कोयले के काले कारोबार का संचालन पर्दे के पीछे कर रहा एक निजी स्कूल का संचालक

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कोरबा। काले हीरे की धरती के रूप में कोरबा की पहचान सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि एशिया में भी बनी हुई है। एशिया की सबसे बड़ी खुली खदान के रूप में एसईसीएल की गेवरा खदान को जाना जाता है। जहां देश व प्रदेश के विद्युत संयंत्रों के बिजली उत्पादन में अहम भूमिका निभाने के साथ ही कोयला चोरों की झोली भरने में मददगार साबित हो रहा है। चूंकि खुली और भूमिगत खदान के कोयले की मांग बाजार में बनी हुई है। इसे देखते हुए कोयला चोरों का नया नया गिरोह सामने आता है। इस काले कारोबार को संचालित करने वाले सदा ही पर्दे के पीछे रहकर सफेदपोश की भूमिका निभाते रहते है। बताया जाता है कि कोरबा जिले में संचालित एक निजी स्कूल के संचालक द्वारा कोयले के काले कारोबार को संचालित किया जा रहा है। इस काली कमाई के पीछे उन्हें कुछ खाकी वर्दीधारियों का भी सहयोग मिल रहा है।

एसईसीएल की कोयला खदान कोरबा में बांकी मोंगरा , ढेलवाडीह, सिंघाली, मानिकपुर, गेवरा, दीपका, कुसमुंडा , बगदेवा, क्षेत्र में संचालित है। जिसमें बांकी मोंगरा , सुराकछार में भूमिगत खदान से कोयला उत्पादन किया जाता है। यहां का कोयला काफी महंगा बाजार में बिकता है। यहां पर एक लंबे अरसे से कोयला चोरी का कार्य एक गिरोह द्वारा संगठित रूप से किया जाता है। अधिकारी कोई भी रहे गिरोह में कार्य करने वाले लोग अपना कारोबार संचालित करते रहते है। फर्क इतना रहता है कि गिरोह का सरगना समय-समय पर बदलता रहता है। यहीं स्थिति गेवरा, दीपका , कुसमुंडा खदान के समीपी गांव की बनी हुई है। जिनमें रेकी,अमगांव, हरदीबाजार , भिलाई बाजार सहित आसपास के खदान से लगे गांव के लोग व्यापक पैमाने पर कोयला चोरी करते है और उसे ट्रेलर व ट्रकों में लाद कर दूसरे शहर पहुंचाया जाता है। इस खेल में एसईसीएल के अधिकारी से लेकर खाकी वर्दी और खनिज विभाग का अमला भी शामिल है। सभी का हिस्सा बंधा हुआ है और सभी को निर्धारित समय पर एक मुश्त राशि कोयले का कारोबार करने वाले अधिकारियों द्वारा पहुंचा दिया जाता है।

इन स्थानों से निकलने वाला कोयला कोरबा के अलावा बिलासपुर, रायपुर के डिपो में खपाया जाता है। वहीं मानिकपुर खदान से लगा क्षेत्र रापाखर्रा , ढेलवाडीह से भी व्यापक पैमाने पर कोयला चोरी की जा रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि कोयला चोरी रोकने के लिए एसईसीएल द्वारा लाखों रूपए खर्च किए जा रहे है। सीआईएसएफ के जवान तो तैनात रहते है साथ ही विभागीय अमला व ठेका सुरक्षाकर्मी भी लगाए गए है। खदानों से निकलने वाला चोरी के कोयले को रोकने में पूरा अमला नाकाम साबित हो रहा है। रही सही कसर खाकीवर्दी धारियों द्वारा पूरी कर दी जा रही है। जो इन्हें संरक्षण प्रदान कर रहे है। बताया जाता है कि चोरी के कोयले से लदी ट्रकों की जानकारी होने के बाद भी किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की जाती है।
कार्रवाई की भी जाती है तो नाममात्र की लावारिस मानकर 102 की कार्रवाई की जाती है। जबकि पहले पुलिस द्वारा ऐसे लोगों को डकैती लूट आदि के मामले में आरोपी बनाया जा चुका है। जबकि उनके द्वारा कोयला चोरी की घटना को पकड़े जाने के समय अंजाम दिया था कि नहीं यह भी अब तक खुलासा नहीं हो पाया है। खैर जो भी हो कोयले की चोरी जिले में धड़ल्ले से की जा रही है और एक वर्ग इसकी आड़ में मालामाल हो रहा है।

लाखों का वारान्यारा

चोरी का कोयला खपाने में प्रतिदिन लाखों का वारा न्यारा किया जा रहा है। जानकार सूत्रों का कहना है कि प्रतिदिन गेवरा, दीपका , कुसमुंडा, बांकी मोंगरा, सुराकछार, रापाखर्रा व इसके आसपास लगे गांव से 6-8 ट्रक कोयला बाहर भेजा जा रहा है। बाजार भाव के हिसाब से देखा जाए तो एक बड़ी राशि की चपत एसईसीएल प्रबंधन को तो लग ही रही है। वहीं खनिज विभाग को भी मिलने वाली रायल्टी में चूना लगाया जा रहा है और यह सब त्रिकोण के माध्यम से किया जा रहा है। त्रिकोण में एसईसीएल के अधिकारी खनिज और खाकी वर्दी शामिल है। बताया जाता है कि उपरोक्त निजी स्कूल के संचालक द्वारा सभी लोगों से सेंटिग कर काले हीरे के काले कारोबार को संचालित किया जा रहा है।