सरकारी सुरा के सुर से ब्रांडेड सल्फी तक

दाऊ जी ने दारू की दुकान क्या खुलवाई सारे बुद्धिजीवी हाथ धोकर सरकार के पीछे ही पड़ गए। सोशल डिस्टेंसिंग की दुहाई देने लगे। सरकार की प्राथमिकता परखने लगे। सवालों का अंबार लगा दिया। विपक्षी पार्टी भी कहां चूकने वाली थी। मौका देख चौका लगाया और विरोध में राजधानी सड़कों पर बीयर और विस्की बहा दी। लेकिन जाने-अनजाने पूर्व मंत्री ने सोशल मीडिया पर तंज के बहाने आबकारी मंत्री को आशीर्वाद दे डाला- ‘दारू पीबो अउ खाबो चखना, जुग-जुग जीओ…’

श्री मुख से ये आशीष वचन तो निकलने ही थे। आखिर दारू से अर्थ की व्यवस्था उन्हीं के कार्यकाल में ही तो शुरू हुई थी। तब सरकार का हिस्सा रहे नेता प्रतिपक्ष ‘भीष्म’ की तरह खामोश थे, जो आज दाऊ जी को घोषणा पत्र के वायदे याद दिला रहे हैं। पितामह! आप तब के ‘धृतराष्ट्र’ को सही सलाह दिए होते तो राजनीतिक वनवास नहीं भोगना पड़ता।

रही बात दाऊ जी की, तो वे ठहरे सीधे-सादे छत्तीसगढ़िया। पहले चिट्ठी लिखी। प्रधान सेवक को राजस्व के स्रोत बताए। बताया कि दुकान खोले बिना गुजारा नहीं होगा। वहां से जब हरी झंडी मिली, तब जाकर कारोबार शुरू किया। ऐसा करने वाले वे अकेले थोड़े ही थे, साथ खड़े थे पंजाब के मुखिया भी। बाकी राज्यों ने भी मिलता जुलता राग अलापा।

दारू का दबाव देखिए! देश के राजनीतिज्ञ ये भी कहने लगे कि हमें कोरोना के साथ जीना होगा। यानी, पिएगा तो जिएगा इंडिया! दूसरे लहजे में, छत्तीसगढ़ियों खासकर महिलाओं, को भी इसके साथ जीने की आदत डालनी पड़ेगी। क्योंकि सरकार का आधे से ज्यादा खर्च शराब के दम पर ही चलता है। मतलब, सरकार तो शराब छोड़ने से रही। भविष्य इसी का है। ताजी बीयर की नीति से शुरूआत हो चुकी है।

आने वाले समय में छत्तीसगढ़िया विकल्प ब्रांड बन जाए तो बड़ी बात नहीं होगी। गेड़ी, भौंरा, बांटी जैसे पारंपरिक खेलों में छत्तीसगढ़ का विकास ढूंढने वाली सरकार सल्फी, ताड़ी और महुआ का देसी ब्रांड लांच कर विदेशी मुद्रा अर्जित करने का प्लान भी बना सकती है! फिर दारू की घर पहुंच सेवा ही क्यूं, हर घर दारू बनाने का लाइसेंस भी जारी किया जा सकेगा।

सरकार के कीमती सलाहकार कभी ये भी राय देंगे कि जब दारू ही अर्थव्यवस्था का आधार है तो क्यों न इसे गांव-गांव तक पहुंचाया जाए। गांव की महिलाओं को इससे जोड़ा जाए। उन्हें समझाया जाए कि इसी की बदौलत रसोई चलेगी। दारू रहेगी तो राशन मिलेगा। जहां परंपरा के नाम पर पांच लीटर की छूट है, उसे पचास लीटर तक बढ़ा दिया जाए। दारू की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए एक नए विभाग का गठन किया जाए।

राय तो ये भी दी जा सकती है कि पंचायतों को इसी व्यवस्था से सुदृढ़ किया जाए। हर पंचायत को ताड़ी, सल्फी और महुआ की शराब के टारगेट दिए जाएं। इस पर इनाम की घोषणा की जाए। जब गोवा का फेनी मशहूर हो सकता है तो छत्तीसगढ़ का सल्फी क्यों नहीं! फिर राजस्व के हिस्से से ही पंचायत का विकास कार्य सुनिश्चित किए जाएं।

‘दाऊ जी! जब गांव में शराब बनेगी तो गांव के लाडलों का पेट्रोल खर्च बचेगा। उन्हें शराब के लिए शहर तक भटकना नहीं पड़ेगा। पीकर होने वाले हादसे कम होंगे। मौत का आंकड़ा घटेगा। सबसे बड़ी बात ये कि हर ग्राम पंचायत दारू से होने वाले राजस्व से अपना बजट खुद निर्धारित करेगा। टैक्स लगाने की बजाय एक दुकान गौठान के नाम पर ही खोल देंगे। उसी से गौठान का खर्च भी चलेगा।’

जाइए, रोकिए उन महिलाओं को जिन्होंने महुआ से सैनिटाइजर बनाकर खुद को प्रयोगधर्मी साबित किया। कोरोना संक्रमण काल में दारू से कमाई की बात नहीं सोची, बल्कि वायरस से बचाव का तरीका निकाला। उन्हें भी बताइए कि दारू से राजस्व मिलेगा, सैनिटाइजर से नहीं। उन्हें छत्तीसगढ़िया सरकार का उद्देश्य समझाना होगा।
बताना होगा कि अब ताड़ी, सल्फी और महुआ के साथ चखना में लाई, बिजौरी और अथान चलेगा। इसके लिए भी दिशा निर्देश दिए जाएंगे। इससे कुटीर उद्योग चलेंगे। महिलाओं को रोजगार मिलेगा। गांव में पुलिस की वेलफेयर सोसायटी को भी शामिल किया जा सकता है ताकि गश्त होती रहे और अपराध का नामो निशान मिट जाए।
दूरदर्शिता सफलता की पहली कड़ी है। छत्तीसगढ़ की सरकार दूरदर्शी सरकार है। और सरकारी सुरा से सुर मिलाने पर ही सुदृढ़ता आएगी। जब पंचायतें सक्षम होंगी तो राज्य सक्षम होगा। वैसे भी समाज सेवी संस्थाओं ने चुप्पी साधकर सरकार का साथ पहले ही दे दिया है। इसलिए सरकार के इस दूरदर्शी निर्णय का स्वागत हर छत्तीसगढ़िया को करना चाहिए।

  • चोखेलाल

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