मोदी सरकार न देश के भीतर कोरोना को क़ाबू में कर पा रही है और न ही सरहद पर चीन को मुंह तोड़ जवाब दे पा रही है। सरकार ने देश की जनता को कोरोना से लड़ने के लिए ‘राम’ भरोसे छोड़ ही दिया है। चीन से लड़ने के लिए सेना को तैयार रहने के कह दिया गया है। हमें यक़ीन है कि हमारी बहादुर सेनाए चीन को उसके मंसूबों में कामयाब नहीं होने देंगी। लेकिन यह सवाल तो बनता है कि आख़िर ऐसी नौबत आई ही क्यों?

रविवार को PM मोदी ने ‘मन की बात’ की। ऑल इंडिया रेडियो पर। हर महीने के आख़िरी रविवार को करते हैं। आधे घंटे से ज़्यादा की इस बात में एक बार भी चीन की नाम नहीं लिया। इशारों में ही बात की। तमाम टीवी चैनलों ने ख़बर चला दी। मोदी ने कहा, ‘देश में कोरोना को हराएंगे और सीमा पर चीन को।’ कांग्रेस ने तंज़ कसा। मोदी सरकार को दोनों ही मोर्चों पर नाकाम क़रार दिया।

कोरोना को तो हम तीन महीने से हरा रहे हैं। लेकिन वो हार कहां रहा है? सारे जतन कर लिए। ‘जनता कर्फ्यू’ से लेकर ‘लॉकडाउन’ तक। ताली बजाई। थाली बजाई। घंटी बजाई। दिए जलाए। मोमबत्तती जलाई। मोबाइल की टॉर्च जलाई। पटाख़े छोड़े। रॉकेट छोड़े। जगह-जगह पुलिस वालों पर फूल बरसाए। अस्पतालों पर वायुसेना के हैलीकॉपिटर्स से फूल बरसाए। मगर कमबख़्त कोरोना है कि मानता ही नहीं। पूरे देश में पसरता जा रहा है। उसका प्रकोप सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता ही जा रहा है। देश भर में कोरोना मरीज़ों की संख्या साढ़े पांच लाख के आंकड़े को छू रही है।

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