोखेलाल की टिप्पणियों पर नियमित रूप से अपनी राय व सुझाव इस नंबर 7987481990 पर दें, ताकि इसे बेहतर बनाया जा सके।
    दैनिक महाकोशल की प्रस्तुति चोखेलाल की चोखी बात अब रोज वेबसाइट chhattisgarh.co पर भी।
    मुखिया के मुखारी में व्यवस्था पर चोट करती चोखेलाल की आक्रामक टिप्पणियों के लिए पढ़ते रहिये। कलम का कौशल, महाकोशल और chhattisgarh.co

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here