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बस्तर दशहरा विशेष:  ये 350 देवी देवताओं का महाकुंभ है, जानिए रहस्यमी बातें

बी महेश राव@जगदलपुर। बस्तर दशहरे पर आमंत्रित देवी-देवताओं की संख्या को देखते हुए कहा जा सकता है कि, यह पर्व आदिम जनजातियों की आस्था का महाकुुंभ है। बस्तर में रियासतकाल से देवी-देवताओं को दशहरा पर्व पर आमंत्रित करने की परम्परा आज भी बदस्तूर जारी है। दशहरे में शामिल होने विभिन्न गांवों एवं परगनाओं से कुल 350 देवी-देवताओं को आमंत्रित किया जाता है।

अनेकानेक रूपों में विराजित हैं मां दंतेश्वरी 

बस्तर राजवंश की कुल देवी दंतेश्वरी के विभिन्न रूप इस पर्व पर नजर आते है, जिसका एक रूप मावली माता है। क्षेत्र और परगने की विशिष्टता एवं परम्परा के आधार पर मावली माता के एक से अधिक सम्बोधन सुनने देखने को मिल जाते हैं। जैसे घाट मावली(जगदलपुर), मुदरा (बेलोद), खांडीमावली (केशरपाल), कुंवारी मावली हाटगांव और मोरके मावली चित्रकोट है। माई दंतेश्वरी सोनारपाल, धौड़ाई नलपावंड, कोपरामाडपाल, फूूलपदर, बामनी, सांकरा, नगरी, नेतानार, सामपुर, बड़े तथा छोटे डोंगर , मावली माता की स्थापना माड़पाल, मारकेल, जड़ीगुड़ा, बदरेंगा, बड़ेमारेंंगा, मुण्डागांव और चित्रकोट में हैं। इसी तरह हिंगलाजिन माता की स्थापना विश्रामपुरी, बजावंड, कैकागढ़, बिरिकींगपाल, बनियागांव भंडारवाही और पाहुरबेल में है। इसी तरह कंकालीन माता जलनी माता की भी स्थापना बस्तर के विभिन्न गांवों में है।

सर्वाधिक शक्तिशाली माने जाते हैं भैरमदेव 

देवी-देवताओं को उनकी शक्ति पद और प्रतिष्ठा के अनुरूप दिये गये सम्मान में भैरमदेव को सर्वाधिक शक्तिशाली माना जाता है। भैरम के और भी रूप जद भैरम, बूढ़ा भैरम और पीला भैरम मिलते है। घोड़ावीर, कालवाम,गायतादेव, सिंगदेव, जांगड़ादेव तथा भीमादेव भी पूजे जाते हैं। इन देवताओं का रूप प्राय: देवी माता में नजर आता है। कानों में कुण्डल, बाह में बाहड़ा , कलाई में कड़ा और लहंगा-जम्पर पहने होते हैं। इनके साथ चल रहे भक्त घंटी, मोहरी, नगाड़ा, तुरही,शंख आदि बजाते हुए चलते हैं।

स्वयं को कोड़े मारते चलते हैं सिरहा

सिरहा खुले बदन अपने आप को कोड़े मारता हुआ चलता है। कहा जाता है कि उस पर देवी की सवारी आती है। जुलूस के आगे-आगे चल रही भक्तों की भीड़ सिरहा के लिए रास्ता छोड़ती हुई चली जाती है, साथ ही पुजारी लोग आंगा देव को कंधे पर रखकर आड़े तिरछे दौड़ते हुए चलते हैं, जिससे जुलूस में शामिल नागरिकों में भय की भावना उत्पन्न होती है और वे दौड़ते हुए आंगा देव के सम्मान में किनारे हट कर रास्ता दे देते हंै।

प्रत्येक गांव के देवताओं की होती है सक्रिय भागीदारी 

संभागीय मुख्याल जगदलपुर में आमंत्रित देवी-देवताओं के प्रतीक स्वरूप उनके पुजारी या सिरहा की अगुवाई में प्रतीक चिन्ह एवं पूजा पात्र उपकरण यथा डोली, लाट, छत्र, बडग़ा आदि लेकर नगर के विभिन्न स्थलों में डेरा जमाते हैं और पूजा आदि विधानों में भागीदारी निभाते हैं। इस पर्व मेें जन-जन की भागीदारी बस्तर की लोकतांत्रिक परम्परा को अनूठा और अविस्मरणीय बनाती है।

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